मीडिया Now - सारी गलती सुखई की है जो तेल खा-खा कर उसे मंहगा करता जा रहा है

सारी गलती सुखई की है जो तेल खा-खा कर उसे मंहगा करता जा रहा है

medianow 25-05-2021 21:08:15


रणविजय सिंह / करीब छः महीने पहले एक दिन घरेलू सामान का बिल देखा था।बाकी तो याद नहीं पर सरसों का तेल 130 रुपए लीटर था। कल सामान आया। लड़के को पैसा देना था।सोचा एक बार जोड़ तो देख लूं। कहीं गलत न हो। देखा तो सरसों तेल के आगे 220 रुपया लिखा था। मुझे लगा कि दो लीटर का किफायती पैक भेज दिया है। दुकानदार मेरा फायदा कराना चाह रहा है। मैने लड़के से कहा कि एक लीटर वाला पैक ठीक रहता है इसलिए वह तेल का दो लीटर वाला पैक बदल कर एक लीटर वाला लेता आए।साथ ही बिल भी ठीक करा लाए। लड़का हड़बड़ा गया। जल्दी से सामान चेक करने लगा। सरसों का तेल एक ही लीटर निकला। उसने मुझे बता और दिखा दिया। मैंने उससे पूछा कि फिर यह दो सौ बीस रुपए क्यों?वह हंसने लगा।बोला_ यह तो बहुत दिनों से इसी रेट पर चल रहा है। कितने दिन से पूछने पर पता चला_करीब दो महीने से। अर्थात उसके बहुत दिन का मतलब दो महीने होता है। मेरा बहुत दिन अगर देखें तो कम से कम छः महीने जब पिछली बार मैने सरसों के तेल का दाम देखा था होता है। वैसे होना तो उसे जनवरी 2020 चाहिए। यह वही काल है जबसे केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों का  मंहगाई भत्ता बढ़ाना बंद कर रखा है। मंहगाई भत्ता बंद किया तो सरकार ने मंहगाई भी बंद कर रखी होगी।

देश की सरकारें प्रजावत्सल हों या न हों पर अपने कर्मचारियों का विशेष ध्यान अवश्य रखती हैं। वैसे भी इनका कर्मचारी खुद को सरकार ही मानता है, कर्मचारी नहीं। जैसी कि देश में स्थापित परंपरा है सरकार को पहले अपने लोगों, अपने भाई-भतीजों का ध्यान रखना होता है। ऐसा न करने पर सरकार गिर भी सकती है। सरकार का कोई भी नेता  नहीं चाहता की सरकार गिरे क्योंकि सरकार बनाने के मूल में उसकी जनता की सेवा करने की उत्कट अभिलाषा होती है। और वह जनता की सेवा के अवसर को किसी कीमत पर हाथ से जाने नहीं देना चाहता।समय मिलते ही जनता की सेवा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध रहता है। बस समस्या समय की होती है। देश की सभी सरकारों की यही प्रतिबद्धता है।वे जनता की सेवा करना चाहते हैं पर जनता उन्हें समय ही नहीं देती।कभी पांच तो कभी दस साल बाद सरकार बदल देती है। यही वह समय है जब सरकार को अपने और संबंधियों के विकास से थोड़ा समय मिलने वाला होता है। आखिर दीया पहले घर में ही जलाई जाती है। मंदिर का नंबर तो इसके बाद ही आता है।

अगले कार्यकाल में सरकार जनता के लिए कुछ करने का संकल्प लेती है कि तभी लोग उसे इस मौके से वंचित कर देते हैं। सारा दोष जनता का है। वह उसे समय ही नहीं देती। कभीकभी सरकारों को अपने सम्पूर्ण विकास में तीस पैंतीस साल भी लग सकते हैं। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में हुआ ही था। अगली बार जैसे ही वह लोगों के विकास के बारे में निश्चय करती है,जनता पासा पलट देती है।अब आप ही बताइए,गलती किसकी है।सरासर की या जनता की? चीन को देखिए। कितना विकसित हो गया है।कारण ढूंढना नहीं है। शी जिनपिंग आजीवन सरकार के प्रमुख हैं। रूस,क्यूबा ,उत्तरी कोरिया सबका यही हाल है। आंकड़े क्या दिखाते हैं? सब जगह विकास हुआ है। जनता का भी हुआ ही होगा। आंकड़े चाहिए तो वे उसे भी बना देंगे। इन सभी जगहों पर सरकार के नेता को जीवनपर्यंत पद पर बने रहने की छूट दी गई है। अब वहां जनवादी सरकारें हैं तो जनता का विकास तो हुआ ही होगा। आप मानें या न मानें वहां की जनता न मानने का जोखिम उठाने को कतई तैयार नहीं होगी। अब अगर जनता खुलेआम विकास न होने की बात नहीं कहती है तो आप क्यों नहीं मानेंगे? अब्दुल्ला दीवाना हैं क्या?

अपने देश में यही बुराई है।कोई जरा सा प्रयास भी करता है तो हो _हल्ला मच जाता है।जरा सी इमरजेंसी लगाओ तो सब जगह विरोध। पता नहीं लोग कब समझेंगे कि यह सब उनके हित के लिए किया जा रहा है। नेता आजीवन पद पर रहेगा तो कभी उनके विकास के लिए भी सोचने का समय पा सकता है।उम्मीद पर दुनिया कायम है। आप भी यह उम्मीद रखिए। कहते हैं कि लोग अपनी गलती खुद ही भुगतते हैं।वही हो रहा है। आप स्वयंअपने विकास का किसी को अवसर ही नहीं देना चाहते सो भुगत रहे हैं नहीं तो देश अब तक अगर चीन नहीं तो उत्तर कोरिया जरूर बन चुका होता। पाकिस्तान और चीन की कौन कहे हमसे अमेरिका की भी रूह कांपती। हां,तो बात सरसों के तेल की चल रही थी।तेल और जूं का बड़ा निकट का संबंध है। बालों में तेल लगाने वाले जूं से अधिक परेशान रहते हैं। कान में तेल डालने से अनावश्यक चीजें सुनाई नहीं पड़ती।सरकार ने यही महंगा तेल कान में डाल रखा था इसलिए बढ़ती कीमतों से निश्चिंत थी।लोगों की चीख_पुकार से निश्चिंत। पर तभी तेल देख कर वहां जूं पहुंच गई।कान में तेल होने से वह वहीं रेंगने लगी।कान पर जूं के रेंगने से सरकार के आराम में खलल पड़ी। अपने आराम में खलल उसे बर्दाश्त नहीं इसलिए उसने राज्य सरकारों के लिए इस इस संबंध में  हुक्म जारी किया।शायद उसके हाथ दूसरे कामों में फंसे होंगे। वैसे भी जूं दूसरों से ही निकलवाया या मरवाया जाता है। सो परंपरा का भी सवाल रहा होगा।हुक्म हुआ कि राज्य सरकारें खाद्य तेलों का दाम नियंत्रित करें!

मेरे जैसे लोगों को अब तक एक भ्रम था। हम सोचते थे कि किसी भी वस्तु यहां तक कि खाद्य तेलों की कीमतों को आम आदमी की पहुंच के भीतर बनाए रखना सरकार का काम है। आज पता चला कि इसके लिए केंद्र सरकार के निर्देश की आवश्यकता होती है। दूसरा भ्रम था कि इसके लिए प्रमुख रूप से केंद्र सरकार जिम्मेदार होती है आज पता चला कि यह जिम्मा केंद्र नहीं राज्य सरकारों का है।अब ये सरकारें काम करेंगी और हर राज्य में खाद्य तेलों की कीमतें अलग_अलग होंगी।हैं न बढ़िया बात! जब नियंत्रण की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है तो महंगाई का भी अपराध उन्ही का है। केंद्र सरकार पूरी तरह से दोषमुक्त घोषित की जाती है। हम अनावश्यक उसे  कोस रहे थे। बेचारी केंद्र सरकार! इस सबके बीच मुझे साधु बाबाराजा राम मिश्र की याद आती है।हमारे यहां भोजन बनाते थे। साधु वेशधारी थे।खाना अच्छा बनाते थे पर कभीकभी उसमें कुछ कमियां भी निकल जाती थीं।उनके सहायक सुखई थे।जब भी खाना अच्छा बनता था तो उसका श्रेय बड़ी तत्परता और बड़बोलेपन से ले लेते थे। किंतु खाना हमेशा अच्छा ही नहीं बनता था। कभीकभी सुखई की गलतियों के कारण खराब भी हो जाता था।अब वह पानी ठीक नहीं देगा,मसाला ठीक नहीं पीसेगा,लकड़ी अच्छी नहीं देगा,लालटेन में तेल नहीं ठीक भरेगा आदि,आदि तो खाना तो खराब बनेगा ही। खाना खराब कहे जाने पर यह सब साधु बाबा के सदैव चर्चित बयान होते थे।अतः अच्छा काम बाबा का,गलती सुखई कीमुहावरा बन गया था।

मुहावरे को अपनाने से पहले इस पर और भी विचार आवश्यक है।केवल खाद्य तेलों की मंहगाई के आधार पर इसको पेटेंट मत कराइए।आगेपीछे और देखिए फिर निर्णय लीजिए।जल्दबाजी नहीं।इसे पेटेंट कराने के लिए कोई दूसरा लाइन में नहीं लगा है।फिर जल्दी कैसी?देखिए कि हमने देश के लिए अब तक क्याक्या नहीं किया जो कि सरकार के अनुसार हमें करना चाहिए था ?सरकार को दोष मत दीजिए।उसकी जिम्मेदारी आपको, आपकी गलती बताने की है ।वह इसे पूरी कुशलता से निभा रही है। आप तेल खाते हैं।यह आपकी गलती है।तेल न खाइये तो आप पर मंहगाई का असर ही नहीं होगा। प्याज मंहगी हुई थी तो उस समय के किसी मंत्री की सलाह पर  मैंने प्याज खाना छोड़ दिया था। अब तेल के लिए भी इसी तरह की सलाह का इंतजार कर रहा हूं।आशा है कि मेरा इंतजार शीघ्र समाप्त होगा।तेल नहीं खाने के दो फायदे हैं। पहला मंहगाई नहीं असर करेगी दूसरे स्वास्थ्य ठीक रहेगा।अधिक से अधिक लोग तेल खाना छोड़ देंगे तो उसकी खपत भी घटेगी ।खपत घटेगी तो मंहगाई अपने आप ही घट जाएगी। अर्थात सारी गलती आखिर में जनता यानि सुखई की है जो  तेल खा_खा कर उसे मंहगा करती जा रही है।उसेअपना काम ठीक से करना चाहिए।बहुत बढ़ा  चुकी मंहगाई अब उसे तेल खाना बंद कर देना चाहिए। एक मुहावरा तेल देखो और तेल की धार देखो का भी है।मुझे डर है कि कहीं यह मंहगाई तेल धार की जगह तलवार की धार न बन जाए। अविजित जी का मानना है कि बन चुकी है।फिर तो इस पर बहुत संभल कर चलना होगा।लगता है मंहगाई भी प्रेम बन गई है जिसका पंथ _कराल महा ,तरवार के धार पे धावनो है।
- लेखक रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं

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