मीडिया Now - जहां लोकतंत्र का दायरा बड़ा होगा, वहां अभिव्यक्ति की आजादी को भी विस्तार मिलेगा

जहां लोकतंत्र का दायरा बड़ा होगा, वहां अभिव्यक्ति की आजादी को भी विस्तार मिलेगा

medianow 04-05-2021 13:08:55


उर्मिलेश / जहां का समाज अच्छा होगा, वहां का मीडिया भी अच्छा होगा. जहां लोकतंत्र का दायरा बड़ा होगा, वहां अभिव्यक्ति की आजादी को भी विस्तार मिलेगा. यह बात    हर साल जारी होने वाले World Press Freedom Index से भी सही साबित होती है. जहां लोकतंत्र सुसंगत होगा, वहां जनता और समाज के लिए बेहतर काम भी होगे. निर्णय की प्रक्रिया में जन हिस्सेदारी का दायरा भी बडा होगा. अपने यहां नही रहा. हमारे यहां लोकतंत्र की संरचनाएं थीं पर वे आजादी के बाद क्रमशः(बीच-बीच में कुछ प्राणवायु मिलने के बावजूद) मरती रहीं, सिमटती रहीं. जो बचा-खुचा था, उसे कुछ सालों पहले 'पूरा' कर लिया गया.

अब सीधी बात करते हैं मौजूदा परिदृश्य पर. 

मौजूदा सरकार के कोविड-19 के संक्रमण को गंभीरता से न लेने का नतीजा आज देश की एक अरब से ज्यादा आबादी भुगत रही है. जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है. सिर्फ गरीब ही नहीं, अमीर भी संक्रमण से अपना बचाव नहीं कर पा रहे हैं. सिर्फ 'सुपर वीवीआईपी और सुपर रिच' ही सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. इन सुपर रिच में भी कुछ के सुरक्षित इलाके की तलाश में प्राइवेट जेट से विदेश भागने की खबरें सुनी जा रही हैं. पर भारत के आम और खास कहां जायेंगे? इस महामारी में सब अभिशप्त हैं. 

कोविड-19 से तबाह होते भारतीय समाज और यहां के सडे हुए अमानवीय सत्ता तंत्र को लेकर इस वक़्त बेहतरीन खबरें, विश्लेषण और आलेख भारत के मीडिया में उतने नहीं हैं,  जितने विदेशी मीडिया में. इस वक्त BBC, CNN, CNA, DW, Al JAZEERA, France24 और ABC जैसे न्यूज़ चैनलों में अपने देश की जितनी महत्वपूर्ण खबरें दिख रही हैं, भारत के टीवीपुरम् में उसका दसांश भी नहीं! इसी तरह NYTimes, Washington Post, WSJ, The Times, Gaurdian और Time आदि जैसे पत्र-पत्रिकाओं में भारत पर जितनी प्रामाणिक व शोधपरक खबरें और विश्लेषणात्मक लेख छप रहे हैं, उसकी तुलना में हमारा अपना प्रिन्ट मीडिया बहुत पीछे दिखता है. हालांकि हमारा प्रिन्ट मीडिया हमारे टीवीपुरम् की तरह मनुष्यता विरोधी नही बना है. वह तनाव और दबावों के बावजूद कोशिश कर रहा है, खासकर हमारे अंग्रेजी अखबार. भारत की न्यूज़ वेबसाइटों ने इस महामारी में अपने सीमित साधनों के बावजूद सबसे साहसिक पत्रकारिता की है.

हमने आजादी के बाद जिस तरह का समाज बनाया, जिस तरह का राजनीतिक तंत्र विकसित किया, जिस तरह के नेता कहे जाने वालों के हाथ में सत्ता सौंपी, उसी के अनुरूप हमने शिक्षा और लोक स्वास्थ्य सेवा का ढांचा भी पाया है. उसी तरह का हमने मुख्यधारा मीडिया पाया है. उसी तर्ज की नौकरशाही और न्यायपालिका भी पाई है! अब किससे-किसकी शिक़ायत करें! इस अभूतपूर्व महामारी के सामने हमारे समाज और तंत्र का सारा सच नंगा हो चुका है. जब हालात सामान्य थे, कोई भी अपढ़, अटपटा, उटपटांग, आपराधिक वृत्ति या ज्ञान और संवेदना शून्य व्यक्ति हमारी व्यवस्था या तंत्र को हांके चलता था. ब्रिटिश दौर वाली ब्यूरोक्रेसी की संरचना में थोड़े फेरबदल से सिस्टम किसी तरह चलता रहता था(कुछ राज्य थोड़े बेहतर रहे!). लेकिन कोविड जैसी भयावह महामारी के आगे सबकुछ धराशायी हो गया. अब सबको दिखने वाला यह नंगा सच है: बेहाल समाज के लिए राजसत्ता(व्यवस्था) के पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाने का सच और उसके पीछे मौत और मातम का अँधेरा! 

मौत और मातम के इस भयावह अंधेरे में अगर कुछ साफ साफ नजर आता है तो वह अपने समाज और तंत्र का यही नंगा सच है, जो बेहद अमानवीय और संवेदनहीन है!  इसके लिए व्यवस्था के सभी घटक जिम्मेदार हैं.पता नहीं, महामारी जब कभी खत्म होगी, जो लोग बचे होंगे, वे विचार, संवेदना, मिज़ाज और अंदाज के स्तर पर कुछ बदले हुए होंगे या आज ही जैसे होंगे!
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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