मीडिया Now - वो सुबह कभी तो आएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

medianow 24-05-2021 11:10:50


नवीन जैन,वरिष्ठ पत्रकार / कार्टूनिस्ट विनय चानेकर के दो कार्टून्स ने पाठकों को झकझोर  गए। ये कार्टून्स लोग शायद ही कभी भूल पाएं। पहला कार्टून कोविड की के पहले प्रहार के दौरान का। याद करें, महाराष्ट्र के जालना ज़िले में तब रेल की पटरियों रात में निढाल होकर सो गए प्रवासी मजदूरों को ट्रेन ने रौद दिया था।इस घटना ने देश भर में हाहाकार मचा दिया था। विनय चानेकर की नीदें भी उड़ गई।वे लगातार छटपटाते रहे। वे मजदूरों की वेदना का अनुमान लगाकर विक्षिप्त  जैसे हो गए।दिलो दिमाग को चीरकर रख देने वाली इस घटना का व्यंग्य चित्र बनाते हुए, तकलीफ़ इस व्यंग्य चित्रकार को महसूस हो रही थी,उससे उनकी कूची में बार बार ठहराव आ जाता था। इस व्यंग्य चित्र को पाठकों ने कोविड के दस्तावेज की तरह सम्हालकर रखा हुआ है। पत्रकार के पास समय, जगह, सोच आदि कम होते हैं। इसलिए वह खबर को चाहकर भी पूरे संवेदनात्मल्क तरीके से लिख पाता। उक्त सभी तत्वों के अलावा कार्टूनिस्ट के पास करारी भाषा शैली होती। उसके पास वह तीखी नज़र भी होती है, जो खबर की तलहटी में दबी असली खबर को पकड़ने का बाज़ जैसा हुनर आता है। इसी के चलते कार्टूनिस्ट पत्रकार का बचा खुचा दायित्व गहरी मानवीय करुणा,और जिम्मेदारी से व्यक्त कर देता है। खबरें तो सम्हाल कर रखी नहीं जा सकती,मग़र कोविड काल की बदसूरत, और खूबसूरत यादों के कार्टून या व्यंग्य चित्र दस्तावेज हो जाते हैं। विनय का कहना है कि उक्त घटना ने उन्हें अंदर से हिला कर दिया था। सूझ ही नहीं रह था कि कैसे पर पीड़ा को अपनी पीड़ा बनाकर व्यक्त करूँ। बहुत मानसिक त्रास का काम था यह। नागपुर निवासी विनय चानेकर ने रेमेडिसिवर इंजेक्शन को लेकर मची ले दे पर भी व्यंग्य चित्र बनाए,जो प्रतिनिधि कार्टून कहलाए। इस कार्टूनिस्ट का कहना है कि कलाकार की गति न्यारी होती है। नैसर्गिक से उसके अंदर दूसरों से अधिक संवेदनशीलता होती है। इन्दौर निवासी इस्माईल लहरी तो कार्टून कला के गुरू कहलाए जाने लगे हैं। लहरी ने इन्दौर के फाइन आर्ट्स कॉलेज से डिग्री प्राप्त की है। उनके कोरोना पर बनाए विभिन्न कार्टून बेहद चर्चित हुए हैं। उनके एक कार्टून में आदमी की मूर्खता व्यक्त की गई है।इस व्यंग्य चित्र में एक बंदा पेड़ काटते हुए दिखाई दे रहा है। उस व्यक्ति से जब कोई पेड़ काटने का सबब पूछता है तो जवाब मिलता है, इस जगह नया ऑक्सीजन प्लांट बनाया जाएगा।

इस्माईल लहरी के फैसबुक पर लगभग चौबीस हज़ार फालोअर्स है। लहरी के एक अन्य कार्टून में एक डॉक्टर कोरोना ग्रसित व्यक्ति की जाँच करते हुए बताया गया है, जबकि वह व्यक्ति कोविड से नहीं, भूख से छटपटाहटा रहा है। इस व्याकुलता पर इस्माईल लहरी ने कैप्शन डाला है,फिलहाल इसे ऑक्सीजन की नहीं, भोजन की आवश्यकता है। लहरी का एक और कार्टून चर्चा में आया,जिसमें ऊपर रोटी बनी हुई, नीचे एक श्वान हसरत भरी नज़रों से रोटी की तरफ देख रहा है। उक्त व्यंग्य चित्र इंगित करता है कि हम कोरोना की आपा धापी में पशुओं के खान पान की चिंता करना ही भूल गए। कोविड को लेकर कार्टून के माध्यम से अलख जगाने में भागीदार इस्माईल कहते हैं, कि व्यग्य  चित्र सिर्फ हंसाने के लिए नहीं होते,बल्कि औरों की वेदना को स्वर देने का माध्यम होते हैं। इस स्वर से महज चीख़ ही निकलती वरन तमाम तंत्र को सुधारे जाने की पुकार भी निकलती है। इस मुहिम को समर्पित लोगों में एक मैं भी हूँ।मेरी चाहत है कि लोगों के चेहरे मुस्कानों से फिर आबाद हों। बेरहम वक़्त ने जो छोटी छोटी खुशियाँ हमसे छीन ली हैं, वह अपने गुस्से को थूककर हमारी गलियों में रोशनी फैला दें।

इसीलिए हम सभी रोज़ कार्टून बनाते हैं। आख़िर वो सुबह तो फिर आएगी। एक ज़माने में टाइम्स ऑफ इंडिया इसलिए भी खरीदा जाता था कि उसमें शंकर ,लछमन के कार्टून सिर्फ़ हंसाते ही नही थे ,बल्कि तत्कालीन राजनीतिक,सामाजिक, आर्थिक,कला,संस्कृति,वैश्विक दुश्वारियों पर कार्टून के ज़रिए सर्जरी या मरम्मत की कोशिश की जाती थी। शंकर ने तो शंकर्स वीकली कार्टून पत्रिका तक निकाली थी। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा की शिव सेना के संस्थापक स्व. बाला साहब ठाकरे सबसे पहले कार्टूनिस्ट थे। उन्होंने अपना करियर मुम्बई के फ्री प्रेस जर्नल से शुरू किया था। इंग्लैंड की महारानी एलिजबेथ अपने पर बनाया उनका कार्टून साथ ले गई थीं। फ़िर ठाकरे की कार्टून पत्रिका मार्मिक बड़ी चर्चित हुई। सुधीर तैलंग भी असमय चले गए,वर्ना उनके काम पर भी पाठकों की नज़रें गड़ने लगी थीं। जब हिंदी के जनसत्ता अखबार ने पूरे देश को निडर, और निष्पक्ष पत्रकारिता की नई परिभाषा दी तो उसमें काव के कार्टून का भी बराबर का हाथ था। काक, दरअसल उक्त कार्टून के पात्र का नाम था।इसे बनाते कोई शुक्ल जी थे,और काक का मतलब होता है कौव्वा। कौव्वा या कागला अशुभ शुभ दोनों की सूचना देता है।धर्मयुग साप्ताहिक पत्रिका के साढ़े चार लाख तक पहुँचने का कारण उसमें छपने वाली आबिद सुरती की कार्टून स्ट्रिप भी  था।दंग कर देने वाली बात है कि राजस्थान के बीकानेर शहर में कभी कार्टूनिस्ट की एक गली तक बन गई थी।इस कार्टून स्ट्रीट में हर दूसरे घर में से कोई न कोई कार्टून बनाता था।पद्मश्री अवार्डी टीवी पत्रकार विनोद दुआ ने इस कार्टून स्ट्रीट पर केंद्रित आधे घण्टे की फ़िल्म बनाई थी।दिक्कत तब हो जाती जब फ्रांस जैसे खुले दिमाग वाले देश किसी धर्म विशेष की मज़ाक बनाने वाले कार्टून को बढ़ावा देकर विवाद खड़ा कर देते हैं।भारत जैसे देश में तो राजनेता इतने असंयमित होने लगे हैं कि राजनीति पर कार्टून बनाने वालों को जेल की हवा तक खानी पड़ती है।

माना जाता है कि आधुनिक कार्टून कला के जनक अमेरिका के रिचर्ड एफ. आउट कोल्ट थे। उनका पहला ही कार्टून हिट तो हुआ भी मगर पिटा ज़्यादा।फिर भी उन्हें इल्म था कि यह अनजान विधा एक दिन गुल खिलाकर रहेगी। और ऐसा कई बार हुआ भी।उन्होंने पहला कार्टून 1895 में रेखांकित किया था।पुणे में  प्रत्येक वर्ष कार्टून कट्टा यानी कार्टून की बोरी नाम से देश भर के कार्टूनिस्ट के जमावड़ा होता  है ,जिसके अध्यक्ष नागपुर के घनश्याम देशमुख है। विनय चानेकर, इस्माईल लहरी के अलावा चन्द्रशेखर रेड्डी, रघुपति, भरत जगताप,हरीओम तिवारी, चंद्रशेखर हाडा, साजिद कुमार,मनोज कुरील,सानू रघुवंशी,और हेमल सोलंकी के कोविड पर केंद्रित कार्टून्स लगातार चर्चा में है।फिर से कहना पड़ेगा कि यह कला अपने आप में एक सम्पूर्ण विधा है। ज़रूरत सिर्फ़ अलग दृष्टि,व्यंग्य बोध,सर्जनात्मक बैचेनी, अंतर्मुखी होना , एकाग्रता, चितन ,सामाजिक हित वगैरह की होती है।अक्सर दो चार आटी तिरछी रेखाओं के साथ एक कसी हुई टिप्पणी में जो बात बन जाती है,वह हुनरमंद पत्रकार बड़े लेख में  भी नहीं कह पाते।

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