मीडिया Now - कनीज़ खून माफ़ करती है

कनीज़ खून माफ़ करती है

medianow 25-05-2021 13:25:54


वीर विनोद छाबड़ा / के.आसिफ़ की मुगल-ए-आज़म को जिन कई वज़हों के लिए याद किया जाता है, उसमें डायलॉग भी हैं.डायलॉग्स की भी अहमियत भी है. हम लोग कहते थे, वाह! क्या डायलॉगबाज़ी है यार! ये डायलॉग आम ज़िन्दगी में जुमले भी बने थे. हम याद दिलाने की इजाज़त चाहते हैं कि आसिफ़ के राइटर्स की फौज ने हर डायलॉग पर भी कई कई दिन तक बहुत मनन हुआ तब जाकर डायलॉग ज़ोरदार बना और हाल तालियों से गड़गड़ा उठा.  
ज़रा याद करें उस नज़ारे को जब अनारकली को बादशाह अकबर मौत का हुक्म सुनाते हैं और सेनापति मान सिंह अनारकली से कुछ यों कहते हैं - बादशाह के निज़ाम का ये दस्तूर है कि मरने वाले की आख़िरी आरजू पूरी की जाये.  
अनारकली कहती है - साहिबे आलम (सलीम) मुझे मलिका बनाना चाहते थे, मेरी आरजू है कि मरने से पहले मुझे मलिका बनाया जाए. 
बादशाह अकबर तंज कसते हैं - आखिर तेरी कमज़र्फी मौत के ख़ौफनाक साये के बावजूद तेरी जुबां पर आ ही गयी. 
अनारकली कहती है - साहिबे आलम ने मुझे मलिका बनाने का वायदा किया था और मेरी आरजू है कि हिंदुस्तान के होने वाले शहंशाह पर वादा ख़िलाफ़ी का इलज़ाम न लगे. 
बादशाह अकबर लाजवाब हो जाते हैं - ठीक है हम हिंदोस्तान के होने वाले बादशाह को शर्मिंदा नहीं होने देंगे. लेकिन तुम्हें मरना ही होगा अनारकली.  
अनारकली कहती है - कनीज़ मर तो बहुत पहले से ही चुकी है. यह कहते हुए वो चेहरे को दुपट्टे से ढक लेती है - अब जनाज़ा निकलने की इजाज़त दीजिये.  
बादशाह अकबर अनारकली के सर पर मलिका हिंदुस्तान का ताज रखते हुए ताक़ीद करते हैं, सहर होने से पहले इस फूल की खुशबू को सलीम को सुंघाना होगा ताकि वो हमेशा हमेशा के लिए भूल जाए कि अनारकली का कभी कोई वज़ूद भी था. और अगर ऐसा न हुआ तो याद रहे, सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और अनारकली हम तुम्हें जीने नहीं देंगे. 
स्क्रिप्ट के मुताबिक यहां सीन ख़त्म होना था. लेकिन आसिफ़ को कुछ खटक रहा था, कोई कमी लग रही है. अनारकली आखिर एक पावरफुल औरत है, कनीज़ है तो क्या हुआ? उसने मोहब्बत की है, हिंदुस्तान के होने वाले बादशाह से. और मोहब्बत करने वाली औरत कमज़ोर नहीं होती. कुछ ऐसा जवाब अनारकली के मुंह से निकलना चाहिए कि शहंशाह अकबर लाजवाब हो जाए. और दुनिया भी इसे याद रखे. 
इल्म-ओ-अदब से गहरा रिश्ता रखने वाले अम्मान साहेब, एहसान रिज़वी साहेब और वज़ाहत मिर्ज़ा साहेब जैसे धुरंधर फिर से माथा-पच्ची करने बैठ गए. कई कागज़ रंग डाले. ऐसे डिसकशंस में आख़िरी बाज़ी अक्सर वज़ाहत मिर्ज़ा साहेब के ही हाथ रहती थी. उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मिर्ज़ा ने कागज़ पर लिख कर आसिफ़ को दिखाया. 
आसिफ़ बोले, बाआवाज़-ए-बुलंद पढ़ा जाए. 
मिर्ज़ा साहेब ने पढ़ा - शहंशाह की तमाम बक्शीशों के बदले में ये कनीज़ जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को अपना खून माफ़ करती है. 
और आसिफ़ ने मिर्ज़ा को गले लगा लिया. 
अगर वक़्त मिले तो यू-ट्यूब पर 'मुगल-ए-आज़म' के इस हिस्से को ज़रूर देखें. अश-अश कर उठेंगे. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :