मीडिया Now - कोरोना से लड़ाई-क्या सही स्ट्रेटजी है

कोरोना से लड़ाई-क्या सही स्ट्रेटजी है

medianow 10-05-2021 11:41:26


ब्रिगेडियर प्रदीप यदु / 1. इलाज़ पर्याप्त नहीं हैं, मरीज़ बढ़ रहे है , चिताएँ जल रहीं हैं साथ ही केंद्र व राज्य सरकारें "सब कुछ ठीक है" के दावे भी ठोक रहीं है। कँही ना कँही तो गड़बड़ है?क्या हमारी " कोरोना की लड़ाई " की स्ट्रेटेजी कारगर है ?

2. निष्पक्ष आंकलन की कोशिश की है , कुछ सुझाव भी दिये जा रहे है । सैनिक होने के नाते सेना  की चंद "Time Tested" प्रक्रिया को इस लड़ाई में किस प्रकार शामिल किया जा सकता है ताकि सफलता सुनिश्चित की जा सके, इसी पर ये पोस्ट आधारित है।

3. सबसे पहले " कांसेप्ट " को एक आम आदमी की भाषा में समझिये :--

* सैनिक सीमा पर दुश्मन से लड़ता है ; यँहा पर हर नागरिक कोरोना से लड़ रहा है । मतलब हर नागरिक एक सैनिक की भूमिका अदा कर रहा है और दुश्मन है "कोरोना"।

* सैनिकों की टुकड़ियां ( कम्पनी / बटालियन / ब्रिगेड / डिवीज़न ) का निर्धारित क्षेत्र होता है जिस पर दुश्मन को तबाह करना होता है ; यँहा पर पूरा देश रणभूमि है तथा दुश्मन हर जगह मौज़ूद भी है । मतलब हर नागरिक की " फ्रंट लाइन" वह जगह है जंहा वह रहता है।

* सैनिक को विजय प्राप्ति के लिए गोला बारूद / रसद / युद्ध सामग्री की ज़रूरत होती है ; यँहा पर ज़रूरत है पर्याप्त मेडिकल केयर , ऑक्सिजन और वैक्सीन की।

*  सैनिक को सभी सामग्री "फ्रंट लाइन" में पहुंचाई जाती है ना कि वह फ्रंट लाइन से उठकर पीछे की तरफ आता है और सामग्री लेकर वापस फ्रंट लाइन में जाता है ; यँहा पर नागरिक ( सैनिक ) हर बार अपनी "फ्रंट लाइन" से हटकर , दवाई/अस्पताल/टीके के लिये पीछे जाता है जबकि उसे ये सुविधाएँ उसे "फ्रंट लाइन" में मिलनी चाहिए ।

 * जब सीमा पर एक सैनिक गम्भीर रूप से घायल हो जाता है तो उसे "फ्रंट लाइन" से निकालकर पीछे
 "मिलिट्री अस्पताल" में ले जाया जाता है ; यँहा पर गम्भीर नागरिकों को स्वयं अस्पताल जाना होता है क्योंकि उसे " फ्रंट लाइन" में पूरा सामान नही दिया गया।

4. तो ये था, कोरोना की लडाई का बेसिक कॉन्सेप्ट।अब देखते हैं कि क्या सिविल प्रशासन में वो सभी संसाधन नही हैं जो सेना के पास हैं ? बिल्कुल हैं बल्कि अनुपात में सेना से कँही ज्यादा और बेहतर संसाधन है । पर सेना में एक " मज़बूत " सिस्टम होता है , हर सैनिक/ अधिकारी की जिम्मेदारी होती है और जबावदेही भी , जो सिविल प्रसाशन में शायद कम है । जंहा तक जबावदेही का प्रश्न है तो ये " ना के बराबर " ही है । पूरी ताकत को "आरोप-प्रत्यारोप" पर लगा दिया जाता है। इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाता  है कि "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से ज्यादा सफेद क्यों है" ?

5. अब आइये देखें कि वर्तमान सिविल प्रशासन का ढांचा क्या है और क्या ये कोरोना की लड़ाई जीत पाने हेतु सक्षम है - तो उत्तर है " पूरी तरह " विजय हासिल कर सकता है; कमी है " सिस्टम की और जबावदेही की"। चलिये आगे बढ़ते हैं :--

 *  यँहा पर पार्षद / महापौर / विधायक / सांसद / मंत्री / मुख्यमंत्री / राज्य व केंद्र सरकरें है जिनके साथ अपार संसाधन व संस्थान भी हैं ।

 *  अगर रायपुर शहर का उदाहरण लें तो यँहा 70 वार्ड हैं , 70 पार्षद हैं ,  01 महापौर है , 04 विधायक हैं और 01 सांसद है ? क्या ये सभी कोरोना की लड़ाई में सक्रिय हिस्सा ले रहे हैं ? उत्तर है नही । इनकी कोई जबावदेही नही है सिवाय " सफेद साड़ी " का खेल खेलने के ।

* हर पार्षद के पास पूरे वार्ड के हर नागरिक की जानकारी होती है , कौन कंहा रहता है उसे पता होता है। क्या पार्षद के नेतृत्व में एक टीम नही बनानी चाहिए जिसमें पर्याप्त मेडिकल स्टाफ हो , दवाईयां हों , वैक्सीन हों और ये टीम अपने पूरे वॉर्ड में घर घर जाकर कोरोना की लड़ाई लड़े । 

* हर पार्षद को हर दिन का लक्ष्य दिया जाय जिसे पूरा करना उसका काम होगा , उसे संसाधनों को मुहिया कराने की जिम्मेदारी महापौर तथा विधायक की एवं प्रशासन की होगी । विधायक के साथ उस क्षेत्र के सांसद हर विधायक के  क्षेत्र की समीक्षा करेंगे और इस लड़ाई में फ्रंट लाइन में बैठ मॉनिटर करेंगे ना कि अपने AC दफ्तर/निवास से "एक्सपर्ट कमैंट्स" देंगे । 

* जिस प्रकार नगर निगम शहरों में काम करेगी ठीक उसी प्रकार नगर पालिका , जिला पंचायत तथा ग्राम पंचायत अपने अपने क्षेत्रों में इस लडाई को लड़ेंगे।

* पार्षद से महापौर व विधायक  ,इनके द्वारा सांसद व स्वास्थ्यमंत्री व मुख्यमंत्री को सूचना दी जाएगी तथा हर दिन, स्वास्थ्य सचिव पूरे प्रदेश का बही-खाता TV के माध्यम से प्रदेश की जनता के सामने रखेगा। अगर लक्ष्य पूरा नही हुआ तो तथ्य देगा न की " बहाने बाजी " करेगा।

 * सबसे प्रमुख टास्क है , पूरी प्रक्रिया की " मॉनिटरिंग", अगर यँहा चूक हुई तो उस पदाधिकारी को फौरन जबावदेह बनाकर गिरफ्तारी के आदेश देना अनुचित नही होगा ।

6. इस मज़बूत सिस्टम की सफलता के लिए :--

* जो भी पार्षद / महापौर / विधायक / सांसद / मंत्री / मुख्यमंत्री हैं वो अपनी राजनैतिक पार्टी की विचारधारा को दफन कर एक जन प्रतिनिधि के रूप में काम करें ।

 * अब ये लड़ाई किसी दो या अन्य राजनैतिक दलों के बीच नहीं है ये अब आम जनता के "जीने-मरने" की लड़ाई है । या आप रहेंगे या कोरोना रहेगा ।पिछले 14 महीनों से जनता भुगत रही है और राजनैतिक दल सिर्फ
"ढोंग-ढकोसला-वाहवाही-जुमलों-आरोपों-चुनाव-हिन्दू-
मुस्लिम" का खेल , खेल रहे हैं । बंद करो इस खतरनाक खेल को ।

 * जो भी पार्षद / विधायक / सांसद /मंत्री लड़ाई लड़ने में असफल हैं, चोरी कर रहे हैं, इन्हें पहले जेल भेजो।

* जो भी  कालाबाजारी / निजी अस्पताल लूटमार कर रहे हैं उन्हें भी जेल भेजो । राक्षक इन निजी अस्पतालों के मालिक हैं ना कि डॉक्टर या अन्य चिकित्सा कर्मी । बड़ी मछली पकड़ो ना कि छोटे छोटे झींगे जो बिना मास्क के हैं या रेड़ी में सब्जी बेच रहे हैं। डकैतों को पकड़ो , चोर खुद व खुद चोरी बंद कर देंगे ।

7. जी भी ये कहते हैं कि " ये फौज नही है सिविल महकमा है " ; सबसे बड़े कायर और शातिर यही लोग हैं जो नही चाहते कि लड़ाई जल्दी से जीती जाय , ये चाहते हैं कि " लड़ाई चलने दो - तिजोरी भरने दो "। ये वो देशद्रोही हैं हो " आपदा में अवसर " ढूंढते हैँ मात्र अपने स्वार्थ के लिये ।

8.  तीन सिद्धांतो पर अमल करिये :--

* "Whenever things start going wrong in your command , start looking for flaws in concentric circles starting from your own desk ". 

* " It is easier to do a thing , rather than explain why it can not be done ".

*  " I am not interested in excuses for delay , I am interested only in things done". 

9.  सोने और लोहे को पहले आग में तपना पड़ता है , सुनार और लुहार की चोट खानी पड़ती है उसके बाद ही वह गहना या हथियार बनता है ।सिस्टम पर चोट करें उसे गहना बनायें ताकि हथियार ना बन सके।चेन कितनी भी मोटी क्यों ना हो , अगर एक कड़ी भी कमज़ोर हो गई तो वो चेन किसी काम की नही होती । कोरोना की लड़ाई में हर कड़ी जो मज़बूत रखिये जैसा सेना रखती है , विजय आपकी ही होगी ।

   जयहिंद ,

  ब्रिगेडियर प्रदीप यदु, सेवानिवृत्त
  रायपुर , छत्तीसगढ़

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