मीडिया Now - संगम तीरे फिर साहित्य की 'सरस्वती'

संगम तीरे फिर साहित्य की 'सरस्वती'

medianow 02-04-2021 15:45:58


अभयानंद कृष्ण / कक्षा में द्विवेदी युग पढ़ाते एक लेक्चरर के सामने उनका एक विद्यार्थी सवालिया अंदाज में जो प्रस्ताव रखता है उस सवाल और प्रस्ताव के मूल में इलाहाबाद की तासीर है। और इस तासीर का असर ऐसा कि चालीस साल पहले लुप्त हो चुकी साहित्य की सरस्वती संगम तट पर न फिर वजूद में आई है बल्कि साहित्य के श्रद्धालु इस ओर दौड़ चले हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादक होते हिन्दी साहित्य के आकाश में चमकता एक सितारा बनी सरस्वती उसी पुराने इंडियन प्रेस से छपने लगी है। मौजूदा समय से कदमताल करते हुए भी उद्देश्य वही पुराना है जिसने 1920 में इस पत्रिका को रूप और रंग दिया था। 

आप इलाहाबाद कहें या प्रयाग, आबोहवा में बसी तमाम खुशबुओं के साथ शब्दों की साधनामय सुगंध को भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। सरस्वती के लिए सहायक संपादक की भूमिका निभा रहे अनुपम परिहार बताते हैं कि एक दिन क्लास में एक विद्यार्थी मोहम्मद आदिल ने सरस्वती के पुनः प्रकाशन की बात की और इस तरह सरस्वती के पुनरागमन का बीज रोप दिया।  पूरे पांच बरस हर रोज इसके लिए कुछ न कुछ करते हुए अनुपम परिहार ने केंद्रीय हिन्दी संस्थान दिल्ली में प्रोफेसर देवेंद्र शुक्ल को संपादक पद की जिम्मेदारियों के लिए राजी कर लिया। साहित्यप्रेमी साथियों की मदद से दोनों लोग अवैतनिक रूप से जुड़कर सफर को आगे बढ़ाये।

सुखद यह कि पहले अंक के साथ ही सरस्वती को इस कदर  स्नेह और आदर मिला कि शुरुआती 1200 प्रतियों में तो कोई प्रति नहीं ही बची फिर छापने के बाद भी कम पड़ गई। त्रैमासिक पत्रिका के रूप में सामने आई सरस्वती में पहला खंड धरोहर नाम से है। जाहिर है इस खंड में पहले प्रकाशित हो चुके महत्वपूर्ण लेख खासकर द्विवेदी जी के नजरिया से जुड़ी सामग्रियां शामिल की जाती हैं। दूसरे हिस्से में मौजूदा साहित्य और साहित्य से जुड़े विचार होते हैं। अनुपम परिहार कहते हैं सरस्वती का उद्देश्य साहित्य का संवर्धन है न कि किसी खास विचारधारा का प्रतिपादन करना। अलबत्ता वह जोड़ते हैं कि सरस्वती वांग्मय की पत्रिका रही है, इसलिए इसका खयाल रखा जाता है। 

कहते हैं रेलवे में दो सौ रुपए माहवार की नौकरी छोड़ने के बाद द्विवेदी जी सरस्वती के संपादक पद को कुल तेईस रूपए महीने की तनख्वाह पर स्वीकारे थे। साहित्य के प्रति इस समर्पण की किसी न किसी रूप में मौजूदगी ही सरस्वती के नए सफर के शुरुआती कदमों में भी है। प्रो शुक्ल और अनुपम परिहार कोई वेतन नहीं लेते। साहित्य का अनुरागी सहयोग आर्थिक मोर्चा संभालता है। कामना है कि पत्रिकाओं की दुनिया में पसरी उदास खामोशी में सरस्वती की वीणा की तान संगीत की स्वरलहरी बिखेरे।

- लेखक मीडिया नाऊ के कार्यकारी संपादक हैं

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :