मीडिया Now - धूप का पेड़

धूप का पेड़

medianow 23-05-2021 15:28:46


कबीर संजय / हममें से हर कोई गूगल को जानता है। बिना उसके जिंदगी का कामकाज मुश्किल है। बड़ी हद बीस सालों में उसने हमारे जीवन में ऐसी जगह बना ली है कि उसके बिना गुजारा नहीं है। यहां तक कि कई लोग उसे गूगल बाबा भी कहते हैं। लेकिन, क्या आप गूग्गल के पेड़ के बारे में जानते हैं। यही वह पेड़ है, जिससे धूप निकलती है। यानी धूप का पेड़। तो आइये जानते हैं इस पेड़ के बारे में...धूप बत्ती जलाने से निकलने वाली खुशबू बहुत सारे लोगों को बेहद पसंद होती है। इसकी भीनी-भीनी खुश्बू का इस्तेमाल वे एक अलग ही अलौकिक छटा प्रदान करने के लिए करते हैं। जबकि, आयुर्वेदिक दवाइयों में भी इनका इस्तेमाल होने की बात कही जाती है। तमाम पुरानी सभ्यताओं में धूप जलाने या धूप से बनी अगरबत्ती को जलाने का चलन रहा है। कुछ मच्छर-मक्खी को दूर भगाने के लिए भी इसका इस्तेमाल करते हैं। अब बाजार में तमाम मिलने वाली धूप में कितना रासायन मिला हुआ है, इसकी बात मैं नहीं करता। लेकिन, धूप का पेड़ कभी हमारे देश के उत्तरी हिस्से से बहुतायत में पाया था। 

यह लगभग चार मीटर की ऊंचाई तक पहुंचने वाला एक झाड़ीनुमा पेड़ होता है। जिसकी शाखाओं पर कांटे भी लगा करते हैं। यह शुष्क जलवायु वाले इलाकों को पसंद करता है और बहुत कम उपजाऊ मिट्टी में भी अपनी जमा लेने वाला जिजीविषा वाला पेड़ होता है। इसका वैज्ञानिक नाम कोमीफोरा विघटी है। जबकि, इसे इंडियन बेडुलियम ट्री के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय तौर पर इसे गुग्गल, गुगुल, गुगाल और मुकुल के नाम से भी जाना जाता है। इस पेड़ की छाल से एक खास किस्म की गोंद जैसा निकलता है। जिसे जलाने पर गाढ़े धुएं के साथ भीनी-भीनी खुश्बू आती है। इसे ही धूप कहा जाता है। इसी से अगरबत्तियां तैयार की जाती रही हैं। 

लेकिन, इसके इन्हीं गुणों के चलते एक जमाने में इनका इतना ज्यादा दोहन किया गया कि आज वे समाप्त होने की तरफ बढ़ रहे हैं। यह पेड़ तेजी से खतम हो रहा है। आईयूसीएन की लिस्ट में इसे सीआर कैटेगरी में रखा जाता है। यानी क्रिटिकली इंडेंजर्ड। यानी संरक्षण नहीं किया गया तो यह लुप्त हो जाएंगे। खास बात यह है कि धूप के लिए पाकिस्तान और भारत के भी कुछ हिस्सों में व्यावसायिक तौर पर उगाया जाता है। लेकिन, इस पेड़ का इतना ज्यादा दोहन किया गया है कि ये सामान्य जंगलों और हरित क्षेत्र में दिखना बंद हो गए हैं। अगर आप इस पेड़ के बारे में जानना चाहते हैं तो गूगल पर जाकर गूग्गल ट्री टाइप करके जान सकते हैं। लेकिन, यहां पर इतनी लंबी कहानी का सुनाने का मकसद कुछ और है। 

यह पेड़ कभी अरावली पर्वत श्रृंखला की भी खासियत हुआ करता था। यहां की शुष्क और पथरीली जमीन पर यह प्राकृतिक तौर पर खूब उगा करता था। लेकिन, लोगों ने धूप निकालने के लिए पेड़ के पेड़ काट लिए। उससे उनका तात्कालिक मकसद तो पूरा हो गया, यानी धूप मिल गई। लेकिन, अगली पीढ़ियों के लिए यह पेड़ ही खतम हो गया। अब अरावली की जमीन को फिर से यह पौधा लौटाने की पहल की गई है। दिल्ली के एकमात्र वन्यजीव अभ्यारण्य असोला भाटी में अरावली के नेटिव पेड़ों की नर्सरी स्थापित की गई है। इसमें पचास से ज्यादा ऐसे पौधे तैयार किए जा रहे हैं जो अरावली की आबोहवा में ढले हुए स्थानीय पौधे हैं। यह सचमुच में एक बड़ा काम है। हो सकता है कि आप बाजार में ग्लैडुलाई और लिलि खोजने जाए तो आपको आसानी से मिल जाए। लेकिन, बाजार में या सामान्य नर्सरियों में आपको बहेड़ा और रोंझ का पौधा हो सकता है नहीं मिले। यहां पर तैयार किए जाने वाले पेड़ों में 17 तो ऐसी प्रजाति के हैं जो अब लुप्त होने की श्रेणी में पहुंच गए हैं। 

इन्हें यहां पौधों के रूप में तैयार किया जा रहा है। फिर इन पौधों को अरावली के अलग-अलग हिस्सों में रोपा जाएगा। स्थानीय आबोहवा के अनुकूल होने के चलते वे अरावली की हरियाली बढ़ाने में मददगार होंगे। मेरे मित्र, पर्यावरणविद् और दिल्ली में बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के संयोजक Sohail Madan  दिल्ली सरकार के साथ मिलकर इस नर्सरी को तैयार करने में जुटे हुए हैं। अभी तीन-चार महीने ही हुए हैं और यहां पर अरावली की नेटिव प्रजातियों के एक लाख से ज्यादा पौधे तैयार हो गए हैं और इन्हें मानसून का इंतजार है। सोहेल जी ने अपने घर में बड़े ऐहतियात के साथ गुग्गल का एक पौधा लगाया था। जिसे अब उन्हें अरावली की जमीन पर रोप दिया है। पोस्ट के साथ एक फोटो उसकी शेयर की जा रही है। जबकि, एक फोटो यहां बनी अनोखी नर्सरी की है। एक अन्य फोटो नर्सरी में तैयार किए गए गिलोय के पौधों की है। उम्मीद है कि हमारी अगली पीढ़ियों को अरावली का यह हिस्सा धूप की खुश्बू से गमकता-महकता मिले...
आमीन.
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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