मीडिया Now - आयुर्वेद बनाम एलोपैथी नहीं, ’रामदेवी झूठ’ बनाम ’एलोपैथी लूट’ पर बहस होनी चाहिए

आयुर्वेद बनाम एलोपैथी नहीं, ’रामदेवी झूठ’ बनाम ’एलोपैथी लूट’ पर बहस होनी चाहिए

medianow 27-05-2021 15:48:40


विकास नारायण राय / भारतीय चिकित्सा व्यवस्था की सच्चाई का  यही निचोड़ है ।  ' रामदेवी झूठ ' एक तरफ है , एलोपैथी की लूट दूसरी तरफ। आज भारतीय जन मानस इन्  दो पाटों में पिस  कर मर रहा है। पहले आयुर्वेद पर आइये। हम  ' वो ' बताने की कोशिश कर रहा हूँ जो था। और जिसका रोना है,  उसका कारक - आयुर्वेद का बाजारीकरण। जिसमे  हिमालय , डाबर ,  बैद्यनाथ जैसे घराने शामिल रहे । इसी बीच जब से पाखंड और झूठ का युग शुरू हुआ,  गेरुआ बाना लटकाए एक लबार और आ गया । सब का बाप निकला । रामदेव । विसंगति देखिये इस पाखंडी युग में   'अतीत निधि ' की बयार चली । डिपर रामदेव ने अतीत से एक नाम उठा लिया पतंजलि । उमके नाम पर योग । उनके नाम पर आयुर्वेद उत्पाद । मालामाल हो गया । "जब की असलियत यह है कि इसने पतंजलि और योग दोनो का सत्यानाश कर दिया । इस कमबख्त को यह भी नही मालूम कि योग है क्या ? न ही इसे अष्टाध्यायी का पता है न ही योग की पद्धति का । सालों साल लग जाते हैं शरीर को योग के दरवाजे तक ले जाने में । यम,  नियम , प्रत्याहार जो आठ कदम जरूरी होते है  योग शुरू करने के लिए । इसको न तो इसकी जानकारी है न ही उसका निर्वहन करता  है । योग की पहली शर्त है चित्त को स्थिर करना । इच्छाओं का दमन तो कर नही सकते तो उसकी पूर्ति करो । तब कहीं जाकर समाधि मिलती है ।

इसे  हठ योग और राज योग तक कि जानकारी नही है । पेट फुला लो , कमर घुमा दो , सर्प बन जाओ ये आसन हैं , योग नही । आसन एक अभ्यास है,  शरीर को वश में करने और नियंत्रण में रखने का । दुर्भाग्य यह है कि देश का पढालिखा तबका बड़े आराम से बोल देता  है - ' लाख फ्राड हो लेकिन घर घर तक योग को पहुंचा दिया । ' यह उसी तरह हुआ जैसे आज व्यापार में हो रहा है । आपको धनिया का पावडर चाहिए गधे की लीद  मिल गयी आप खुश है पावडर मिला तो सही । रामदेव के आयुर्वेद उत्पाद की सत्यता और उसकी  गुणवत्ता जानने के।लिए केवल एक हिस्सा उघार कर दीजिए उसका फ्राड उघार हो जाएगा । केवल एक प्रश्न पूछ लीजिये - पिछले पांच साल में उस पर '  खाद्य पदार्थों की मिलावट 'और  नकली उत्पाद के चलते कितने मुकदमे दर्ज हुए ? कितने की फाइन लगी ? कितने अभी अदालत में हैं ?  जब कि दुनिया यह जानती है यह सरकार के दस्ते करम का सरकारी उद्योगपति है , बाबा के लिबास में घोषित लबार ( विदेश का कालाधन , हर खाते में पंद्रह लाख जायगा , इस बात को यह  बाबा ,  मोदी जी से भी तेज आवाज में बोलता था । ) 

आयुर्वेद का चैप्टर बड़ा हो जाएगा गर हम विस्तार में जांयगे । संक्षिप्त रूप से जान लें । दुनिया मे भारत की साख जिन तीन कारणों से  थी , उसमे एक बड़ा कारण  था आयुर्वेद की गुणवत्ता और उसकी ग्राह्यता । यह पांचवां वेद माना गया है । बहरहाल इस बिधा की खूबी  जान लें - यह पद्धति विकेन्द्रित रही है । आयुर्वेद केंद्रित हो ही नही सकती क्यों कि इसकी जड़ीबूटियों का रिश्ता और श्रोत ' लोकल ' रहा है । उत्तर भारत मे गर खांसी की अचूक दवा अड़ूस का पत्ता है तो राजस्थान के मुलेठी और हल्दी का चूर्ण । दो - आयुर्वेद अपने उत्पादन  को निहायत सीमित रखता है , इसको  बहुतायत में बना कर जमा नही किया जा सकता , उस उत्पाद की गुणवत्ता समाप्त हो जायगी । आयुर्वेद की अनेक दवाएं ऐसी है जिसका उत्पादन रोगी खुद करता है या उसके सामने  ही उसका कोई तीमारदार करता है । मसलन गैस की अचूक  दवा है लहसुन को तोड़ कर उसकी गैस को पेट तक   पहुचाना ।  बल्क में इसे कैसे स्टोर  करोगे ? घर घर आयुर्वेद था । यह बाजार बन गया । रोवो मत भुगतो ।  बहुत कुछ है । आयुर्वेद देखना हो तो दावे के साथ कहता हूं काशी विश्व विद्यालय का आयुर्वेद विभाग देख आओ । उनके काबिल डॉक्टरों से मिलो , जड़ी बूटियों का उनका उद्यान है उसे समझो । तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री मरहूँम राज नारायण  जी को याद करो जिन्होंने आयुर्वेद को बुलन्दी दी । डॉ के  यन उड़प्पा आज तक याद किये जाते हैं । उनकी सोहबत से पता चला अमुक दवा शुक्ल पक्ष में ही बन सकती है अमुक एक निश्चित काल मे । किस  धातु के खरल में कौन सा भस्म तैयार  होता है इसका विधान है । बहरहाल । 

दूसरी तरफ आते हैं  येलोपैथी । इस मुल्क में यह सबसे हत्यारी चालाकी है । इसका मुनाफा 1400 प्रतिशत से शुरू ही होता है । और नकली खेल तो बहुत बड़ा रोजगार है । अभी मध्य प्रदेश में कोरोना का नकली इंजेक्शन तक बिका । लोग मारे गए । जनता मुह बाए खड़ी है हम किधर जांय ।  एक निवेदन अपने असल पर आओ । मूल पर आओ । बुद्ध  को क्यों भूलते हो - दुख है तो कारण होगा , कारण है तो निदान होगा । आयर्वेद कहता है आपको दवा की जरूरत ही नही , दवा तो शरीर मे पहले से  ही मौजूद है । मियम बनाओ । शुरुआत करो असाध्य रोग के लिए मोरार जी की पद्धति से । दोनो को सुधारने की जरूरत है । चिंता मत करो । कल स्वर्णिम है ।
- लेखक एक पूर्व आईपीएस अधिकारी रहे हैं

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