मीडिया Now - थर्मामीटर और कोविड

थर्मामीटर और कोविड

medianow 05-05-2021 13:12:41


रवीश कुमार / कोविड के समय बुख़ार की सटीक जानकारी बहुत ज़रूरी है। कई लोग अंदाज़ से बताने लगते हैं कि हाँ उस दिन थोड़ा सा गरम तो था, लेकिन बहुत नहीं था। आज कुछ ज़्यादा लग रहा है। यह अंदाज़ की बात हुई। कोविड के समय में डॉक्टर और मरीज़ दोनों को बुख़ार की सटीक जानकारी बहुत ज़रूरी थी। थोड़ा बहुत था की जगह कितना बुख़ार था यह जानना है। इसे जानने का एक ही तरीक़ा है थर्मामीटर। 

कल मैं अपनी ही सोसायटी के गेट पर पहरेदारों से बात कर रहा था। सब थर्मामीटर का नाम सुनते ही चुप हो गए। किसी ने कहा कि उनके पास नहीं है। किसी ने बताया कि गाँव में घर पर भी नहीं है। कहां होता है थर्मामीटर। तो यह पता चला कि ऐसे न जाने कितने लोग हैं जिनके पास यह ज़रूरी चीज़ नहीं है। भारत एक ग़रीब देश है। थर्मामीटर 200-300 का आता है । काफ़ी महँगा है। कामगार और ग़रीब तबके के लोग नहीं ख़रीद सकते हैं। अब तो थर्मामीटर की इतनी ख़रीद हुई है कि उसका दाम भी महँगा हो गया है और मिल भी नहीं रहा है। 

2014 से पहले जब NGO का नेटवर्क फैला हुआ था तब इन संस्थाओं की मदद से यह सब काम हो जाता था। कहीं से मदद राशि जुटा कर लोगों तक मदद पहुँचा दी जाती थी। मोदी सरकार सरकार के आने के बाद तेज़ी से NGO का नेटवर्क ख़त्म कर दिया गया। आज सरकार की अपनी संस्थाएँ फेल हैं। NGO है नहीं तो आम ग़रीब तक कोई मदद नहीं पहुँच रही है। वैसे तो आक्सीजन का सिलेंडर अमीर मिडिल क्लास और गरीब को भी नहीं मिला लेकिन ग़रीबों के मोहल्लों में जा कर देखिए तो पता चलेगा कि वहाँ कितनी भयावह स्थिति है। 

इसलिए ज़रूरी है कि आप अगर किसी की कुछ मदद करना चाहते हैं तो आक्सीमीटर से कहीं ज़्यादा काम की चीज़ है थर्मामीटर। आपके घर जो काम करने आती हैं, जो गाड़ी चलाते हैं, या गाँव में जिन्हें आप जानते हैं, उन तक थर्मामीटर पहुँचाइये ताकि वे बुख़ार की सही जानकारी रखें। उन्हें पता होना चाहिए कि 99 है या 101 बुख़ार है। 101 है तो इलाज की पूरी प्रक्रिया बदल जाती है लेकिन जब यही पता नहीं होगा तो वह कैसे सर्तक होगा। ज़ाहिर है डाक्टर तक पहुँचने में या सही जानकारी देने में देरी कर देगा और उसकी जान ख़तरे में पड़ सकती है।

इस वक़्त तो थर्मामीटर मिलेगा भी नहीं लेकिन जब सामान्य हो तो यह काम किया कीजिए। सरकार को भी हर घर में थर्मामीटर पहुँचाना चाहिए। लेकिन जो सरकार आक्सीजन नहीं दे सकी उसकी बात करना समय की बर्बादी है। मोदी जी को लगेगा कि अच्छा आइडिया है थर्मामीटर पर फ़ोटो चिपकाने का। इससे अधिक वो सोच नहीं सकते हैं। फ़ोटो के चक्कर में ही देश की यह हालत हो गई कि लोगों को मामूली दवाओं के लिए अपमान और ग्लानि झेलनी पड़ रही है। बाक़ी आप माने या न माने जो सच है वही सच है।

राज्य सरकारों, नागरिकों और मदद करने वाली संस्थाएँ धीरे धीरे लोगों तक थर्मामीटर पहुँचाए। कोविड ऐसी बीमारी है जिसे लेकर न तो आप ख़ुद से कुछ छिपाएँ न बाहर कुछ छिपाएँ। आपको इस बीमारी की हर लक्षण को लेकर बेहद ईमानदार होना होता है। छिपाइये नहीं बताइये और सही समय पर सही कदम उठाइये।

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