मीडिया Now - यह रात भी थक कर सो जायेगी !

यह रात भी थक कर सो जायेगी !

medianow 05-05-2021 10:00:29


अभयानंद कृष्ण / पिछले हफ्ते की ही बात है। गोरखपुर शहर के एक निजी अस्पताल में एक रात थोड़ी देर के लिए ऑक्सीजन की कमी पड़ गई। लेकिन यह थोड़ी देर मरीजों और तीमारदारों के लिए बहुत बड़ी साबित होने लगी थी...हताशा के बादल अस्पताल को आगोश में लेने लगे थे। रात कभी उतनी अंधेरी न लगी थी किसी को। लेकिन अस्पताल के डॉक्टर अपने स्टाफ के साथ उस रात को हराने की जिद किया था। जिद.. एक ऐसे वक्त जब ऑक्सीजन के जरूरतमंदों में उसके अपने माता - पिता और बहनोई भी थे। आखिर वह रात हार गई। डॉक्टर और स्टाफ की कोशिशें और उम्मीद पूरी रात ऑक्सीजन बनी रहीं। सुबह की रोशनी के साथ ऑक्सीजन आ भी गया। लेकिन इसके पहले जीवन की रेखाएं इस डॉक्टर ने जरा भी धूमिल न होने दिया। 

 इस समय जब पूरा देश कोरोना के खूनी पंजे में फंसा तड़प रहा है, हमारे बीच के कुछ लोग इसे मात देने के लिए जी जान से जुटे हैं। गोरखपुर शहर के डॉ राजेश पांडेय भी उन्हीं में से एक हैं। शहर के मशहूर इस फिजिशियन के दिन रात इस समय इस पैंडेमिक को हराने में ही बीत रहे। उस रात वहां भर्ती बाइस साल का कोविड पेशेंट शिवम तिवारी बताता है ' मैं बहुत घबरा गया था क्योंकि मुझे ऑक्सीजन की जरूरत कभी भी पड़ सकती थी.. लेकिन डॉक्टर हौसला बढ़ाते रहे" यह बताते हुए शिवम भावुक हो जाता है कि डॉक्टर ने उसे भरोसा दिया कि जरूरत पड़ने पर वह अपने फादर का सिलेंडर उसे लगा देंगे..। सोच सकते हैं कितना कठिन रहा होगा यह बोलना। लेकिन डॉक्टर राजेश के लिए यह कठिन नहीं था। वह बताते हैं - " इलाज का एक हिस्सा यह भी है कि हताशा को हरगिज़ छाने न दिया जाए " 

खुद के अस्पताल के साथ दो और अस्पतालों में जाकर कोविड मरीजों के इलाज के साथ डॉक्टर राजेश ने अपना फोन नंबर सार्वजनिक कर दिया है। व्हाट्सएप और फोन के जरिए दिन भर मरीजों के साथ रहने वाले इस डॉक्टर ने अपनी ड्यूटी दिन के ग्यारह बजे से रात के दो बजे तक तय कर रखा है। मरीजों के बीच मुस्कुराते हुए दाखिल होते हैं और सभी के चेहरों पर मुस्कान पसारते हुए निकलते हैं। जरा भी नहीं लगता कि उनके अपने परिवार के लोग इस बीमारी से जूझ रहे। शायद यही समर्पण है कि उनके संपर्क में आने वाले नब्बे फीसदी से अधिक मरीज इस बीमारी को शिकस्त दे कर लौट रहे हैं। 
उनकी सलाह है कि यह धारणा कोई कतई न रखे कि उसे कोरोना नहीं हो सकता। टीका लगवा लेने या कोविड प्रोटोकॉल की दवाएं खा लेने के बाद आदमी एकदम सुरक्षित है। ज्यादातर मामलों में दिक्कतें पांच दिन बाद ही शुरू होती हैं। फिर न्यूमोनिया हो जाने के बाद मुश्किल बढ़ जाती है। पैनिक बिलकुल न हुआ जाए लेकिन सतर्क हर पल रहा जाए। जीवन और जीत के प्रति उम्मीद बढ़ाते ऐसे योद्धाओं को सोचकर ही शायद राही मासूम रजा ने कभी लिखा होगा -
इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई.

-लेखक मीडिया नाऊ के कार्यकारी संपादक हैं

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