मीडिया Now - हिंदी पत्रकारिता के बलिदान पुरुष की शौर्य कथा

हिंदी पत्रकारिता के बलिदान पुरुष की शौर्य कथा

medianow 25-03-2021 12:09:55


अक्सर हम अपने को ही भूलने लगते हैं। करीब दो दशक पहले की बात छोड़िए । उसके बाद की नस्लों का आलम ,तो सिहरन पैदा करने वाला है। निधन के पहले प्रख्यात कवि स्व. बालकवि बैरागी का इसी तरह का किस्सा सुनाया करते थे। किसी बड़े निजी स्कूल में  उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम समापन पर वे बच्चों के साथ गलियारे में रुके। वहाँ जो तस्वीर लगी थी ,उसकी ओर इशारा करके पूछा ,तुम में से कोई बताएगा यह तस्वीर किसकी है? बैरागीजी सन्न। किसी ने उत्तर नहीं दिया, बल्कि हँसने लगे। दरअसल, उक्त फ़ोटो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का था। पूरी सम्भावना है कि नए ,और पुराने पत्रकार भी नहीं बता सकें कि आज का दिन हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में  किसके, नाम और क्यों महफूज है। स्वंय आप को ही लज्जित होकर बताना पड़ेगा  कि भाई ,आज का दिन मार्च 25 हिंदी पत्रकारिता के एक  बलिदान एवं तीर्थ पुरुष गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत का दिन है। शहीद इसलिए कि आज के दिन विद्यार्थीजी को  कानपुर में दंगों के दौरान मार डाला गया था। वे दोनों समुदायों के दंगाइयों को समझाने गलियों में निकल पड़े थे। इसी बीच उन्हें मार डाला गया।इलाहाबाद ऊर्फ़ प्रयागराज ऊर्फ़ त्रिवेणी के इस शहर को आज भी साहित्य का तीर्थ कहा जाता है। और, शायद कल भी ऐसा ही होगा।

यहीं पण्डित गणेश शंकर विद्यार्थी  का ऑक्टोबर  26 ,1890  को जन्म हुआ था। पढाई लिखाई हिंदी, अंग्रेजी ,एवं ऊर्दू माध्यम से हुई। स्वतंत्रता संग्राम के ख़िलाफ़ पण्डितजी ने जेहादी लेखन किया, और कई बार जेल से लौटने के बाद और निडरता से लिखा। पत्रकारिता में तटस्थता की बात करना आज की ज़रूरत है, लेकिन अंग्रेजों की गुलामी के दिनों में कैसी तटस्थता, और कहे कि निष्पक्षता। हमें किसी भी कीमत पर आज़ादी चाहिए थी। इसीलिए  उन्होंने शहीद ए आज़म भगतसिंह के लेख भी प्रकाशित किए। चन्द्रशेखर आज़ाद, बालकृष्ण शर्मा नवीन, राजगुरु, सोहनलाल द्विवेदी, प्रतापनारायण मिश्र, जैसे राष्ट्र भक्त, देश प्रेमी उनकी टोली में शामिल थे। अब इस विरोधाभास में जाने का कोई मतलब नहीं कि विद्यार्थी जी मूलतः गांधी वादी थे। कलम की धार तलवार की मार से भी ज्यादा निर्णायक,और असरदार होती है। पण्डित जी ने कलम को तलवार बनाया। कहा जाता है कि उनके जैसा सिद्धातों का पक्का, हेकड, निडर, बेख़ौफ़ पत्रकार न तब हुआ और न शायद अब होगा।

देश भकि की ज्वाला से उनकी लेखनी कोई समझौता करने को तैयार न थी।उनके हौसलों को फ़िरंगी कभी तोड़ नही पाए। महात्मा गांधी को राष्टपिता कहा जाता है । बापू ने  राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता के लिए, जो वैचारिक गोला बारूद जुटाया, उसे प्रताप अखबार ने घर घर तक पहुँचाया। इसीलिए बापू ने विद्याथी जी को श्रद्धांजलि नही दी, बल्कि उनकी पत्नी, परिजनो को बधाई दी। विद्यार्थी जी ने कभी तीस रुपये माह की सरकारी नोकरी भी की, और वह इसलिए कि विवाह पश्चात गृहस्थी की जिम्मेदारियां उन पर आन पड़ी थी। इसी बीच उन्होंने कानपुर से प्रताप का साप्ताहिक प्रकाशन प्रारम्भ किया, फिर उसे दैनिक बनाकर प्रभा नाम से साप्ताहिक पत्रिका शुरू की। विद्यार्थी जी मात्र स्वतंत्रता संग्राम सैनानी, पत्रकार,लेखक, गांधीवादी ही नही थे बल्कि, समाज सुधारक भी थे। वे किसी भी कीमत पर देश मे अंग्रेजों द्वारा बांटों और राज करो के विष बीज को उखाड़ फेंक कर एकता और भाईचारे की फसल उगाना चाहते थे। इसीलिए अंग्रेजों के दमन का उन्होंने विरोध करने का कोई मौका नही छोड़ा। उनके एक मुस्लिम शायर हसरत मोहानी गहरे मित्र हुआ करते थे। मोहानी साहब की ही ग़जल आज भी मशहूर है, चुपके चुपके आंसू बहाना याद है। विद्यार्थी जी मानते थे कि गांधीजी के अलावा मोहानी जैसे लोग ही देश मे एकता और शांति स्थापित कर सकते है।

विद्यार्थी जी न कभी रुके, न कभी झुके, न कभी टूटे, न कभी बिखरे। उक्त कलमकार ने अंग्रेजों के हर जुल्म,उत्पीड़न, शोषण, क्रूरता और कायरता के खिलाफ शेर की मांनिद दहाड़ते हुए लिखा। कर्मयोगी, हितवार्ता, सरस्वती, हंस, स्वराज जैसे राष्ट्र भक्त अखबारों ने  फिरंगियों की नीदें उड़ा दीं। जिस दंगे में उनकी हत्या हुई वह कानपुर का पहला दंगा माना जाता है। उनकी समझाइश अनेक लोगों ने मान ली, लेकिन कानपुर के चौबे गोला चौराहे पर उनकी घेरकर हत्या कर दी गई। दंगा तो तत्काल रुक गया, मग़र उनका लावारिस शव फूली हुई अवस्था में अन्य लाशों के बीच दो तीन दिन बाद मिला। बताया जाता है कि कानपुर  की फीलखाना स्थित प्रताप अखबार की जर्जर हो चुकी तीन मंजिला इमारत अब सालों से असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुकी है। यह बात और है कि वहाँ गूंजते सन्नाटों  में से  विद्यार्थीजी के लिखे शब्दों की खुश्बू आबाद रहकर गुनगुनाती रहती है। वक़्त की बलिहारी है कोई इस तरह के स्थानों को यादों का खंडहर कहकर भुला देना चाहता है। अक्सर यह ज़मात उन्हीं लोगों की होती है ,जिन्होंने अपनी पॉश कॉलनी के पीछे स्थित झुग्गी झोपड़ी नहीं देखी होती है। वहाँ से बदबू आती है। वहाँ ,बेबसी गरीबी ग़ुरबत रोती है,भूख चीखती है, अशिक्षा  से बेरोजगारी के कारण अपराध पनपने हैं। उक्त कुनबा विदेश यात्राओं  के नाम अट्टहास लगाकर नीचा दिखाने का काम करता है। विद्यर्थिजी सबसे पहले लोकमानन्य गंगाधर तिलक के अखबार केसरी से प्रभावित हुए। तिलक उग्र पत्रकारीता के शायद जनक भी थे, और हरदम इसी तरह के लेखन के अंतिम हस्ताक्षर रहेंगे। उन्हें गोलमाल या बनावटी लेखन आता ही नहीं था। ऐसा ही बहुत कुछ विद्यार्थीजी के साथ भी था। सुना है, उनके नाम पर कानपुर में संकुल भी स्थापित किया गया है। अन्य कुछ शहरों में प्रतिमाएं या स्टेच्यू भी लगाए गए हैं ,मग़र गांधीजी की प्रतिमा की  ही अक्सर साफ सफाई नहीं की जाती ,तो विद्यार्थीजी की तो अब कोई ब्राण्ड वेल्यू  है ही नहीं। 

नवीन जैन,स्वतंत्र पत्रकार 

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