मीडिया Now - मजदूर दिवस की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा है

मजदूर दिवस की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा है

medianow 01-05-2021 19:08:15


सुभाष चन्द्र कुशवाहा / आज 1 मई, मजदूर दिवस को, उसकी उपलब्धियों को इतिहास बनाने और पुनः, उस इतिहास को दफ्न करने की पूंजीवादी कुचक्र के रूप में देखा जाना चाहिए। 1 मई, 1886, शिकागो क्रांति से 1 दिन में मजदूरी के आठ घंटे, इतिहास बन चुके हैं। अब 16 घंटे तक काम लिया जा रहा है। खुद हमारी सरकार 12 घण्टे काम का प्रावधान ला चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (International Worker's Day) की शुरुआत 1 मई 1886 को हुई, जब अमेरिका में कई मजदूर यूनियनों ने काम का समय 8 घंटे से ज्यादा न रखे जाने के लिए हड़ताल की थी.

इस हड़ताल के दौरान शिकागो की हेमार्केट में बम धमाका हुआ था. यह बम किस ने फेंका इसका कोई पता नहीं लेकिन प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोलियां चला दी और कई मजदूर मारे गए. शिकागो शहर में शहीद मजदूरों की याद में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया. इसके बाद पेरिस में 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट नरसंघार में मारे गये निर्दोष लोगों की याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा. तब से दुनिया के करीब 80 देशों में मजदूर दिवस को राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाने लगा. भारत में मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत सबसे पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को हुई थी. उस समय इसको मद्रास दिवस के तौर पर स्वीकार कर लिया गया था. इस की शुरुआत भारतीय मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने की थी. 

आज स्थिति बदल दी गयी है. आठ घंटे की जगह 16-18 घंटे काम लिया जा रहा है . न्यूनतम मजदूरी को ठेंगा दिखाने के लिए ही आउटसोर्सिंग शुरू की गई है । छटनी से खौफ का ऐसा वातावरण बनाया गया है कि, मजदूर 18 घंटे तक काम करने को मजबूर हैं। पेंशन, ग्रेच्यूटी, जीपीएफ या चिकित्सा सुविधा देने की अनिवार्यता न जाने कब निगल ली गई और कब CEO का वेतन करोड़ों का हो गया, पता न चला। पत्रकारों का वेतन 1000 या मुफ्त कर दिया गया . बीटेक का वेतन 5000 और संविदा की नियुक्तियां, बंधुवा मजदूरी बन गयीं। मालिकों की  हैसियत सत्ता तक जा पहुंची तो मजदूर सड़क पर लाठी खाने को दरबदर हो गये . कोरोना काल में मजदूरों की जो दशा देखी गयी, वह इतिहास का बर्बर काल कहा जायेगा। आज मजदूरों का कोई अधिकार नहीं। चंद रुपयों में लाश तौल दी जाती है। वह कहीं भी बेमौत मर सकता है। कोई भी जोखिम उठा सकता है। मालिकों को कोई चिंता नहीं। लेबर कानून दफन हो चुके हैं।  अब ऐसे में मजदूर दिवस को इतिहास से खींच कर पुनः जिन्दा करने की चुनौती सामने आ खड़ी हुई है। मजदूर दिवस की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा है। अब कौन आगे आये, यही इतिहास में दर्ज होना है।
- लेखक एक वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं

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