मीडिया Now - यह दवा है या मजाक? मोदी जी, यह सिस्टम की ढिलाई नहीं है?

यह दवा है या मजाक? मोदी जी, यह सिस्टम की ढिलाई नहीं है?

medianow 16-05-2021 17:53:04


संजय कुमार सिंह / दवाइयों के मामले में हमारे देश के लोग डॉक्टर की बात मानते रहे हैं और डॉक्टर घोषित रूप से बहुत बेईमान न हो तो लोग उसे भगवान मानते हैं। पूजते हैं। कोविड-19 के टीके को भारत सरकार ने मजाक बना दिया है। दो टीकों में से एक टीके की दो खुराक के बीच अचानक अंतराल बढ़ा देना, डॉक्टर स्वास्थ्य मंत्री द्वारा एक और मंत्री के साथ मिलकर बाबा की दवा का प्रचार करना और अंतराल बढ़ाने पर कुछ न बोलना। एक खुराक लगने के बाद दूसरी न मिलना और फिर अंतराल बढ़ा दिया जाना - बच्चों के खेल में भी नहीं होता है। दूसरे टीके पर चुपी अलग रहस्य है।  

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है कि अंतराल बढ़ाने के बाद जो लोग पुराने तय समय पर टीका लगवाने गए उन्हें टीका नहीं लगाया गया। यहां तक तो ठीक है। बात समझ में आती है। लेकिन डिजिटल भारत में जब ऑनलाइन बुकिंग हो रही है तो लाबार्थियों को सूचना क्यों नहीं दी गई? बात इतनी ही नहीं है, टीके के पैसे ऑनलाइन नहीं लिए जा रहे हैं और पंजीकरण के बावजूद पैसे देने के लिए घंटों लाइन लगना पड़ रहा है। ऐसे में डिजिटल बुकिंग का क्या मतलब? कैसा डिजिटल भारत? 

अब नया सुनिए। इस पत्र के अनुसार टीके की खुराक का अंतराल 12 से 16  हफ्ते कर दिया गया है। घोषणा के तीन दिन बाद कोविन पोर्टल में आवश्यक बदलाव कर दिया गया है। नतीजतन अब 84 दिन से कम पर दूसरी खुराक के लिए समय नहीं लिया जा सकेगा। लेकिन पहले से समय लिया है तो वह वैध रहेगा। मतलब आपकी मर्जी। लाभार्थियों को 'सलाह दी जाएगी' कि वे 84 दिन के बाद दूसरी तारीख लें (पर यह जरूरी नहीं है)। तीसरा बिन्दु है, अगर आप चाहते हैं कि पहले से बुक तारीख पर ही लें और वह 84 दिन से कम है तो कोविन सिस्टम आपको टीका लेने देगा। मतलब वह भी ठीक।  

तो बढ़ा क्या? साफ है कि दूसरी खुराक का स्टॉक आने तक समय बढ़ा दिया गया है। हद है। प्रधानसेवक जी कहते थे कि दूसरे लोग निर्णय नहीं ले पाते थे। वे बहादुर हैं कर लेते हैं। नोटबंदी के बाद अपनी पीठ खुद थपथपाई थी। अब निर्णय लेने से कोई मरे-जिए आपको मतलब ही नहीं है तो उसे बहादुरी नहीं कहते हैं, प्रधानमंत्री जी। यह सिस्टम की लाचारी है। इससे कितने लोगों को कितना तनाव हुआ होगा अंदाजा है? बहुत बुरी स्थिति है। शर्मनाक। ऐसे तो चाय की दुकान भी नहीं चलती है, मोदी जी।
- लेखक जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं

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