मीडिया Now - लालबहादुर वर्मा जैसे विद्वान, देहरादून शहर के एक कोने में रहते हुए विदा ले लें, समाज को क्या फर्क पड़ता है?

लालबहादुर वर्मा जैसे विद्वान, देहरादून शहर के एक कोने में रहते हुए विदा ले लें, समाज को क्या फर्क पड़ता है?

medianow 17-05-2021 21:35:37


सुभाष चन्द्र कुशवाहा / आधुनिक भारत और यूरोपियन इतिहास के प्रकांड विद्वान, जिसके अंदर आमजन के बेहतरी की आवाज थी, के चले जाने से सत्ता प्रतिष्ठानों में कहीं कोई खबर नहीं बनती। खबर तो बनती है लफंगों और अपराधियों के मरने पर। यह इस मुल्क का दुर्भाग्य है कि एक असभ्य दरोगा को लोग सम्मान देते हैं मगर शहर के विद्वानों की कोई जरूरत नहीं महसूस करते। ऐसा समाज कभी बेहतरी की ओर नहीं बढ़ सकता।

जिन्होंने दुनिया पर राज किया, उनका इतिहास अगर हम पढ़े होते, तब भी कुछ सीखते। कट्टर धार्मिक मिजाज के तैमूरलंग की आत्मकथा पढ़ते हुए आप पाएंगे कि वह हमेशा बुद्धिजीवी, विद्वानों, शिल्पकारों और कवियों का सम्मान करता रहा। चाहें वे गैर-मुस्लिम क्यों न रहे । उसने असंख्य हत्याएं कीं मगर विद्वानों को हमेशा सम्मान दिया। अपने दुश्मनों के राज्य के विद्वानों का भी और अपने से असहमत विद्वानों का भी। आज हमारा समाज विद्वानों,  योग्य इतिहासकारों या साहित्यकारों के लिए नहीं है। इसलिए सारे वैज्ञानिक विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। सारे शोध बाहर हो रहे हैं।

अवध का किसान विद्रोह पर काम करते समय मैंने कनाडा के एक स्कॉलर की थीसिस पढ़ी। वैसा कोई शोध अवध क्या पूरे देश के विश्वविद्यालयों में नहीं पाया। आज सभी विद्वानों, साहित्यकारों या हर किसी की आर्थिक हैसियत ऐसी नहीं कि वे किसी अन्य मुल्क में जा बसें, इसलिए उन्हें यहीं मरना है। चाहें लालबहादुर वर्मा जैसे विद्वान, देहरादून शहर के एक कोने में रहते हुए विदा ले लें, समाज को क्या फर्क पड़ता है? उनके होते, उनका क्या उपयोग किया हमने? तिकड़म कर उन्हें विभागाध्यक्ष न बनने देने से लेकर पेंशन न देने तक रोड़े अटकाए। हां, उनके विद्यार्थियों, उनको चाहने वाले और कुछ सौ सभ्य लोगों को यह सब जरूर दुःखद लगेगा। बस उन्हीं से ऐसे विद्वान कुछ उम्मीद छोड़ विदा लेते हैं।
- लेखक एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं

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