मीडिया Now - उत्तराखंड: प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा हुए कोरोना संक्रमित, एम्स ऋषिकेश में हुए भर्ती, जानिए उनके जीवन संघर्ष के बारे में

उत्तराखंड: प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा हुए कोरोना संक्रमित, एम्स ऋषिकेश में हुए भर्ती, जानिए उनके जीवन संघर्ष के बारे में

medianow 08-05-2021 17:45:15


देहरादून। देश के प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए। उन्हें एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया है। करीब 94 वर्षीय बहुगुणा को बुखार व खांसी की शिकायत है। फिलहाल सांस लेने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही है। एम्स के जनसंपर्क अधिकारी हरीश मोहन थपलियाल ने बताया कि पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा को शनिवार दोपहर करीब 12:30 बजे एम्स ऋषिकेश लाया गया था।

उनकी कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव है। उन्होंने बताया कि पिछले एक सप्ताह से सुंदरलाल बहुगुणा को बुखार व खांसी की शिकायत थी। उन्हें कोविड वार्ड में भर्ती किया गया है। उन्होंने बताया कि सुंदरलाल बहुगुणा को अभी सांस लेने में कोई परेशानी नहीं आ रही है। उनकी स्थिति सामान्य है और उनकी अन्य स्वास्थ्य जांच भी की जा रही है।

बहुगुणा के बारे में चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म नौ जनवरी सन 1927 को देवभूमि उत्तराखंड के मरोडा नामक स्थान पर हुआ। प्राथमिक शिक्षा के बाद वे लाहौर चले गए और वहीं से बीए किया। सन 1949 में मीराबेन व ठक्कर बाप्पा के सम्पर्क में आने के बाद ये दलित वर्ग के विद्यार्थियों के उत्थान के लिए प्रयासरत हो गए। उनके लिए टिहरी में ठक्कर बाप्पा होस्टल की स्थापना भी की। दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने आन्दोलन छेड़ दिया।

अपनी पत्नी श्रीमती विमला नौटियाल के सहयोग से इन्होंने सिलयारा में ही ‘पर्वतीय नवजीवन मण्डल’ की स्थापना भी की। सन 1971 में शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा ने सोलह दिन तक अनशन किया। चिपको आन्दोलन के कारण वे विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए। उत्तराखंड में बड़े बांधों के विरोध में उन्होंने काफी समय तक आंदोलन भी किया। 

सुन्दरलाल बहुगुणा के अनुसार पेड़ों को काटने की अपेक्षा उन्हें लगाना अति महत्वपूर्ण है। बहुगुणा के कार्यों से प्रभावित होकर अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर नामक संस्था ने 1980 में उन्हें पुरस्कृत भी किया। इसके अलावा उन्हें कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। पर्यावरण को स्थाई सम्पति माननेवाला यह महापुरुष आज ‘पर्यावरण गाँधी’ बन गया है।

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