मीडिया Now - प्राइवेट स्कूलों को चाहिए कि इस कठिन परिस्थिति में वह फीस माफ करें

प्राइवेट स्कूलों को चाहिए कि इस कठिन परिस्थिति में वह फीस माफ करें

medianow 25-05-2021 22:22:34


मानसी प्रीत जेसी / इतने सालों से कमा कर बड़े गर्व से हर साल में मुनाफा दिखाने वाले देश के बड़े बड़े उद्योगपतियों द्वारा इस लाक डाउन मे अपने ऑफिस कारखानो के बंद होने का हवाला देते हुए, जो खुद की और अपने कर्मचारियों की सेलेरी काटने य़ा ना लेने का जो फैसला लिया है, क्या लगता है की मुकेश अंबानी द्वारा पूरे साल में सेलेरी ना लेने से इनकी सेहत पे कोई असर होगा? य़ा जो लाखो की कमाई पूरे साल में करते हैं उन पे कुछ भी असर होगा ? एक बात जरूर हुई है कि इनकी देखा देखी और लोगो को भी मौका मिला है अपने कर्मचारियों की सेलेरी मन माफिक तारीके से काटने का।

मेरा सिर्फ एक सवाल है कि पूरे साल में मुनाफा कमाने वाले ये उद्योगपती अगर 2-3 महीने अपने स्टाफ़ को पूरी सेलेरी ना दे पाये तो लानत है इनके कमाई पर?इतने सालो से जो जोखिम उठाकर  एक तंख्वाहपेशा इंसान धूप ,बारिश , सर्दी को एक  समान मानकर अपने मालिक की जी हुजुरी  करते हुये अपने  मालिक  के हर हुकुम को अपने परिवार से पहले प्राथमिकता  देता है ,क्या उन्हें इस विषम परिस्थिती में अपने कर्मचारियों का साथ नही देना  चाहिए ? बात यहां सिर्फ कर्मचारी की ही नहीँ अपितु ऊन सभी  मजदूर   भाइयो की भी है जो काम न होने की वजह से साथ ही सेलेरी काटे  जाने के भय से पलायन करने पर बाध्य हो गए हैं।

इसी तरह से प्राइवेट स्कूलों के भारी शुल्क और लाकडाउन की मार के साथ माध्यम वर्गीय प्रयास कर रहा होता है, कि किसी तरह प्राइवेट स्कूल का पेट भर सके। प्राईवेट स्कूलों को अपने छात्रों के अभिभावकों का ख्याल रखते हुए, लोकडाउन की इस कठिन परिस्थिति में साथ देना चाहिए। साथ इसलिए देना चाहिए क्योंकि बच्चे स्कूल नही जा रहे हैं,स्कूल की सुविधाओं का उपभोग नहीं कर रहे हैं, हां क्लासेस चलती हैं,जूम क्लासेस पर वह नाम मात्र की है। हर एक मध्यम वर्गीय  इंसान का सपना होता है कि वो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाये, उनके उज्जवल भविष्य की चिंता के साथ ही एक सपना बुनते हुये उनके शिक्षा, दैनिक  ज़रूरतों  की बागडौर  को अपने  हाथों में थामे रखने की हर संभव कोशिश करता है।

प्राइवेट स्कूलों को चाहिए कि इस कठिन परिस्थिति में वह फीस माफ करें। दुख तो तब होता है की इन जैसों के पास बाजारी मंदियों के चलते भी जेब मे खर्च करने के लिये बेहिसाब पैसा होता है। खुद के सारे खर्चों को पूरा करने मे एक मिनट भी नहीं सोचते हैं लेकिन बात जब स्टाफ के लिये होती है तो अचानक नारद मुनि की तरह इन्हे सब कुछ याद आ जाता है कि लाकडाउन मे धन्दा मन्दा चल रहा है , इतने दिन ऑफिस बंद रहा है, काम नहीं हुआ।
- लेखिका एक समाजसेविका हैं

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