मीडिया Now - और यों बने रवि जतिन जीतेन्द्र राजेश

और यों बने रवि जतिन जीतेन्द्र राजेश

Administrator 18-03-2021 17:29:22


वीर विनोद छाबड़ा  

मैं सोनी टीवी के इंडियन आइडल के गायकी के हिस्सों के अलावा उन एपिसोड को बहुत पसंद करता हूँ जिसमें साठ और सत्तर के सालों के आर्टिस्ट गेस्ट के तौर पर आकर अपने दौर, जिसे 'गोल्डन इरा' भी कहा जाता है, के किस्सों को सुनाते हैं. इनमें ज़्यादातर आर्टिस्ट ज़मीन से उठे हुए रहे. बहुत मेहनत से ज़ीरो से टॉप पर पहुंचे. कोई दो हफ़्ते पहले जंपिंग जैक कहलाने वाले जीतेंद्र गेस्ट के तौर पर मौजूद थे. हालाँकि एक-दो फिल्मों को छोड़ कर जीतेंद्र बतौर आर्टिस्ट कभी मेरे दिल के क़रीब नहीं रहे. लेकिन संघर्ष के जो किस्से उन्होंने सुनाये वो मज़ेदार थे. इन किस्सों को मैंने अपने दौर के रिसालों में पढ़ा था. लेकिन उस दिन याद ताज़ा हो गयी. तब जीतेंद्र चाल में रहा करते थे और उनका नाम रवि कपूर था. एक ज्वैलरी की दुकान पर काम करते थे. उन्हें ज्वैलरी लेकर अक्सर व्ही शांताराम उर्फ़ अण्णा साहब के राजकमल स्टूडियो जाना पड़ता था. 
एक दिन रवि की शूटिंग देखने की इच्छा हुई. मगर स्टूडियो के नियम के अनुसार वहां फालतू में खड़ा होना मना था. एक हमदर्द ने उन्हें प्रिंस की ड्रेस पहना कर एक शॉट में खड़ा करवा दिया. उन्होंने देखा वहां उनके जैसे अनेक प्रिंस खड़े थे. संयोग से वो अण्णा साहब की निगाह में आ गए. उन्हें कुछ संवाद किये और कहा, कल याद करके आना. जतिन खन्ना उनके क्लास फेलो थे जो थिएटर में काम करते रहते थे. रवि की मदद को जतिन आगे और कॉलेज की कैंटीन में उन्हें संवाद याद कराने के साथ साथ एक्टिंग के गुर भी बताये. लेकिन अगले दिन वो सेट पर घबड़ा गए. 
कुछ समय बाद अण्णा साहब ने रवि को 'गीत गाया पत्थरों ने' में हीरो का चांस दिया. मगर दिक्कत आयी, नाम की. अण्णा साहब बोले, ये रवि नाम नहीं चलेगा. दरअसल उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में एक रविंद्र कपूर हुआ करते थे. उनकी पहचान सत सालियां, सस्सी पन्नू, शौकड़ मेले दी, पिंड दी कुड़ी जैसी हिट पंजाबी फिल्मों के हीरो के रूप में थी और हिंदी फिल्मों में हीरो के किक हुआ करते थे. अण्णा बोले, रवि बोलो या रविंद्र, एक जैसा सुर और आवाज़. ये नहीं चलेगा. अण्णा साहेब ने उनको नया नाम दिया, जीतेंद्र. ये रविंद्र कपूर बाद में जीतेंद्र के साथ नासिर हुसैन की 'कारवां' में दिखे. धर्मेंद्र के साथ 'यादों की बारात में' भी. अलावा इसके 'दि बर्निंग ट्रेन' और 'हम किसी से कम नहीं' में भी यादगार रोल किये. 
बहरहाल, रवि कपूर तो जीतेंद्र बन गए और इधर उनके क्लास फेलो जतिन खन्ना को भी जीपी सिप्पी ने 'राज़' के लिए बतौर हीरो साइन कर लिया. तब तक जीतेंद्र फिल्मों में जम चुके थे. जीतेंद्र और जतिन, एक जैसी साउंड. सिप्पी बोले, नहीं चलेगा. जतिन का नया नामकरण हुआ - राजेश खन्ना. यानी आरके (रवि कपूर) जेके (जीतेंद्र कपूर) बन गए और जेके (जतिन खन्ना) आरके (राजेश खन्ना) हो गए. और दोनों ने फिल्मों में बहुत ऊँचा मुक़ाम हासिल किया. लेकिन ट्रेजडी देखिये, कि जिस रविंद्र कपूर के कारण ऐसा हुआ उनकी झोली में ज़्यादा प्रसिद्धी नहीं आयी. पंजाबी फिल्मों का दौर ज़्यादा लम्बा नहीं चला और हिंदी फिल्मों में वो हीरो के किक बने रहे. जबकि वो करैक्टर आर्टिस्ट कमल कपूर के भाई थे और राजकपूर परिवार से भी संबंधित थे. रविंद्र का 71 साल की उम्र में 03 मार्च 2011 को निधन हो गया और राजेश खन्ना ने 18 जुलाई 2012 को इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दी. 
लेखक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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