मीडिया Now - क्या यह नए खतरे की घण्टी है ?

क्या यह नए खतरे की घण्टी है ?

medianow 15-05-2021 10:10:53


नवीन जैन, स्वतंत्र पत्रकार /  कोरोना के साथ अब पूरे देश में ब्लैक फंगस का आतंक नामक बीमारी का आतंक फैल रहा है। नई दिल्ली, अहमदाबाद, और पुणे जैसे महानगर इसकी जड़ में आ रहे हैं। इन वर्ल्ड क्लास मेडिकल सुविधाओं वाले शहरों में जब ब्लैक फंगस से लोगों की आँखों की रौशनी जा रही हैं, और मौत तक हो रही है तो अंदाज़ लगाया जा सकता है कि पूरे देश का आलम क्या होगा, स्तिथियाँ कीतनी बिगड़ सकती हैं, और सम्भावित चुनोतियोँ से निपटने के लिए हमारी स्वास्थ्य सेवाएं, राजनीतिक नेतृत्व, सामाजिक संगठन, तथा अन्य सम्बन्धित लोग कितने तैयार हैं। ठीक है कि इस बीमारी के कारण फंगस, जिसे हिंदी में फफूंद कहते की तमाम डॉक्टर्स उपस्थिति पहले से ही मानते है। अच्छी सूचना यह भी है कि इसके छुआ छूत से फैलने का कोई वैज्ञानिक आधार अभी तक तो नहीं मिला।

अंतर्राष्ट्रीय समाचार सेवा बीबीसी की माने तो ब्लैक फंगस के रोगी की मृत्यु दर 50 फ़ीसद है।यह बात बीबीसी ने स्टार इमेजिंग लैब के निदेशक समीर भाटी के हवाले से कही है। समीर भाटी के हवाले बात करते हुए कहा कि ब्लैक फंगस अनियंत्रित शूगर या ट्रांसप्लांटेशन के रोगियों को हो सकती है। गम्भीर सवाल है कि इस महामारी तो नहीं जानलेवा बीमारी को लेकर भारत सरकार, और पूरा तंत्र किन खयालों में समय रहते किन खयालों में ग़ुम था। मजबूरन यह प्रश्न उठाना पड़ रहा है। कारण है कि बीबीसी ने दिसम्बर 23 ,2020 को ही अपने संवाददाता अनंत प्रकाश की एक रिपोर्ट जारी कर दी थी। अनंत प्रकाश ने नई दिल्ली के मैक्स, अपोलो, सर गंगाराम हॉस्पिटल, फोर्टिज,जैसे लब्ध प्रतिष्ठित चिकित्सा केंद्रों के नाक, कान, और गला रोग विशेग्यो से बात चीत करके उक्त रिपोर्ट जारी की थी। उक्त पत्रकार ने लिखा था कि कोरोना से स्वस्थ हुए लोग स्टेरॉयड दवा लेते हैं। मैक्स हॉस्पिटल के इएनटी के नामी डॉक्टर सजंय सचदेवा के हवाले से उक्त रिपोर्ट में कहा गया था समय रहते यदि ब्लैक फंगस को पहचान लिया है तो इलाज के द्वारा इस बीमारी से रोगी की जान बचाई जा सकती ,लेकिन इसके लिए हैवी डोज़ दिया जाता है,जिसके कारण मरीज को लम्बे समय तक हॉस्पिटल में ही रहना पड़ता है।

आसानी से सोचा जा सकता है कि बेड, ऑक्सीजन, आवश्यक इंजेक्शन, अस्प्ताल, वेंटीलेटर आदि का एक तरह से अकाल पड़ा हुआ तो कोरोना से स्वस्थ होकर लोटे, मग़र ब्लैक फंगस के रोगियों के अस्पतालों का इंतजाम कौंन, और कैसे करेगा। हमारे हुक्मरान यदि सत्ता के खेल को ही जीवन की एकमात्र उप्लब्धि नहीं मान लेते तो कोरोना की दूसरी लहर में कथित नरसंहार या प्रलय से बचा जा सकता था। थोड़ी सी भी ईमानदारी से यदि केंद्र सरकार पता लगाना चाहे तो पता चल जाएगा कि कथित कोरोना टीका उत्सव कितना सफल या असफल रहा।अब यदि ब्लैक फंगस के डोजेस का परफेक्ट फॉर्मूला भारत के पास है भी तो कब नो मन तेल होगा ,और कब राधा नाचेगी? ब्लैक फंगस भी हवा में तैरती या उड़ती मौत तक कहा जा सकता है। डॉ. संजय सचदेवा के अनुसार इस जटिल बीमारी का वायरस हवा के साथ उड़कर, जिसे अंग्रेजी में एयर बॉर्न  कहा जाता है, मानव शरीर की नाक रास्ते बलगम में प्रवेश करता है। रोगी के शरीर में गेंग्रीन नामक बीमारी के चलते ऑपरेशन करना पड़ता है। संभावना बनी रहती की रोगी की रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती जाए, और ब्लैक फंगस के प्राण घातक वायरस दिमाग को ध्वस्त कर दे, और रोगी दुनिया से बिदा हो जाए। एक अन्य वरिष्ठ डॉक्टर मनीष गुंजल का कहना है यह बीमारी है तो गम्भीर ,मग़र डरने जैसी कोई बात नहीं है। ज़रूरी सिर्फ़ इतना है कि इसके शुरुआती लखन की पहचान सुनिश्चित कर ली जाए। तमाम बड़े चिकित्सक ब्लैक फंगस शुरुआती सिम्पटम्स पर एक मत हैं, और ये हैं धुंधला, या नहीं दिखना, आँखो, ऊपरी होंठ पर सूजन आना, आँखों का लाल पड़ जाना आदि।जान लें कि अभी तक इस आशय का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है कि किसी भी सामान्य व्यक्ति को उक्त सिम्पटम्स देखते हुए ब्लैक फंगस ही हो जाएगा।नहीं ।कतई नहीं। ऐसा कहना घोर गैरजिम्मेदाराना, भड़काने वाली, और बात का बटँगड़ बनाने वाली बात होगी।निष्कर्ष है कि कोरोना से बाहर आए मरीज़ों ने यदि स्टेरॉइड का सेवन किया है, या केन्सर के कारण किसी की कीमो थेरेपी हुई है, या उसकी शूगर अनियंत्रित रहती है, या  व्यक्ति बुजुर्ग है, और उसका सिर दुख रहा तो उसे उचित डॉक्टर का परामर्श लेना चाहिए। ब्लैक फंगस बीमारी की खबरों में शुरुआत में दम नज़र आ रहा है। कारण,इन्दौर स्थित मद्य्यप्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में ब्लैक फंगस वार्ड अलग से बना दिया गया है।भोपाल ,और जबलपुर में भी के अस्पतालों में भी दो ब्लैक फंगस ऑपरेशन थियेटर स्थापित किए गए हैं। देश में ऐसा पहली बार हो रहा है। तमाम डॉक्टर्स का कहना है कि ब्लैक फंगस बीमारी का कारण स्टेरॉइड दवा का ज्यादा सेवन है जिसमे आंख और जबड़ो तक का ऑपरेशन करना पड़ सकता है।

नवीन जैन ,स्वतंत्र पत्रकार

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