मीडिया Now - क्या आने वाले कल में "कर्म ही धर्म" का कथन सार्थक होगा ?? 

क्या आने वाले कल में "कर्म ही धर्म" का कथन सार्थक होगा ?? 

medianow 05-05-2021 00:20:00


1 .कल्पना कीजिए उस देश की, जहाँ दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति होगी, जगमगाता हुआ भव्य पूजास्थल  होगा, भगवा रंग से रंगे घरों के बीच की गलियां गेंदे की पीली पंखुड़ियों से सजी होंगी , नदी में देशी घी के जलते और तैरते लाखों दीयों की अभूतपूर्व शोभायात्रा के साथ महाआरती हो रही होगी। स्वयं भगवान भी देश की अदालत का धन्यवाद  कर रहे होंगे , सड़कों, गलियों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर जुगाली और चिंतन में संलग्न गौवंश आराम फरमा रहा होगा। अनेकों धर्म, उल्लू की तरह उनके अनुयायियों के सर पर बैठे होंगे।शायद भविष्य में "धर्म ही कर्म" होगा ? भगवान श्री राम की कार्यशैली " कर्म ही धर्म " थोड़े ही कलयुग में लागू किया जा सकता है , वह तो त्रेता युग की " आउट डेटेड " कार्यप्रणाली थी  अब तो जमाना बदल गया है । उस युग में तो 
 "Selfless - Service" होती थी इस EVM के युग में  "Self - less Service " होती है ? मंदिर की चकाचौंध से दूर, कंक्रीट के बड़े बड़े घरों से दूर , महलों से दूर , अमीरों से दूर अमावस्या का गहरा अंधेरा भी होगा ?

2 . अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं होगी, दवाईयां, बेड, इन्जेक्शन नहीं होंगे। दुधमुंहे बच्चे दम तोड़ रहे होंगे। मरीज दर-बदर भटक रहे होंगे। देश में ढंग के     स्कूल-कॉलेज मात्र अमीरों के बच्चों के लिये होंगे, गरीब बच्चों की शिक्षा में शायद पाबंदी भी लगी होगी ,युवावर्ग कामकाज की तलाश में गलियों में भटक रहे होंगे। कोविड-19 जैसी अन्य  महामारियां देश पर ताला लगा रही होगी और देश के प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे सैकड़ों मील की पैदल यात्रा कर रहे होंगे, आम जनता घुट-घुट कर जी रही होगी या तिल-तिल कर मर रही होगी ?

3. बेटियां - स्कूलों, कॉलेजों, मेडिकल, इंजीनियरिंग संस्थाओं में ना होकर सिर्फ़ सड़कों पर दौड़ रहे ट्रकों के पीछे "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" के नारों से ही संतुष्ट हो रही होंगी । न्याय सिर्फ सरकार समर्थित अमीरों के लिए अपने प्रभुत्व को स्थापित करने का एक महँगा  माध्यम होगा। बेटियों व महिलाओं के हत्यारों, बलात्कारियों तथा अन्य जघन्यतम अपराधियों को पुलिस बल "गार्ड-ऑफ़-ऑनर" पेश कर रहा होगा। अलग-अलग वेषभूषा वाले मुनाफेखोर और अपराधी प्रवृत्ति के लोग देश के सम्मानित और गणमान्य नागरिक होंगे जिनकी देश की मीडिया जय-जयकार कर रही होगी, इनमें से चन्द प्रसारित-प्रसारित जनप्रतिनिधि ही देश के तानाशाह शासक भी होंगे ?

4.  विश्व स्तर के उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान नहीं होंगे,अस्पताल नहीं होंगे, बेहतरीन किस्म के शोध संस्थान और प्रयोगशालाएं भी नहीं होंगी । भूख और बेरोजगारी से जूझती जनता के लिए चूरन होंगे, कुछ मलहम होंगे, सांस रोकने-छोड़ने के करतब होंगे, अनुलोम-विलोम होगा, कई प्रकार के काढ़ो के विज्ञापन भी होंगे और इन सबसे ऊपर, कोई शातिर तपस्वी उद्योगपति होगा, जो धर्म, आध्यात्म, तप-त्याग, और दर्शन की पुड़ियाओं में भस्म-भभूत और आरोग्य के ईश्वरीय वरदान की भरपूर डोज़ भर रहा होगा। परंतु हमारे पास कुछ तो होगा - हमारे पास गायें होगी, गोबर होगा, गोमूत्र होगा और दाल की खेती करने वाले किसानों के पास "पापड़" भी होंगे ? और , हाँ भारत में अनिवार्य रूप से लगाने वाला " हेल हिटलर " का समकक्ष नारा भी तो होगा जो हर स्कूल में , हर सिनेमाघर में तथा हर कार्यक्रम के अंत में सभी "भाईयों-बहनों-मित्रों" से लगवाया जायगा ?

5. सुव्यवस्थित ,सुरक्षित और गौरवशाली राष्ट्रीयकृत बैंक नहीं होंगे, लाभ देने वालीं सरकारी बीमा कंपनियां भी नही होंगी। चंद सरकार समर्थित अमीर घरानों के सामने हमारे भीख के कटोरे सदैव शोभायमान होंगे । महारत्न और नवरत्न कहे जाने वाले सम्मान के सार्वजनिक उपक्रम नही होंगे। अपनी सी लगती वह सरकारी भारतीय रेल भी गरीबों की पहुँच से दूर होगी , अमीरों की बुलेट ट्रेन गतिमान होगी और हम पैंट्री कार में वेटर और वेट्रेस बनकर "चाय-पकौड़े" बेच रहे होंगे या ट्रैन के डब्बों की सफाई कर रहे होंगे । यही तो आत्मसम्मान तथा आत्मनिर्भरता का विश्व में चमकने वाला प्रतीक होगा ?

6. देश एक ऐसी दुकान में बदल चुका होगा, जिसकी शक्ल-सूरत भी किसी ना किसी धर्मस्थल से मिलती जुलती होगी। देश इतना बदल चुका होगा जहाँ युवकों को दिहाड़ी मज़दूर बनाकर  रथयात्राओं, शिलान्यासों और जगरातों में नारे लगाने हेतु रोज़गार उपलब्ध कराया जायेगा। गौ-रक्षा दल होंगे, गौरव-यात्राएं होंगी , मुंह में गुटके की ढेर सारी पीक सहेजे बोलने और चीखने का अभ्यास करते हुये हजारों किशोर-युवा होंगे, जो कांवर लेकर आ रहे होंगे , जा रहे होंगे, या किसी नए धर्मस्थल के निर्माण के काम पर लगे होंगे , रास्तों पर जगह-जगह अमीर घरानों के चायपान व भोजन के स्टॉल भी लगे होंगे , मीडिया इनका लाइव टेलिकास्ट भी कर रहा होगा। खाली वक्त में युवावर्ग , जियो के सिम की बदौलत पुलिया में बैठ , आई.टी. सेल द्वारा ठेले गए स्रोत से अपना ज्ञानवर्धन भी कर रहा होगा ?

7. शिक्षा, स्वास्थ्य ,आर्थिक तथा
सामाजिक उन्नति के हिसाब से हम 1930-40 के दौर में विचरण कर रहे होंगे। तर्क, औचित्य, विवेक से शून्य होकर पड़ोसी की जाति, गोत्र पर विवाद कर रहे होंगे तथा एक दूसरे का खून बहा रहे होंगे। हम भूखे भले ही मर रहे होंगे परंतु अपने हिसाब से विश्वगुरु होंगे । हमारा आर्थिक विकास इतना सुविचारित एवं सुनियोजित होगा कि दुनिया के अन्य देशों में सस्ता पेट्रोल-डीज़ल हमारे देश में सबसे महंगा होगा ।कोविड-19 जैसी अन्य महामारियों के दौर में भी हम मास्क, सैनेटाइज़र और किट पर जी.एस.टी. वसूल रहे होंगे। हर जिले में " PM CARES " का एकाउंट होगा जिसमें अपनी आय का एक हिस्सा डालना भी अनिवार्य होगा । शासक इसी धन से विधायकों की खरीद-फरोख्त भी कर रहे होंगे , रिसॉर्ट का खर्चा भी इसी एकाउंट से डेबिट होगा , विदेश भृमण के लिए फंड की कमी भी नही होगी ?

8. हमारी ताक़त का ये आलम होगा कि कोई कहीं भी हमारी सीमा में नहीं घुसा होगा, फिर भी हमारे बीस-बीस सैनिक बिना किसी युद्ध के वीरगति को प्राप्त हो रहे होंगे। दुश्मन सरहद पर खड़ा होगा पर हमारे टैंकों और तोपों को जे.एन.यू.एवं ए.एम. यू. जैसे विश्वविद्यालयों तथा CAA विरोधी डिटेंशन सेंटरों के सामने तैनात किया जा रहा होगा। देशवासियों में छद्म राष्ट्रवाद , देशप्रेम, आक्रोश तथा "बदले" की भावना जगाने के लिए पुलवामा तथा गलवान जैसी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा होगा , शहीदों के लहू व चिता की राख  के नाम पर ही वोट मांगकर सत्ता प्राप्ति की जा रही होगी । सैनिकों का काम , महामारी के संकटकाल में सिर्फ फूल बरसाने और सीमा पर अपनी शहादत देकर राष्ट्रप्रेम जागृत करना होगा ?

9. कोई खास मुश्किल नहीं है। बस थोड़ा अभ्यास करना होगा, उल्टे चलने और हमेशा अतीत की जुगाली करने तथा मिथकों में जीने की आदत डालनी होगी। पुराने गौरवशाली इतिहास के पन्नों को फाड़ स्वयं के इतिहास के नये पन्नों को रचा जा रहा होगा , पहले की "कर्म प्रधान कैप्सूलों" को "धर्म प्रधान कैप्सूल " द्वारा पुनः स्थापित किया जा रहा होगा । शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, रोजगार, न्याय, समानता, बलात्कार और लोकतंत्र जैसे "राष्ट्रद्रोही" विषयों को ज़हन से निकाल फेंकना  होगा। अखंड विश्वास करना होगा कि धर्म, संस्कृति, मंदिर और मूर्तियां ही विकास के माँपदण्ड होंगे। बाकी सब तो सिर्फ साकार ना होने वाले सपने होंगे । यकीन मानिए शुरू में भले ही अटपटा लगे, पर यह चेतना बाद में अति आनंददायक होगी ?

10. बहुतों ने तो आज नपुंसकता का जामा भी ओढ़ लिया है , आगे मिलने वाले सुखद आंनद प्राप्ति हेतु अभ्यास भी प्रारम्भ कर दिया है। ब्रम्हा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था , ऋग्वेद ने चार वर्णों को इंगित किया था । बेशक , ब्रम्हा जी की इस " फिलोसॉफी " को विश्व नही मानता पर हम तो हैं इसके अनुयायी । जब तक अंधभक्ति रहेगी तब तक "ढकोसलों" को ब्रम्हा जी के नाम का संरक्षण भी मिलता रहेगा और लोंगों को "सर्वनाश" की आड़ में डराने का धंधा भी चलता रहेगा ।अब तो "दुष्कर्म" और "अधर्म" का जमाना है । फिर भी आज, हमारे बीच सवाल पूछने वाले कई "देशद्रोही" हैं जो श्रीकृष्ण की भगवदगीता की सिखलाई "कर्म ही धर्म" को आधार मानते हुये गलत को गलत कहने की कोशिश में लगे रहते हैं । "रामराज्य" तो पदयात्रा एवं वनवास के बाद त्याग से प्राप्त होता है ; इस रॉफेल के कलयुग में तो "रावणराज्य" सर्व विद्यमान है ही ? 

11. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ,आपसे मात्र कुछ छोटी छोटी प्रार्थनाएँ हैं , पहली कि ,  आप भारतवर्ष से कोरोना की महामारी को तुरन्त दूर कर दें जो आपके भक्तों के अनुसार तबलीगी जमात ने फैलाई थी , दूसरी कि , चीनियों को फौरन देश की सीमा से बाहर खदेड़ दें , तीसरी कि , आप युवाओं को रोजगार प्रदान करने की कृपा करें ताकि उनके गरीब किसान पिता आत्महत्या ना कर सकें , चौथी कि , जिस प्रकार आपने लंका से अधर्म को निकाल फेंका था, वैसे ही संसद तथा विधानसभाओं में बैठे सभी अपराधियों को बाहर निकाल फेंकिये , अंत में बेटियों को बलात्कारियों से बचा लीजिये।

    जयहिंद ,

ब्रिगेडियर प्रदीप यदु, सेवानिवृत्त
रायपुर , छत्तीसगढ़

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