मीडिया Now - हाशिए पर जनता और सात साल ..मैं!...मैं!!...मैं..!!! रामराज्य से यमराज्य की ओर बढते कदम...

हाशिए पर जनता और सात साल ..मैं!...मैं!!...मैं..!!! रामराज्य से यमराज्य की ओर बढते कदम...

medianow 05-05-2021 16:44:09


पवन सिंह / मैं गरीब मां का बेटा हूं। मेरी मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थी।‌ मैंने गरीबी देखी है। मैं बचपन में चाय बेचता था। मैंने 20 साल भिक्षा मांग कर पेट भरा। मैं हिमालय पर तपस्या करने चला था।  मुझे लोग गालियां देते हैं। मैं गालियों को गहना बना लेता हूं। मै झोला उठा कर चल दूंगा। मैं चौराहे पर आ जाता हूं... मेरी बचपन से आदत रही है कि मैं बड़ा सोचूं....मां गंगा ने मुझे बुलाया है..मां नर्मदा ने मुझे बुलाया है..मैं बांग्लादेश की आजादी में शामिल था...मैं! ...मैं!!...मैं!!!....मैं!!!?...मैं..!!!!!..

ये वो विषय हैं जो मेन स्ट्रीम मीडिया के मार्फ़त और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए आवाम के दिमाग में ठेले गये... सहानुभूति बेचने-खरीदने की जबरदस्त मार्केटिंग की गई...जरा सोचिएगा कि इसमें जनता के सरोकारों के तमाम विषय कहां हैं?... चारों ओर "मैं" का साम्राज्यवाद है और विस्तार है..."हम भारत के लोग" कहां हैं?..."मैं" के विस्तार में "हम" यानी "आवाम" को ढक दिया गया...और इस कदर ढक लिया गया कि हमने अपने नागरिक होने के अधिकारों से ही मुंह मोड़ लिया।  बकौल! एक नागरिक हमने बिजली-पानी-शिक्षा-रोजगार जैसे बुनियादी सवाल ही खो दिए...इसका परिणाम यह हुआ कि उद्योग धंधे खत्म हुए, रोजगार खत्म हुए, चिकित्सा व शिक्षा का बजट हर साल सिकुड़ता चला गया, खजाना भरने के लिए बेतहाशा टैक्स लगे, पेट्रोलियम प्रदार्थों के दाम डकैतों की तरह वसूले जा रहे हैं... अर्थव्यवस्था चरमाई, बैंकिंग सेक्टर खोखला हुआ और अब तो अपने ही पैसे की जमा व निकासी दोनों पर "चुंगी" कटने लगी...गैस की सब्सिडी छू-मंतर कर दी गई, खाद के दामों में बेहिसाब बढ़ोत्तरी कर दी गई...भत्ते रूक गये और नई सरकारी भर्तियां राम नाम सत्य हो गई...लाखों पद खत्म कर दिए गये.... दरअसल आवाम अपने हित के बुनियादी सवाल ही भूल गई या भुला दिए गये...."मैं" के कौन से सवाल आपके और हमारे जीवन के सरोकारों से जुड़ते हैं..कभी सोचिएगा?..अभी भी नहीं सोच सकते हैं‌ तो भी कोई बात नहीं एक दिन ये सवाल आपके सामने साक्षात सूर्य के प्रकाश की तरह चमकने लगेंगे.....। चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था व रिसर्च लैब....कितना बड़ा बुनियादी सवाल है/था...कभी सोचा आपने?.. नहीं सोचा ...अच्छा किया.... "रामराज्य" से यमराज्य" की ओर बढ़ते रहिए....।

नोटबंदी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए डिजास्टर साबित हुई...आपने "मैं" पर तालियां पीटी जब उसने कहा कि "उनकी" औकात थी उन्होंने चवन्नी-अट्ठन्नी बंद की और मैंने 200-1000 की नोट बंद कर दी...। मीडिया लगा दिया गया और आपको नोट में सेटेलाईट चिप लगाकर टहला दिया गया। आप भूल गये कि जब चंदन की लकड़ी का तस्कर एक "काईंयां बाबा" और "मैं" दोनों कहा करते थे कि बड़ी नोट भ्रष्टाचार का बड़ा कारण है और सामने से  1000 की बंद करके 2000 की करेंसी ठेल दी जाती है?...कि नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के मुताबिक भारत स्वास्थ्य क्षेत्र पर जीडीपी का महज 1.02 फीसदी खर्च करता है, जबकि हमसे ज्यादा भूटान (2.5%)  और श्रीलंका (1.6%) जैसे पड़ोसी देश खर्च करते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े डराने वाली तस्वीर दिखाते हैं। इनके अनुसार, भारत में एलोपैथिक डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने वाले एक तिहाई लोगों के पास मेडिकल की डिग्री नहीं है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डॉक्टर पंजीकृत थे। इनमें से सरकारी अस्पतालों में 1.2 लाख डॉक्टर थे। शेष डॉक्टर निजी अस्पतालों में कार्यरत हैं अथवा अपनी निजी प्रैक्टिस करते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 90 करोड़ आबादी स्वास्थ्य देखभाल के लिए इन थोड़े से डॉक्टरों पर ही निर्भर है। आईएमए के मुताबिक, इस असामान्य अनुपात की वजह से हाल यह है कि कहीं-कहीं अस्पतालों में एक बेड पर दो मरीजों को रखना पड़ता है तो कहीं गलियारे में मरीज लिटाए हुए देखे जा सकते हैं। दूसरी तरफ जो चिकित्सक हैं, उनके ऊपर भी काम का काफी बोझ है। पीडब्ल्यूसी की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में करीब 1 लाख अस्पताल बेड जोड़े गए हैं, लेकिन यह ज्यादातर निजी क्षेत्र के हैं और जरूरतों के हिसाब से नाकाफी हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले कुल खर्च का करीब 30 फीसदी हिस्से में ही सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान होता है। ब्राजील में यह 46 फीसदी, चीन में 56 फीसदी, इंडोनेशिया में 39 फीसदी, अमेरिका में 48 फीसदी और ब्रिटेन में 83 फीसदी है। 

कोविड की वैक्सीन देने वाला आधार पूनावाला देश छोड़कर निकल गया लेकिन गजब की ख़ामोशी!?.. कहीं कोई प्राइम टाइम नहीं..???सीएमआईई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अच्छी रिकवरी के बावजूद मार्च, 2020 से रोजगार में लगातार गिरावट का ट्रेंड है। मार्च 2020 के बाद से हर महीने इसके पिछले साल की तुलना में रोजगार में गिरावट का दौर जारी है। रोजगार इन महीनों में कहीं से भी पिछले साल के स्तर पर नहीं पहुंचा है. सीएमआईई का कहना है कि नौकरी की कमी के कारण लोग हतोत्साहित हो रहे हैं और एक्टिव लेबर मार्केट से बाहर होते जा रहे हैं।

वित्त वर्ष 2021-22 के आम बजट में में शिक्षा को 93,224.31 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं जो पिछले साल के बजट से छह हजार करोड़ रुपये कम है। स्कूली शिक्षा के बजट में सबसे अधिक करीब पांच हजार करोड़ रुपये की कटौती की गई। स्कूली शिक्षा विभाग को 54,873 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं जो पिछले बजट में 59,845 करोड़ रुपये थे। यह 4,971 करोड़ रुपये की कमी को दर्शाता है। उच्च शिक्षा विभाग के बजट में इस साल करीब एक हजार करोड़ रुपये की कटौती की गई है. उच्च शिक्षा विभाग को इस बार 38,350 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जो पिछले बजट में 39,466.52 करोड़ रुपये रहा था। बजट में स्कूली शिक्षा योजना समग्र शिक्षा अभियान के आवंटन में कमी दर्ज की गई है और इसके लिए 31,050 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जो पिछले बजट में 38,750 करोड़ रुपये था। लड़कियों के लिए माध्यमिक शिक्षा की राष्ट्रीय प्रोत्साहन योजना के लिए आवंटन महज एक करोड़ रुपये किया गया है जो चालू वित्त वर्ष में 110 करोड़ रुपये था। खैर! आप लोग 'मैं" के विस्तार व संरक्षण में लगे रहें और आपकी पीढ़ियों के भाग्य में भिक्षा मांगकर खाना ही लिखा जाएगा।

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