मीडिया Now - चतुर्दिक निर्माण के शिल्पी: पंडित नेहरू

चतुर्दिक निर्माण के शिल्पी: पंडित नेहरू

medianow 27-05-2021 11:36:53


राकेश श्रीवास्तव / 27 मई 1964 को पंडित नेहरू के रूप में भारतीय इतिहास के एक अध्याय का अंतिम पाया भी चला गया। गांधी, सुभाष,पटेल जैसे सामर्थ्यवान नेताओं की पीढ़ी के अप्रतिम हस्ताक्षर नेहरू मे देश के प्रति समर्पण, जुनून और महानता के साथ ही साथ दूरदर्शिता का भी संगम था। धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता के साथ ही एक वैज्ञानिक सोच थी।वह कांग्रेस के भीतर समाजवादी सोच के प्रतिनिधि थे तो साथ ही भारत के औद्योगिक विकास के लिए प्रतिबद्ध भी। आजाद भारत के लिए अहम तत्कालिक समस्या खाद्यान्न संकट से निपटने के थी।आज पीछे जाकर आलोचना करना आसान है। उनके विज़न से देश में पंच वर्षीय योजनाए शूरू हुई,बड़े बड़े उद्योग लगे पब्लिक सेक्टर यूनिट अस्तित्व में आई, एम्स, आईआईटी जैसे संस्थान बने साहित्य, संगीत, संस्कृति, तिहास, कृषि,विज्ञान, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यूक्लियर ऊर्जा,पॉवर प्लांट जैसे अनेक क्षेत्रों में हमारे कदम आगे बढ़ते गये।

नेहरू राजनेता के साथ ही साथ एक युग दृष्टा भी थे। औपनिवेशिक दासता से मुक्त विभाजित राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकजुट रहने की थी। आजादी के रूप में सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के बाद विभिन्न वर्ग, जाति,सम्प्रदाय, क्षेत्र,संस्कृति, भाषा समूह के लोगों की अलग अलग प्राथमिकताएं थीं। इनका पूर्ण समर्थन भारत राष्ट्र के प्रति होना देश के लिए आवश्यक था। नेहरू तीव्र बुद्धि के चतुर नेता तो थे ही परंतु साथ ही साथ उनके अंदर एक व्यावहारिक सामंजस्य स्थापित करने की अद्भुत क्षमता भी थी। गांधीजी ने शायद इसी कारण से उनको चुना कि वह सबको लेकर चलने में सक्षम होंगे। डॉक्टर लोहिया ने गांधी जी से पूछा था कि आप नेहरू को सबसे बेहतर क्यों मानते हैं तो गांधी जी कहा कि मैंने सबसे अच्छा कभी नहीं कहा बल्कि कहा "इनसे ज्यादा अच्छा नहीं"। पंडित नेहरू ने भाषाई आधार पर सभी विभाजनकारी प्रयासों को दृढ़ता से शांत किया। देश के आंतरिक मामलों के साथ ही विदेशी नीति के मामले में भी बहुत चुनौतियां थी। पंडित नेहरू अमेरिका तथा सोवियत संघ दोनों ही ब्लॉक से समान दूरी बनाते हुए आगे बढ़े। उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दिया।सुकर्णो, नासर, टीटो के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन का मंच दिया जिसने अन्य देशों को भी अपनी स्वतंत्र नीति बनाने का अवसर दिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू के योगदान को इसी से समझा जा सकता है कि आज उनके जाने के सत्तावन वर्ष बाद भी उनकी आलोचना तो की जा सकती है परंतु अधिकारिक रूप से उनकी बनाई नीतियों से वृहद विचलन नही हो पाया है चाहे वह लोकतंत्र या धर्मनिरपेक्षता हो या फिर विदेश नीति।

राजनैतिक रूप से सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने अपने आसपास लेखकों,इतिहासकारों,वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों को रखा और उन्हें सदैव प्रोत्साहित करते रहे।नेहरू जी साहित्यकारों का बहुत सम्मान करते थे।चीन से लौटकर इलाहाबाद में एक सभा को संबोधित करते हुए उनकी नजर निराला जी पर पड़ी जो अखाडे से पहलवानी कर कर आए थे। मिट्टी और तेल से सने उनके बदन पर केवल एक गमछा था। नेहरू जी सभा समाप्त होने पर नीचे आये और अपने गले की मालाएं निराला जी के पैरों में सम्मान स्वरूप अर्पित कर दी। पूरी सभा स्तब्ध हो गई। ऐसा था उनके मन मे सम्मान। लालकिले पर आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में भाग लेने प. नेहरू जी व दिनकर जी साथ साथ जा रहे थे। अचानक सीढ़ियों पर नेहरू जी के कदम लड़खड़ाए और उन्हें गिरने से दिनकर जी ने संभाल लिया। नेहरू जी बोले शुक्रिया दिनकर जी। दिनकर जी ने  पलट कर जवाब दिया- " पंडित जी, जब जब सत्ता लड़खड़ाती है, साहित्य उसे संभाल लेता है।" पर अब न पंडित नेहरू जैसे राजनेता हैं और न ही रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकार।  नेहरू जी खुद भी बहुत अच्छे लेखक रहे हैं।उनकी मुख्य रूप से प्रसिद्ध पुस्तकें हैं, डिस्कवरी ऑफ इंडिया, गिलम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री, टुवरडस फ्रीडम, लेटर्स फ्रोम ए फादर टू हिज् डॉटर और अपनी ऑटो ग्राफी आदि। उनके बहुमुखी आयामों पर जितना लिखा जाए वो कम है l आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन।"
राकेश श्रीवास्तव 
 लखनऊ

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