मीडिया Now - कृपया हमें हमारा काम मत सिखाइए

कृपया हमें हमारा काम मत सिखाइए

medianow 09-05-2021 22:25:18


राहुल दुबे / हम नकारात्मकता नहीं फैलाते, वह आपके दिमाग में है. हम सिर्फ आपको वो खोखलापन दिखाते है. जिसकी मजबूती का दम्भ सिस्टम भरता है. मौत की खबरें सुनाई पड़ने से आपका बीपी हाई होता है. आपका दिल घबड़ाता है. आपको अच्छा नहीं लगता. कभी सोचा है आज जब अस्पताल में हजारों हजार लोग अपनी जान गंवा रहे हैं. ऑक्सीजन के लिए गिड़गिड़ा रहे है. बेड के लिए झोली फैला रहे होते हैं तो क्या बीतती है इस दिल पर उन्हें देखकर. जिस कोरोना के परिजन को आप दूर से देखकर मुंह मोड़ लेते हैं. वही परिजन हमारा हाथ खींचकर अस्पताल के अंदर ले जाता है कि इन्हें इलाज नहीं मिल पा रहा. हम उसका हाथ नहीं झिटकते है. हम उसे दिलासा देते हैं, सब अच्छा होगा धैर्य रखिए. कुछ करते है.

हम ऐसे समय में सिर्फ पत्रकारिता नहीं कर रहे होते हैं. हम मदद भी कर रहे होते है. हमारे जो सोर्सेज होते हैं. हम उनका इस्तेमाल करते हैं. हम बेड भी दिलवाते हैं, आक्सीजन, दवाइयां, जो हमसे हमारी क्षमता से बन पड़ता है दिलवाते हैं. हम दिलवा रहे हैं. आप में से ही किसी का परिजन किसी अस्पताल में दम तोड़ता है. परिजन सिर्फ डाक्टर से पूछता है कारण क्या रहा क्यों मर गए ये. लेकिन उनके हजार सवाल का सिर्फ एक जवाब मिलता है. आप बाद में बात करिएगा. अभी ये डेड बॉडी ले जाइए. तब हमें फोन किया जाता है. एक उम्मीद से, भरोसे से की हमारे जरिए वो अपना सवाल सिस्टम पर खड़ा करेंगे. हम उनकी बात उनके शब्दों को अपने अखबार में जगह देंगे तो वो इस शहर इस दुनिया को बताएंगे कि देखो कैसे काम कर रहा आपका सिस्टम.
उनका सवाल सुबह अखबार के पन्नो में होगा. सिस्टम जवाब नहीं देगा. तो वो उन्हीं अखबारों के पन्नो के सहारे कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे और उनसे न्याय की गुहार लगाएंगे.

आप कहते हैं कि हम नकारात्मकता फैला रहे है. आप कह रहे हैं हम दलाल हैं, हम बिकाऊ हैं. हम ये दिखा रहे हैं. हम ये नहीं दिखा रहे हैं. सिस्टम आपका ठीक काम न करे और दलाल और बिकाऊ हम हो गए.  हम रोबोट नहीं है. हम जिंदा है. हमारे परिवार है. माता पिता, पत्नी, बहन भाई ये सब हमारी भी राह देखते हैं. जब आप घर से नहीं निकल रहे हैं. तब हम सुबह से देर रात तक अस्पताल के उस वार्ड में खड़े होकर उन मरीजों से बात कर रहे होते हैं. जिन्हें आपने और आपके इस समाज ने छूत घोषित कर दिया है. उसके मरने पर आप कंधा देना तो दूर उसके परिजन का फोन नहीं उठाते हैं. और हमें नहीं पता होता है, कौन है, क्या है, किस धर्म, किस बिरादरी का है. हम करते उसकी मदद, अपनी पत्रकारिता छोड़कर उसके लिए एम्बुलेंस का इंतजाम करते हैं. उसे श्मशान भूमि में जगह न मिले तो उसके लिए व्यवस्था में लगते हैं. आप कह रहे हैं हम नकारात्मकता फैला रहे हैं.

हमें कोई शौक नहीं श्मशान घाट का रोज का चक्कर लगाने का. लेकिन क्या करे शहर में 100 मरते हैं और आपका सिस्टम कहता है आज 5 मरे हैं. तब हम जाते हैं श्मशान और आप कह रहे हैं कि हम श्मशान से रिपोर्टिंग कर रहे हैं. अब सुनिए आप लगाइए जयकारा क्योंकि आप साइकिल से बाइक और बाइक से कार पर आए हैं. आपको भी पता है आपने जयकारा नहीं लगाया तो आप फिर बाइक से वापस साइकिल तक आ जाएंगे. तो सिर्फ इसलिए लगाते रहिए जयकारा लेकिन कृपया हमें हमारा काम न सिखाइए. हमें हमारा काम न सिखाइए....!
- लेखक अमर उजाला के युवा पत्रकार हैं

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