मीडिया Now - ओली के लिए देवदूत बने मधेशी दल

ओली के लिए देवदूत बने मधेशी दल

medianow 08-05-2021 12:09:20


यशोदा श्रीवास्तव / उच्च न्यायालय के आदेश पर बहाल हुई ओली सरकार के लिए दस मई का दिन बड़ा अहम है। इस दिन उन्हें प्रतिनिधि सभा के फ्लोर पर विश्वास मत हासिल करना है जिसमें पार पाने की पूरी उम्मीद है क्योंकि मधेशी दल एक बार फिर विपरीत विचारधारा वाली किसी सरकार के पक्ष में देवदूत बनकर सामने आए हैं। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने इस एक दिन का विशेष सत्र आहुत करने का निर्देश दिया है। 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में ओली समर्थक सदस्यों कि संख्या 121है,चार सदस्य निलंबित हैं जो अविश्वास मत में पक्ष विपक्ष में हिस्सा नहीं ले सकते।।जानकारों का स्पष्ट मत है कि ओली को विश्वास मत हासिल करने में कोई कठिनाई नहीं होगी क्योंकि उन्हें सत्ता से हटाने की मुहीम शुरू करने वाले प्रचंड पहले ही मान चुके हैं कि ओली के खिलाफ उनकी आवाज को अपेक्षाकृत समर्थन नहीं मिला। 

अस्थिर राजनीतिक दौर में ओली सरकार का बजट सत्र भी सस्पेंड चल रहा है।।संभावना है विश्वास मत हासिल करने के बाद ओली सरकार बजट सत्र आहुत करे। कोरोना के चलते नेपाल भी भारी आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को राहत पैकेज की दरकार है जिसकी मांग जोर पकड़ रही है।ओली सरकार के लिए बजट सत्र इसलिए भी बहुत जरूरी है।

बता दें कि पिछले वर्ष आंतरिक मतभेदों के कारण ओली ने राष्ट्रपति से सरकार भंग करने की सिफारिश कर दी थी। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने पीएम ओली की सिफारिश को मानते हुए सरकार बर्खास्त कर नए चुनाव की तिथि भी तय कर दी थी। इसके बाद नेपाल भर में ओली विरोधी प्रदर्शन शुरू हो गए। ओली के इस फैसले के खिलाफ नेपाल उच्च न्यायालय में अपील भी हुई। न्यायालय ने गहन समीक्षा के बाद 20 फरवरी को ओली के सरकार बर्खास्त करने के फैसले को रद कर प्रतिनिधि सभा को बहाल कर ओली को विश्वास मत हासिल करने का निर्णय सुनाया। न्यायालय के फैसले के आधार पर ओली ने अपनी सरकार बचाने की गुणा गणित के बाद दस मई को एक दिवसीय सत्र आहुत की है जिसकी सूचना उन्होंने कुछ रोज पहले ही अपनी कैविनेट को दिया।

गौर करने की बात यह है कि माओवादी केंद्र जिसका नेतृत्व प्रचंड के हाथ में है, यह धड़ा ओली के खिलाफ होने के बावजूद अभी तक समर्थन वापस नहीं लिया है।अविश्वास प्रस्ताव में प्रचंड की भूमिका पर नेपाल के राजनीतिक विष्लेशकों की नजर है। ओली सरकार के लिए मधेशी दल फिर देवदूत बनकर उभरे हैं।इधर ओली के विकल्प के रूप में नेपाली कांग्रेस और प्रचंड गुट की रणनीति विफल हो गई क्योंकि मधेशी दल सत्ता की मलाई के बिना नहीं रह सकते। बड़े मधेशी नेता महंथ ठाकुर खुलकर ओली के साथ आ गए। जाहिर है इसके लिए सत्ता में हिस्सेदारी की बड़ी डील हुई। ओली के समर्थन को लेकर मधेशी नेताओं में हल्का फुल्का विरोध जरूर था जो अब दूर कर लिया गया है। इस हिसाब से ओली सरकार को विश्वास मत हासिल करने के जरूरी 25 और सदस्यों की कमी पूरी हो गई है।प्रचंड के अलावा नाराज चल रहे माधव कुमार नेपाल,बामदेव गौतम जैसे ओली के अपने खास भी अब मैनेज हो गए हैं लिहाजा सरकार अल्पमत के मुक्त दिख रही। कहना न होगा कि ओली विरोधियों को नई सरकार के विकल्प के लिए अब अगले आम चुनाव तक इंतजार करना होगा जिसमें अभी दो साल तक का लंबा समय है।

ओली ही नहीं हर बार विपरीत विचारधारा वाली सरकार को बचाने के लिए मधेशी दल ही क्यों हाजिर होते हैं, नेपाल की राजनीति में अब इस पर बहस शुरू हो गई है। राजशाही खत्म होने के बाद 2008 में हुए पहले संविधान सभा के चुनाव में प्रचंड की सरकार को समर्थन देकर मधेशी दलों ने अपनी जमीन खोने की पटकथा लिख दी थी। उसके बाद कई सरकारों को भी समर्थन दिया जिनके खिलाफ ये लड़ते रहे। भारत सीमा को स्पर्श कर रहे नेपाल में 20-22 जिले ऐसे हैं जिन्हें मधेशी कहा जाता है। इन जिलों की करीब 90 लाख नागरिक स्वयं को भारत से जूड़ा हुआ मानते हैं। नेपाल के विकास में भारी आवादी वाले  इन मधेशियों का योगदान किसी से कम नहीं है बावजूद इसके नेपाल में चाहे राजनीति हो,सेना या सरकारी नौकरी हो,हर एक में इनका अनुपात न के बराबर है।

इसी सामाजिक असमानता की लड़ाई के नाम पर मधेशी राजनीति अस्तित्व में आया और लोकतांत्रिक नेपाल में इनके कई संगठन खड़े हो गए जिनका नेतृत्व उपेंद्र यादव,राजेंद्र महतो,महंत ठाकुर सरीखे नेताओं के हाथ में है। शुरुआती दौर में मधेशी क्षेत्र के वोटरों ने अपने इन नए रहनुमाओं पर भरोसा भी किया जिसे ये बचाकर नहीं रख सके।बहुत जल्दी ही मधेशी जनता और मधेशी नेताओं के बीच भरोसा टूट गया। पिछले आम चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो जहां मधेशी दलों को चुनाव जीतना चाहिए था,वहां कम्युनिस्ट पार्टियों का झंडा गड़ गया। यहां मधेशियों की बढ़त के कारण नेपाली कांग्रेस की भी पकड़ कमजोर होती गई।वे भी अलग थलग पड़ गए। यह हैरानी की बात है कि भारत सीमा के इस लंबे चौड़े नेपाली भूभाग पर मधेशी दलों के विकल्प के बदले लोगों की आस्था कम्युनिस्ट दलों में बढ़ रही है।

मधेशी लोगों में अपने नेताओं के प्रति घटते विश्वास का फायदा कम्युनिस्ट दलें उठाने को आतुर हैं। पिछले दिनों भारत सीमा से सटे नेपाल के जिला कपिलवस्तु में आए प्रचंड के समक्ष इलाके के तमाम बड़े मधेशी नेता कम्युनिस्ट का झंडा थामते देखे गए। भारत अपनी सीमा तक नेपाली भूक्षेत्र में कम्युनिस्टों के बढ़ रहे प्रभाव को किस दृष्टि से देखता है, यह तो नहीं पता लेकिन नेपाल की दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टियां चाहे वह एमाले हो माओवादी केंद्र, हैं तो चीन के ही करीब। ओली का रूख यदि इस वक्त भारत विरोध का है तो पूर्व में प्रचंड भी भारत को आंख दिखाने से बाज नहीं आए थे। वेशक भारत की नीति किसी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल व ताक झांक करने की न रही हो लेकिन नेपाल के मामले में यह सटीक नहीं है। भारत को इसे लेकर इसलिए भी चौकन्ना रहना होगा क्योंकि चीन नेपाल का चीनीकरण करने में तेजी से जुटा हुआ है जो हमारे आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती है।

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