मीडिया Now - मील का पत्थर थी दहेज

मील का पत्थर थी दहेज

medianow 28-05-2021 11:34:00


वीर विनोद छाबड़ा / व्ही.शांताराम की 'दहेज़' (1950) न केवल व्यवसायिक दृष्टि से बेहद क़ामयाब थी बल्कि समाज को भी इसने दहेज प्रथा के विरुद्ध सोचने पर मजबूर कर दिया था. कहानी बहुत सिंपल है. लखनऊ की बैकग्राउंड है. ठाकुर एक शानदार हवेली के मालिक हैं. लेकिन अंदर से टूटे हुए, माली हालत ठीक नहीं है, जो दिख रहा है, पुरखों का दिया है. ठाकुर साहब की एक बेटी है चंदा (जयश्री) जिसका विवाह उनके वकील मित्र बिहारीलाल (उल्लास) के साथ तय हुआ. ठाकुर साहब ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया कि वो दहेज के नाम पर ज़्यादा पैसा खर्च नहीं कर सकते. बिहारीलाल को इससे कोई ऐतराज नहीं है, उन्हें तो बस अपने पुत्र सूरज (करन दीवान) के लिए सुंदर और सुशील बहु चाहिए. सास ललिता पवार भी खुश है. मगर एक दिन दुर्भाग्य कहर बन कर टूटता है. बिहारी लाल की अनायास मृत्यु हो जाती है. सास ललिता पवार इसके लिए चंदा को मनहूस ठहराती है और बेतरह प्रताड़ित करती है. दहेज़  की मांग करती है. ठाकुर साहब को ललिता पवार के ताने बर्दाश्त नहीं होते. वो आत्म-सम्मान की लाज रखते हुए अपनी हवेली बेच देते हैं और दहेज में दी जाने वाली हर वस्तु को लेकर बड़ी शान-ओ-शौक़त से बाज़ार से गुज़रते हैं, देखो-देखो दुनिया वालों हम आज भी किसी से कम नहीं हैं. उधर सास ललिता पवार इतनी सख़्त हो जाती है कि बहु चंदा को उसके बीमार पति सूरज से मिलने नहीं देती है. उसके साथ धक्का-मुक्की करती है. चंदा ज़ख़्मी हो जाती है. उधर सूरज दम तोड़ देता है. इधर ठाकुर साहब दहेज लेकर दाख़िल होते हैं, देखो बेटी मैं आ गया दुनिया की हर कीमती शै लेकर. ज़ख़्मी चंदा ठाकुर साहब की गोद में सर रखती है और कहती है - लेकिन एक चीज़ लाना भूल गए - कफ़न. ये कहते हुए चंदा दम तोड़ देती है. 

इस सिलसिले में कुछ यादगार और मज़ेदार तथ्य हैं. शम्स लखनवी अपनी स्क्रिप्ट के दुखद अंत से संतुष्ट नहीं थे. उन्हें लगा औरत के साथ कुछ ज़्यादा ही अन्याय कर रहे हैं. मगर शांताराम नहीं माने, समाज में जैसा है वैसा ही दिखाएंगे, समाज अपना चेहरा आईने में देखेगा. और जब पहला शो हाउस फुल गया.  शो जब ख़त्म हुआ तो हर शख़्स की आँखें नम थीं. शम्स लखनवी ने शांताराम जी को बधाई दी - अन्ना आप सही थे. ठाकुर साहब की भूमिका के लिए पृथ्वीराज कपूर शांताराम की पहली और आख़िरी पसंद थे. उन्होंने पृथ्वीराज को स्क्रिप्ट सुनाते हुए स्पष्ट भी कर दिया. पृथ्वीराज ने भी सर हिला दिया. छह महीने की एक मुश्त में फिल्म बनाने वाले शांताराम ने दस हज़ार रूपए का पारिश्रमिक ऑफर दिया. पृथ्वीराज बोले - लेकिन मुझे पचहत्तर से कम कोई देता नहीं है. शांताराम ने  कहा - दे तो मैं सकता हूँ मगर मुझे बाकी आर्टिस्टों और टेक्निशियंस की सैलरी कम करनी होगी. पृथ्वीराज ने कुछ पल सोचा और बोले - ठीक है मैं दस हज़ार में काम करूँगा. मगर एक शर्त है. अगर फिल्म क़ामयाब होती है तो आपको मेरी पृथ्वी थिएटर कम्पनी को दस हज़ार रूपए डोनेशन देना होगा, क्योंकि इन छह महीनों के दौरान मेरा स्टाफ खाली और बिना पगार के रहेगा. और शांताराम ने अपना वादा पूरा किया. फिल्म के एक सीन में ललिता पवार से बहस के दौरान पृथ्वीराज का गुस्से से थरथर कांपना और उस दबाव में कुर्सी का टूटना यादगार पल है. फिल्म के इम्पैक्ट इतना ज़बरदस्त था कि सुना है कुछ समय बाद कतिपय सांसदों ने फिल्म का प्रिंट दिल्ली मंगवाया और समस्त सांसदों को दिखा कर संसद में 'एंटी डावरी एक्ट' पास करवाया. फिल्म के कई अन्य स्ट्रांग तकनीकी पहलू भी हैं जिनका ज़िक्र बाद में. मगर ये बताना ज़रूरी है कि इसी फिल्म से ललिता पवार पर एक सख़्त और ज़ालिम सास होने का ठप्पा लगा था.
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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