मीडिया Now - ये लाटसाहब ही हैं क्या?

ये लाटसाहब ही हैं क्या?

medianow 18-05-2021 11:51:43


कनक तिवारी / अनुच्छेद 153:- प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। अनुच्छेदः 154:— ’’राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा। (2) इस अनुच्छेद की कोई बात-(क) किसी विद्यमान विधि द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी को प्रदान किए गए कृत्य राज्यपाल को अंतरित करने वाली नहीं समझी जाएगी; या (ख) राज्यपाल के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी को विधि द्वारा कृत्य प्रदान करने से संसद या राज्य के विधान-मंडल को निवारित नहीं करेगी।‘‘ मशहूर बौद्धिक चिंतक और समाजवादी नेता डाॅ. राममनोहर लोहिया ने संविधान में राज्यपाल पद की स्थिति को देखते हुए कड़ी टिप्पणी की थी कि इन लाट साहबों की ज़रूरत ही क्या है?

ऐसे राजनेता भी राज्यपाल नियुक्त होते रहे हैं जिन्होंने सियासी हाराकिरी करने में कंजूसी नहीं बरती। आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल ने एन.टी. रामाराव सरकार को बर्खास्त करने में हड़बड़ी और असंवैधानिकता दिखाई। केन्द्र की कांग्रेसी सरकार की जगहंसाई हुई। कर्नाटक के पी. वेंकटसुबैया ने राज्य विधानपरिषद में मनोनयन के तीन सदस्यों की राज्य सरकार का प्रस्ताव तीन महीने ठंडे बस्ते में डाले रखा। केरल की रामदुलारी सिन्हा ने कालिकट विश्वविद्यालय संबंधी राज्य शासन का अध्यादेश महीनों तक पढ़ने की ज़हमत तक नहीं उठाई और बिना मंजूर किए वापस किया। रोमेश भंडारी ने त्रिपुरा के असाधारण पक्षपात, अदूरदर्शिता और गैरबुद्धिमत्ता की मिसाल कायम की। 1966 में केरल के तत्कालीन राज्यपाल अजित प्रसाद जैन के खुले आम इंदिरा गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता बनाने के लिए प्रचार करने से अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी।

शीला कौल और कुमुद बेन जोशी ने संवैधानिक कदाचार करने में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया। शीला कौल के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों कुलदीप सिंह और फैजानुद्दीन की बेंच ने कहा उन्हें पदावनत हो जाना चाहिए। कुमुद बेन जोशी ने आंध्रप्रदेश के लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर पद की गरिमा की काफी छीछालेदर की। संतोषमोहन देव और कल्पनाथ राय के सर्वख्यात उदाहरण हैं। पहले राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने सावधानी, दूरदर्षिता और भविष्य दृष्टि का नायाब उदाहरण पेश करते अपने दोस्त तथा बंबई के गवर्नर श्रीप्रकाश को समझाइश दी कि वे रफी अहमद किदवई स्मृति स्मारक कोष से खुद को अलग रखें। उन्होंने आंध्रप्रदेश के गवर्नर वी.वी. गिरि को भी पत्र लिखा कि बहुत लंबी छुट्टियां नहीं लिया करें। ऐसा ही पत्र मध्यप्रदेश के गवर्नर एच.वी. पाटस्कर को भी लिखा। पंजाब के गवर्नर एन.वी. गाडगिल को भी  डॉ. प्रसाद ने चेतावनी दी थी कि सार्वजनिक रूप से विवादग्रस्त राजनीतिक विषयों पर कोई बात नहीं कहें।

केरल के राज्यपाल वी. विश्वनाथन ने तो राज्य मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तावित राज्यपाल के अभिभाषण का टेक्स्ट ही बदल दिया था। तमिलनाडु गवर्नर सुरजीत सिंह बरनाला ने अपना तबादला बिहार किया जाने पर ऐतराज किया। तो उनकी जगह कांग्रेस नेता भीष्मनारायण सिंह को राज्यपाल बना दिया गया। बिहार के राज्यपाल मोहम्मद यूनुस सलीम ने तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कहने पर बिहार की लालू प्रसाद यादव सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश करने से मना कर दिया था। जनता दल सरकार में भी कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू करने राज्यपाल भानुप्रताप सिंह का उपयोग किया गया। हरियाणा के गवर्नर जी.डी. तपासे ने देवीलाल को बहुमत सिद्ध करने के लिए विधायकों को लाने का निर्देश दिया लेकिन बिना प्रक्रिया पूरी हुए भजनलाल को मुख्यमंत्री बना दिया। जम्मू कश्मीर में जगमोहन का अलग अलग समय पर लगातार राजनीतिक इस्तेमाल होता ही रहा है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने अजय मुखर्जी मंत्रिपरिषद द्वारा तैयार राज्यपाल का अभिभाषण पढ़ने से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि उसमें केन्द्र की आलोचना के अतिरिक्त खुद धर्मवीर की उलाहना थी। यह बात उन्होंने अपने संस्मरणों की किताब में दर्ज की है।

राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल नियुक्त करने के लिए अनुच्छेद 74 के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह मानना आवश्यक है। लेकिन राज्यपाल को केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि, नुमाइंदा एजेन्ट या सेवक संविधान के अनुसार नहीं समझा जा सकता। उसकी संवैधानिक जवाबदेही संविधान की प्रतिज्ञा के अनुसार है, राष्ट्रपति या केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के प्रति नहीं। केन्द्र की राजनीतिक विचारधारा, आदर्श आदि से सामंजस्य नहीं होने के आरोप पर पद से नहीं हटाया जा सकता। किसी मुद्दे पर केन्द्र और राज्य शासन की दृष्टियों में फर्क हो तो संवैधानिक मीमांसाओं को छोड़कर अन्य विवादास्पद मुद्दों पर राज्यपाल के लिए लाज़िमी होगा कि राज्य मंत्रिपरिषद की राय को तरज़ीह दे। राज्यपाल के द्वारा चलाए जा रहे प्रशासन में सहयोग और सहायता के लिए मंत्रिपरिषद होती है। राज्यपाल की मंजूरी के बिना विधानसभा कोई विधायन प्रभावशील नहीं कर सकती। आवश्यक होने पर वह पारित अधिनियमों को भी दुबारा विचार के लिए वापस कर सकता है। राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के बिना भी राज्यपाल पर कई संवैधानिक ज़िम्मेदारियों का पालन करने का दायित्व है। सरकारिया आयोग ने राजनीतिज्ञों को यथासंभव राज्यपाल नहीं बनाए जाने की सिफारिशें की हैं।

राज्यपाल के विवेक पर एक विवादास्पद सवाल उत्तराखंड प्रदेश से आया था। कांग्रेस के नौ दागी विधायक ‘चौबे जी छब्बे बनते बनते दुबे बन गए।‘ अपील पर सुप्रीम कोर्ट टस से मस नहीं हुआ। कोर्ट की भृकुटि से लगा कि उत्तराखंड में राज्यपाल के कहने पर राष्ट्रपति शासन लगाना उसे गवारा नहीं था। महाराष्ट्र में विवाद था कि रांकापा के अजित पवार द्वारा 54 विधायकों के समर्थन की कथित चिट्ठी के कारण आनन फानन में राज्यपाल कोश्यारी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार को शपथ दिला दी। न्यायमूर्तियों रमन्ना, अशोक भूषण और संदीप खन्ना की सुप्रीम कोर्ट के खुद के न्यायिक आचरण के पूर्व उदाहरणों से अलग हटने पर नहीं हो सकती थी। बहरहाल इस वजह से महाराष्ट्र की राजनीति की धुंध चौबीस घंटे में ही साफ हो गई। दिल्ली के लिए संशोधित अनुच्छेद 239-क क के संदर्भ में भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने बेहतर लिखा कि राज्य मंत्रिपरिषद की शक्ति और दिल्ली विधानसभा की कार्यपालिका शक्ति को एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
 
अमित शाह तब गुजरात के मंत्री थे। उनको लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सदाशिवन ने फैसला दिया जिससे अमित शाह षड़यंत्र के आरोप से बरी हो गए। इसके तत्काल बाद उन्हें केरल का राज्यपाल बना दिया गया। अमित शाह ने केरल की कानूनसम्मत सरकार को धमकी दी वह गिरफ्तारियों को लेकर परहेज और नियंत्रण करे, वरना भाजपा कार्यकर्ता केरल की सरकार की ईंट से ईंट बजा देंगे। राजनीतिक पार्टी के द्वारा सरकार को उखाड़ फेंकने की धमकी देना कैसे संविधानसम्मत है? राज्यपाल सदाशिवन फिर भी चुप रहे।

संविधान में यही प्रावधान है कि राज्यपाल अपनी सरकार की कार्यवाहियों में किए जा रहे विलोप को राष्ट्रपति को सूचित करते रहेंगे। इस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संवैधानिक कर्तव्यों से स्वयमेव संबद्ध हो जाते हैं। वे फिर भी चुप हैं। राज्यपाल धनकड़ कलकत्ता हाईकोर्ट की संविधान पीठ के सामने बंगाल की चुनावी हिंसा के मामले की सुनवाई और टिप्पणी के बावजूद बंगाल के क्षेत्राधिकार के बाहर असम का दौरा क्यों कर रहे हैं? लगता है बंगाल को संवैधानिक युद्ध का कुरुक्षेत्र बनाया जा रहा है। जो संविधान के आड़े आएगा, संविधानविरोधी आचरण करता कहलाएगा। संविधान और उसकी मर्यादाओं की रक्षा करना राज्यपाल का पदेन कर्तव्य है। अन्यथा पद पर बने क्यों रहें? संविधान संलिष्ट, विरोधाभासी और अंतर्संबंध प्रावधानों का कुतुबनुमा है। मुख्यधारा से रिटायर राजनीतिज्ञों को डाॅ. लोहिया के जुमले में लाट साहबी की आसंदी सौंपने की फितरतें होती ही रहती हैं। ‘नागनाथ गए तो सांपनाथ आए,‘ या ‘गुड़ खाएं, गुलगुले से परहेज़ करें‘ जैसी कहावतों का बाज़ार गर्म होता रहता है। केन्द्र सरकार के पास जादू की पुड़िया और अदृश्य छड़ी होती है। मंत्रिपरिषदों को राज्यपालों से भिड़ा दिया जाता है। मीडिया प्रबंधन तो मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है ही।
- लेखक हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं

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