मीडिया Now - साधना - औरत ने जन्म दिया मर्दों को

साधना - औरत ने जन्म दिया मर्दों को

medianow 10-05-2021 20:10:11


वीर विनोद छाबड़ा/ जब 'साधना' (1958) रिलीज़ हुई थी, तब मैं आठ साल का था. इसका यह गाना  'औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया, जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया…' सुनता था. कभी गुनगुनाया भी. पर मतलब नहीं समझ पाया. बड़े-बुज़ुर्गों से पूछा तो खूब डांट पड़ी, छोटे बच्चे ऐसा वाहियात गाना नहीं गाते. बड़े होने पर इल्म हासिल हुआ तो मतलब समझ आया इसका मतलब. इसे हॉफरेट पर देखा. बहुत अच्छी लगी. हफ्ते में तीन दफ़े देखी. सुना था जब पहली ये फिल्म नई नई आयी थी तो इस गाने के स्क्रीन पर आते ही फ्रंट बेंचर्स स्क्रीन सिक्के उछालते थे. 

सभ्य समाज में बेशऊर और ज़ालिम बन्दों को शर्मशार करने वाला ऐसा गाना सिर्फ़ साहिर ही लिख सकते थे. लता जी ने पूरे दर्द से गाया और एन.दत्ता ने तबीयत से संगीत दिया. नयी पीढ़ी को भी हैरानी होगी कि औरत कल भी भोग विलास की वास्तु थी आज की तरह.  इसमें एक तवायफ़ को शरीफ़ों की दुनिया में फिर से बसाने की कोशिश की गयी थी. शिक्षक मोहन (सुनील दत्त) की मां सख्त बीमार है. डॉक्टर ने कहा दवाईयों से ज्यादा इनको बहु की ज़रूरत है. मोहन शादी के पक्ष में कतई नहीं है. एक हमदर्द पड़ोसी ने सुझाया कि वो एक एक्ट्रेस रजनी को जानता है, जो पैसे लेकर नकली पत्नी बनने को तैयार हो जायेगी. जब मां ठीक हो जाये तो उसे वापस भेज देंगे. मोहन राज़ी हो गया. रजनी को पत्नी बना कर घर ले आया.  और मां ठीक होने लगी. मां ने रजनी को बहु मानते हुए कीमती जेवरात भी दे दिए.  रजनी का मन बेईमान हो गया. लेकिन सहसा उसके अंदर की औरत जाग उठी. वो मोहन से प्यार करने लगी थे. दुल्हन बनने के सपने देखने लगी. मोहन भी उस पर जान छिड़कने लगा. लेकिन एक दिन वही हुआ जिसका भय था. मोहन और उसकी मां को पता चल गया कि रजनी कोठे की चंपाबाई है. सपने टूट गए. लेकिन 'अंत भला तो सब भला' के सुखांत नोट पर फिल्म खत्म हुई. रजनी को अपना लिया गया. उस ज़माने में कोठे वाली बाई का घर बसाना अफ़सानों में मुमकिन था लेकिन स्क्रीन पर नहीं.  स्क्रीन पर ऐसे किरदार को आख़िर में मरना पड़ता है या यूं कहें मारा जाता है. 

इस फ़िल्म से जुड़ी एक छोटी सी कहानी और भी सुनी है. पंडित मुखराम शर्मा बहुत प्रोग्रेसिव विचारधारा के लेखक थे. सुना गया कि उन्होंने ये कहानी बिमल रॉय को सुनाई. लेकिन उन्हें दिली धक्का लगा जब प्रगतिशील विचारों वाले विमल दा ने कहा कि इसका अंत बदल दो. समाज को तवायफ़ का घर बसाना ठीक नहीं लगेगा. मार दो उसे. लेकिन शर्मा जी अपने विचारों को बदलने को तैयार नहीं हुए. उस वक़्त वो बिमल दा की कार में बैठे उनको कहानी सुना रहे थे.  एंड बदलने के बिमल दा के सुझाव पर इतना ख़फ़ा हुए कि तुरंत कार रुकवा कर उतर लिए. और सीधे पहुंचे बीआर चोपड़ा के दरवाजे. चोपड़ा साहब ने कहानी सुनी और जब पता चला कि बिमल दा इसे रिजेक्ट कर चुके हैं तो 'ज्यूं के त्यूं एंड' के साथ फ़िल्म बनाने के लिए तैयार हो गए. 

समस्या हुई कास्टिंग को लेकर.  निम्मी को अप्रोच किया. लेकिन निम्मी तैयार नहीं हुई. उन्हें खतरा था कि तवायफ़ का किरदार करने से उनकी इमेज ख़राब हो जायेगी.  हालांकि पांच साल बाद 'मेरे महबूब' में उन्हें तवायफ़ बनना पड़ा. तब चोपड़ा साहब ने वैजयंतीमाला को अप्रोच किया, जो उनकी पिछली 'नया दौर' की नायिका थी. तब तक वैजयंती के नाम कुल दस फ़िल्में थीं और उम्र महज बाईस साल. बहुत आसान नहीं था ऐसे किरदार को निभाना जिसे समाज निगेटिव दृष्टि से देखता हो और फिल्म की कहानी जिसके आसपास ही घूमती हो. इसके लिए ज़बरदस्त कलेजा चाहिए. लेकिन वैजयंतीमाला ने इसे बतौर चैलेंज स्वीकार किया. किरदार को पूरी शिद्दत और मैच्योरिटी के साथ अदा किया. इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मिला और पंडित मुखराम शर्मा को बेस्ट स्टोरी का अवार्ड का.  
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :