मीडिया Now - नया दौर के पीछे की कहानी

नया दौर के पीछे की कहानी

medianow 09-05-2021 20:39:02


वीर विनोद छाबड़ा /  'नया दौर' (1957 ) की स्क्रिप्ट में जितने झोल थे, उतनी ही फिल्म मेकिंग की यात्रा भी कष्टप्रद रही. एक के बाद एक मुसीबतें. सब्जेक्ट था आदमी बनाम मशीन. मशीन से कोई प्रॉब्लम नहीं है, मगर इससे सबका भला हो, मज़दूर का भी. इस भावना से ओत-प्रोत स्क्रिप्ट लेकर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर बीआर चोपड़ा पहुंचे अपने पसंदीदा हीरो और मित्र अशोक कुमार उर्फ़ दादामुनि के पास. दादामुनि ने बड़े ध्यान से कहानी सुनी. बोले - बहुत अच्छी है स्क्रिप्ट.  शानदार फिल्म बनेगी.  लेकिन ईमानदारी की बात है कि हीरो के रोल में मैं नहीं बल्कि यूसुफ (दिलीप कुमार) ही फिट होगा. . 

चोपड़ा साहब के मन में खटका उठा. ऐसा तो नहीं कि दादामुनि को स्क्रिप्ट बेदम लगी है. दादामुनि ने दिलीप कुमार को फ़ोन भी किया - यूसुफ मेरा तजुर्बा कहता है कि बहुत शानदार फिल्म बनने जा रही है. चोपड़ा को ज़बान दे चुका हूँ, न मत करना. दादामुनि तो यूसुफ के लिए बड़े भैया थे. मगर उन्होंने हां के साथ एक शर्त लगा दी. साल में दो फ़िल्में करने का उसूल है मेरा. एक साल तक इंतज़ार करना होगा. चोपड़ा साहब की बहुत इच्छा थी दिलीप कुमार जैसे अभिनय सम्राट के साथ काम करने की. किसी भी कीमत पर यह फिल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने कहा कि ठीक है. सौ साल तक इंतज़ार करूँगा. 

दिलीप ने सोचा कि बलां टली. लेकिन किस्मत ने चोपड़ा के साथ दिया.  हुआ यह कि दिलीप कुमार की एक फिल्म रद्द हो गयी. दिलीप कुमार के सामने 'नया दौर' स्वीकार करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था. फिर अपनी महबूबा नायिका मधुबाला के करीब रहने का एक मौका भी मिल रहा था. बहुत अच्छी परंपरा थी उस दौर की कि जूनियर फिल्म मेकर अपने सीनियर से भी डिस्कस किया करते थे. चोपड़ा ने मशहूर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर महबूब खान का दरवाज़ा खटखटाया.  महबूब साहब ने स्क्रिप्ट सुनी और दो टूक फैसला दिया - बहुत शानदार डॉक्यूमेंट्री बन सकती है, मगर फिल्म नहीं. और युसूफ के लिए तो कुछ है ही नहीं फिल्म में. उसका टैलेंट वेस्ट होगा.  

लेकिन चोपड़ा हताश नहीं हुए. गिरते ही घुड़सवार हैं, मैदाने जंग में. यों भी बहुत ज़िद्दी स्वभाव के थे चोपड़ा साहब. फिल्म शुरू कर दी. इधर फिल्म इंडस्ट्री के कई एक्सपर्ट की राय थी कि चोपड़ा ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है. शूटिंग शुरू ही हुई थी क़ि एक नई मुसीबत खड़ी हो गयी. आउटडोर शूट को लेकर चोपड़ा और नायिका मधुबाला से झगड़ा हो गया और अपने वचन से पीछे हट गयीं. दरअसल उसके पीछे उसके पिता अताउल्लाह ख़ान थे जो मधु और दिलीप की नज़दीकियों की सख़्त मुख़ालफ़त करते थे. चोपड़ा साहब भी कम नहीं थे. फिल्म से मधु बाहर हो गयी और वैजयंती माला अंदर. मामला कोर्ट पहुंचा. चोपड़ा साहब लाहौर यूनिवर्सिटी के फर्स्ट क्लास एलएलबी थे. कोर्ट में दिलीप कुमार ने मधुबाला के विरुद्ध गवाही दी. इसी के साथ दोनों में अलगाव की पक्की मुहर भी लग गयी. बीआर कोर्ट में जीत गए. मधु को दिया गया एडवांस और हर्जा-खर्चा देने को कहा गया. सुना है, चोपड़ा साहब ने दिलीप कुमार की सिफारिश पर मुक़दमा वापस ले लिया ताकि मधु की और छीछालेदर न हो. 

बड़े अरमानों से बनी यह फिल्म रिलीज़ होते ही न सिर्फ क्लासिक घोषित हुई बल्कि सुपर-डुपर हिट भी हो गयी. पच्चीस हफ्ते पूरे होने पर जश्न हुआ. 'नयादौर' को डाक्यूमेंट्री घोषित कर चुके महबूब खान चीफ़ गेस्ट थे. उन्होंने कबूल किया कि उनका अनुमान ग़लत साबित हुआ. चोपड़ा बहुत टैलेंटेड डायरेक्टर हैं.
कई साल बाद फ़िल्म का डिजिटल कलर वर्ज़न तैयार करके फिर से रिलीज़ किया गया. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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