मीडिया Now - व्यथा छतरपुर जिले की: चिताओं की राख मे दब गया मौत का सच

व्यथा छतरपुर जिले की: चिताओं की राख मे दब गया मौत का सच

medianow 21-05-2021 14:46:36


धीरज चतुर्वेदी / हजारों में मौंत होने का अनुमान 
- क्षेत्रीय पत्रकारों के सर्वें में अनायस बढ़ते मौंत के आंकडे 
- ना जांच - ना कोरोना की पुष्टि और चमकदार हो गये प्रशासन के आंकड़े 

कोरोना का एक ओर सैलाब सा आया और मौतों की संख्यां बढ़ गया। यह महसूस तो उन लोगों ने किया जिनके अपने अनायास ही साथ छोड़ कर चले गये। जिनकी चितायें जली, राख भी मिली जो पवित्र नदियों में समाहित कर दी गई । इन परिवारों में बहुतायत उन लोगों कि है जो अचानक ही जीवन में अपनो को खो कर मर्म हाथों से चितायें जला आये जिन्हें यह नहीं पता कि मौंत का कारण क्या था। उन्हें तो सदमा है कि कोई अपना बिछुड़ गया। किसी के पिता थे तो किसी की मां, किसी का घर उजड़ गया बस। ग्रामीण क्षेत्रों में मौंतों की संख्यां की नौकरशाहों ने तपाश तक करना उचित नहीं समझा क्योंकि मौंत के आंकड़े उनकी असफलता को बयां कर देते है। छतरपुर जिले में सरकारी रिकार्ड में सैकडों मौतें कोरोना से नहीं हुई पर गांवो में अचानक रोज क्यों चितायें जलती रही इसकी पड़ताल करना भी उचित नहीं समझा गया। गांवो के लोग अचानक क्यों मर रहे हैं इसकी जांच के लिये नौकरशाह का वह अमला हैवानियत का चोला ओढ़े बैठा है जिसे अपने आंकड़े गुरूर वाले बताना चाहता है। यह सौ फीसदी सच है कि ग्रामीण ईलाकों में किसी तरह कि जांच नहीं हुई। एक घर घर सर्वै की औपचारिकता निभाई गई तो सरकारी रिकार्ड भरने के काम आई। अगर हकीकत में यह सर्वे कारगर होता तो कोरोना मामलो की पुष्टी भी होती और गांवों में बिलखते परिवारो की संख्यां भी कम होती। एक सर्वे में छतरपुर शहर का हिस्सा माने जाने वाले ग्राम बगौता, नजदीकी ग्राम खौप व निवारी, बडामलहरा के ग्राम महाराजगंज, लवकुशनगर के कस्बा बारीगढ़, हरपालपुर क्षेत्र के ग्राम सरसेड सहित अनेको ग्रामों में इस दौरान कमोवेश अंतिम संस्कार स्थलों पर रोज ही किसी ना किसी कि चितायें जलती रही। अगर इस औसत से पूरे छतरपुर जिले का आंकलन किया जाये तो अनायास या कहे कि संदिग्ध मौतों का आंकड़ा प्रशासन को शर्मसार कर देने जैसा है। एक मौंत की भी कीमत होती है यहां तो सैकड़ों चले गये और यही पता नहीं चला कि आखिर क्यों? 

छतरपुर की एडीबी (स्टेट बैंक) शाखा में पदस्थ फील्ड आफीसर 55 साल के जमना रैकवार की आखिर अचानक मौंत हो गई, आखिर क्यों ? जमना रैकवार के भाई मोहन रैकवार ने बताया कि दो दिन हल्के बुखार के बाद उनके भाई जमना को सांस लेने में परेशानी होने लगी। कोविड की गंभीरता को भांपते उन्हे तत्काल जिला अस्पताल में 21 अप्रैल को भर्ती करा दिया। अस्पताल प्रशासन ने भी लापरवाही बरतते हुये उन्हें नाजुक हालत के बाद भी जमना को सामान्य वार्ड में भर्ती करा दिया। उनका 21 अप्रेल को कोविड जांच के लिये सैम्पल लिया गया। जमना के सिटी स्केन में लग्सं में इनफेक्शन पाया गया। 22 अप्रैल को जिला अस्पताल में ही मौंत हो गई। अस्पताल से मिले मृत्यु प्रमाणपत्र में कोरोना से मौंत का उल्लेख नहीं है वहीं कोरोना जांच के सेम्पल की सूचना उनके मोबाईल नंबर प्राप्त हुई। आखिर जमना रैकवार की मौंत का कारण क्या रहा, कोई बताने वाला नहीं है। मुख्यमंत्री के कोरोना से मृत परिवार को राहत देने की घोषणा बाद मृत्यु प्रमाण पत्र के लिये भीड़ की संख्या प्रशासन की कलई खोलने जैसी है। कई ऐसे मामले सामने आ रहे है जिनकी कोविड जाँच पॉजिटिव है पर उनकी मौत के बाद अन्य कारण दर्शाये जा रहे है। शुद्ध रूप यह प्रशासनिक कुकृत्य है जो सच पर पर्दा डालने की सुनियोजित साज़िश का हिस्सा है। जब शहर मे पॉजिटिव की मौत पर सरकारी कालिख का स्वांग रचा जा रहा हों तो ग्रामीण अंचलो के क्या हाल होंगे जहाँ ना जाँच हुई और ना ही पुष्टी हुई और रोज मौत की संख्या बढ़ती रही। देश बदलते जुमलो की यही असली तस्वीर है कि कोरोना वायरस से मिलते लक्षणों से मौंत हो जाती है पर सरकारी रिकार्ड में खिलखिलाहाट का तमाशा है। छतरपुर के जिला अस्पताल में अनगिनत ऐसे मरीज आये जिनके कोरोना वायरस से मिलते लक्षण रहे और जिनकी मौंत हो गई लेकिन यह मौंत कोरोना के रिकार्ड में दर्ज नहीं हो पाई। कारण रहा कि छतरपुर का प्रशासन अपनी नैतिकता को आंकडो की बाजीगरी के कारण गिरवी रख चुका था। उसे तो नंबर बटोरने थे,, बस इसी गुणतंगे में अधिकारियों को ना तो मृत्यु दर में बढते आंकडे दिखे और ना ही शहर सहित गांवो में संक्रमितों की तलाश करवाना उचित समझा।

अधिकारियों के अपने निज स्वार्थ में मौंत का खेल खेलने वालों ने यह नहीं सोचा कि जब किसी बस्ती में झोपडों में आग लगती है तो उनका मकान और मुकाम भी उसी हद में है। अनुमान के मुताबिक छतरपुर जिले में भी अपुष्ट संक्रमितो के कारण ग्रामीण अंचलो में एक के बाद एक चितायें जलती रही। छतरपुर जिले के पत्रकारों ने ग्रामीण अंचलो में पिछले एक-डेढ माह में मौंत होने की पड़ताल की तो जो परिद्श्य सामने आया है वह चौंकाने वाला है। पत्रकारों के सर्वे का औसत निकाला जाये तो छतरपुर जिले में औसत मृत्युदर का आंकड़ा एक हजार से अधिक का है जो प्रशासन के अमानुषिक रूप का चेहरा दर्शाने जैसा है। छतरपुर शहर के नजदीकी ग्राम में अचानक मृत्यु दर में तेजी से इजाफा हुआ है। गांव के सचिव गोविन्द दास रावत के अनुसार बगौता गांव में कोरोना से कोई मृत नहीं हुआ पर पिछले कुछ दिनों में ही कम से कम डेढ़ दर्जन से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इस गांव में ना तो कोई जांच हुई और ना ही अचानक मौंतों की संख्या बढ़ते देख स्वास्थ्य अमला ने पड़ताल करने की कोशिश की। इस गांव में सबसे अधिक प्रभावित रैकवार मोहल्ला रहा। इसी तरह नजदीकी ग्राम निवारी और खौंप में ही करीब 30 मौंत हो गई। हरपालपुर के पत्रकार सुनील रिछारिया बताते है कि नजदीकी ग्राम सरसेड में अचानक मौंत का आंकड़ा बढ़ हैं। पिछले डेढ माह में दस से अधिक मौंत इस गांव में हुई। पत्रकार सुनील रिछारिया के सर्वे में इस इलाके में अचानक मौंत के आंकडे बढ़े है। छतरपुर जिला मुख्यालय से महज 16 किमी दूर मांतगुवां के पत्रकार केशव मिश्रा बताते है कि गांव में कभी ऐसी लगातार चितायें जलती नहीं देखी गई। करीब 15 लोगों की पिछले एक माह में अनायस मृत्यु हो गई। ग्राम चैका जो अब छतरपुर शहर से महज 8 किमी दूर है जिसे शहर का हिस्सा माना जाता है वहां स्वास्थ्य विभाग के सुपरवाईजर रंजौरा अहिरवार की 18 मई को मौत हो जाती है। उसकी पत्नी की इसी दौरान पूर्व में मृत्यु होती है और रंजौरा का शिक्षक भाई भी अचानक मर जाता है। एक मामला मामौन का है जहां एक ठाकुर परिवार में तेरहवीं के दिन उनके पारिवारिक सदस्य की मौंत हो जाती है। हाईप्रोफाईल बडामलहरा क्षेत्र की बात की जाये तो इस नगर से सटे महाराजगंज में पिछले कुछ दिनों में डेढ दर्जन से अधिक चितायें जली गई। पत्रकार गिरजू पटैरिया बताते है कि इस इलाके के गांवो में शायद ही ऐसा कोई गांव हो जो मृत्यु दर में इजाफा ना हुआ हो। बारीगढ़ के पत्रकार बताते है कि अकेल उनके कस्बे में ही पिछले कोरोना काल में दो दर्जन के करीब चितायें जली हैं। अधिकृत रूप से 15 मृतको के मृत्यु प्रमाणपत्र भी जाारी कर दिये गये है। यह सेम्पल सर्वे है जो कोरोन की दूसरी लहर में हजारो लोगो की मौंत होने की पुष्टी करता है। इस सर्वे से अलग क्या प्रशासन ने गांवो में होने वाली मौत के पीछे कारणो की जांच की है ? आखिर क्यों अचानक ग्रामीण अंचलो में मृत्यु दर में इजाफा हो गया। अगर इसके कारणों की पड़ताल की जाती तो कोरोना के कारण मृत्यु सख्यां के आंकड़े भी बढ़े दिखते। कुल मिलाकर यह है कि पूरे छतरपुर जिले में कोरोना काल में संदिग्ध मौतों के बढ़ते आंकडो पर गौर किया जाये तो अधिकांश की मौंत का कारण कोरोना से लक्षित लक्षण रहे है। हजारो मौंत का आंकडा विचलित करने जैसा है किन्तु अधिकांश वह है जिनकी ना तो करोना जांच हुई और ना ही पुष्टी हो सकी। एक जिम्मेदार समाचार पत्र ने छतरपुर शहर में 1 मार्च से 31 मार्च के बीच 63 और 1 अप्रेल से 30 अप्रेल के मध्य 148 अंतिम संस्कार होने का दावा किया है। अगर यह सच है तो कई सवाल उठते है कि क्या छतरपुर का प्रशासन हकीकत में कोरोना से मौंत के आंकड़ों को हकीकत में छुपाने के लिये बाजीगरी में जुटा रहा है। ताकि चितायें जलती रही और रूदन होता रहे पर आंकड़ो के घेर में शबासी मिलती रहे। क्या मौंतों पर भी सरकारी हैवानियत हावी होती है तो सचमुच देश बदल रहा है।

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