मीडिया Now - सत्यजीत रे - लीजेंड ऑफ़ इंडियन सिनेमा

सत्यजीत रे - लीजेंड ऑफ़ इंडियन सिनेमा

medianow 02-05-2021 20:40:48


वीर विनोद छाबड़ा / 02 मई 1921 को जन्मे सत्यजीत रे की गिनती विश्व की चोटी के फिल्मकारों में है. 1978 के बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में उन्हें दुनिया के तीन सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों में घोषित किया गया. वो पहले फ़िल्मकार थे जिन्होंने सिनेमा को कैमरे की आंख से देखा.  मेलोड्रामा नहीं भरा. प्रभाव पैदा करने के लिए संगीत को लाऊड नहीं किया.  इंसान के अंतर्द्वंद को उसकी काया के बहुत भीतर तक घुस कर देखा-पढ़ा और कैमरे की आंख से उजागर किया. दृश्यों को संवादों की ज़रूरत नहीं पड़ी, तस्वीर स्वयं बोलीं. 

'पाथेर पांचाली' (1955) उनकी पहली फिल्म थी जिसने हॉलीवुड में धूम मचाई. उनके अनेक आलोचक भी रहे. एक ने कहा कि उन्हें हाथ से दाल-भात खाता किसान पसंद है. इसी श्रंखला के अंतर्गत अपराजित(1956) और अपुर संसार (1959) पेश की. इन्हें भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर भरपूर ख्याति मिली. रे किसी एक जगह ठहरे नहीं. न विषय पर और न ही पात्रों पर. मध्य-वर्गीय समाज भी उनका विषय था और गरीबी-भूख-बेकारी भी. बच्चे और अबोध उनके प्रिय रहे और जासूसी के प्रति लगाव ने भी रे को खासा जिज्ञासू बनाया. स्वयं ख्याति प्राप्त लेखक होने के नाते उनकी किस्सागोई अद्भुत थी. बच्चों के लिए बहुत लिखा.  प्रशंसक उनके लेखन की तुलना अंतोव चेखव और शेक्सपीयर से करते हैं. बहुत अच्छे ग्राफ़िक डिज़ाइनर भी रहे. कई विश्वविख्यात पुस्तकों के मुखपृष्ठ डिज़ाइन किये.  इनमें मुख्य हैं, 'डिसकवरी ऑफ़ इंडिया' और 'मैनईटर्स ऑफ़ कुमायूं'. 

निर्देशन के साथ साथ सिनेमा के हर विभाग में भी उनका दखल रहा, चाहे संपादन हो या संगीत या छायांकन. अपनी ज्यादातर फिल्मों का स्क्रीनप्ले उन्होंने स्वयं लिखा. उन्होंने 37 फ़िल्में निर्देशित की. सिर्फ मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित 'शतरंज के खिलाड़ी' और दूरदर्शन के लिए बनायी 'सद्गति' को छोड़ कर उनकी फिल्मों की भाषा बांगला थी. लेकिन अफ़सोस कि इन दोनों हिंदी फिल्मों को वैसी ख्याति नहीं मिली जिसके लिए रे विख्यात हैं. शायद हिंदी के दर्शकों को वो ठीक से बूझ नहीं पाए. 

फिल्म को कला और कैमरा का माध्यम मानने के माहिर विश्व विख्यात अकीरा कुरासोवा, अल्फ्रेड हिचकॉक, चार्ल्स चैपलिन, डेविड लीन, फेडरिको फेलिनी, जॉन फोर्ड, इंगमार बर्गमन की पंक्ति में सत्यजीत रे को रखा गया जाता है. जलसाघर, देवी, तीन कन्या, चारुलता, नायक, अशनि संकेत, कापुरुष ओ महापुरुष, घरे बाहरे, अभिजान, महानगर, गुपी गायें बाघा गायें, प्रतिद्वंदी, सीमाबद्ध, सोनार केला, जॉय बाबा फेलुनाथ आदि रे की अन्य श्रेष्ठ फ़िल्में थी. उन्हें और उनकी फिल्मों को बेशुमार अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरूस्कार मिले.  23 अप्रैल 1992 को, मृत्यु से कुछ दिन पूर्व, उन्हें जग-प्रसिद्ध एकेडेमी पुरूस्कार से नवाजा गया. फिल्मों में अपूर्व योगदान के लिए 1984 में प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के और 1992 में भारत रतन दिया गया.

कुछ विवाद भी जुड़े सत्यजीत रे के साथ. 1967 में उन्होंने कोलंबिया पिक्चर्स के लिए 'दि एलियंस' की स्क्रिप्ट लिखी.  पीटर सेलर्स और मर्लोन ब्रांडो को साइन भी किया गया. मगर अचानक कोलंबिया ने रूचि लेनी बंद कर दी. निराश होकर रे भारत लौट आये. मगर रे को हैरानी हुई जब उन्होंने इसी स्क्रिप्ट पर 1982 में स्टीवन स्पीलबर्ग की E.T. देखी.  इसमें उन्हें कोई श्रेय नहीं दिया गया. शिकायत करने पर कहा गया इसका कोई संबंध उनकी कथित स्क्रिप्ट से नहीं है. उन्हें बहुत दुःख हुआ.  रे की दिली ख्वाईश महाभारत के साथ-साथ EM Forster के नावेल A passage to India पर फिल्म बनाने की भी रही, जिसे बाद में डेविड लीन ने फ़िल्माया. 

जापान के अकीरा कुरुसोवा से रे बेहद प्रभावित रहे. कुरुसोवा भी उनके ज़बरदस्त प्रशंसक रहे. उनका कहना था - रे की फिल्म के बिना दुनिया की वही दशा है जैसे बिना सूरज और चांद की धरती. एक बार कुरुसोवा से उनकी बहस हो गयी. कुरुसोवा का कहना था कि अगर आप अपनी अपनी बात एक घंटे में नहीं कह सकते तो फिल्म बनाना छोड़ दें. रे ने उनकी बात का समर्थन किया. इसी लिए रे की फिल्मों की लंबाई कम रही. 

रे के घोर आलोचकों की भी कमी नहीं रही है. राज्य सभा में नॉमिनेटेड सदस्य अभिनेत्री नरगिस ने उन पर देश की गरीबी और भूख को बेचने का आरोप लगाया. उन्हें कई ने बुर्जुआ मध्यवर्गीय समाज का समर्थक कहा. कहा गया कि रे पात्रों का महज़ चित्रण करते रहे. उनके अंतर्द्वंद को किसी तार्किक समाधान की ओर कभी नहीं ले गए. फिल्मों को मेलोड्रामा से वंचित रखा जिससे गति बहुत धीमी और उबाऊ रही. नरगिस के इस कथन का रे ने प्रतिवाद नहीं करके कोई बखेड़ा खड़ा नहीं किया और अपनी लगन के अनुसार सिनेमा बनाते रहे. लेकिन कुछ भी हो, यह सच्चाई अटल है कि भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय छवि प्रदान करने में सबसे बड़ा योगदान सत्यजीत रे को है. देश उनका सदैव ऋणी रहेगा. वास्तव में उन्होंने फ़िल्में नहीं तस्वीरें बनायीं. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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