मीडिया Now - आज दो जून की रोटी के लिए लोग तरस रहे हैं

आज दो जून की रोटी के लिए लोग तरस रहे हैं

medianow 02-06-2021 10:58:07


चंचल / दोस्ती में छोटी मोटी चोरी जायज मानी जानी चाहिए। इस चोरी के मर्म का एक तंतु विश्वास और लगाव तक जाता है। हमारी आदत है अल सुबह उठ कर जब कमरे की बन्द खिड़की खोलता  हूँ तो सबसे पहले मौसम सूंघता हूँ -  रात में बारिश हुई थी ? दूब के विस्तार पर पड़े सफेद बूंदों को देख कर अनुमान लगाता  हूँ । फिर  तारीख हूँ । जब तक माँ रही वह तिरतिया, पंचमी, एकादसी, अगहन, जेठ बताती और उंगलियों पर कुछ जोड़ घटाव कर व्रत, उपवास तय कर लेती । लेकिन उसके रहते ही मोबाइल आ गया था । हमारी आदत में हल्का सा बदलाव हुआ, अब पूछना नही पड़ता , मोबाइल बता देता । जी , तो आज हमने रश्मी जी की वाल से रोटी की चोरी किया। आज उसी वरीयता क्रम में रहा। खिड़की से  बाहर झांका। आसमान साफ , जमीन सांवर । कल बारिश हुई है। तारीख दो जून। सोचा आज इसी दो जून से शुरुआत हो ।

फेसबुक खोला पहली स्टोरी Rashmi Abhaya  जी की दिखी और बर्नर पर फूली हुई रोटी के विजुअल के साथ । इसे कहते हैं सम बोध । यह जो बोध है,-  यह रचना , विस्तार और प्रलय तीनो का कारक तत्व है। समाज अगर एक बोध को स्वीकार कर ले तो, उसे आकार देकर समाज की शक्ल बदल सकता है । बहरहाल, फलसफे को  छोड़िए । आज ही इस विषय पर एक और मित्र का मजमून है,  फोटो के साथ - दो जून की  रोटी का सवाल लिए बैठे मजदूरों की लंबी कतार। ( उनका नाम भूल रहा है,अगर आप इस सुलेख को देखें तो हमे सूचित कर दें, हम आपका नाम जोड़ देंगे) हम सब कहीं  न कहीं  से इसी सवाल से जूझ रहे हैं।

व्यक्त, अव्यक्त। प्रताक्ष, परोक्ष। दो जून की रोटी । भारत का माजी बताता है , हम मरे हैं दो जून की रोटी के लिए । बंगाल अकाल । बारिश  का ऋण होना , '  दैविक' आपदा बना , चर्चिल की हत्यारी नीति ' भौतिक ' ताप और मृत्यु को वरण करती असहाय जनता ने  'दैहिक ' विष को स्वीकार कर लिया  लेकिन इन तीन तापों में से किसी एक के भी खिलाफ लड़ते हुए जान नही दिया। बंगाल अकाल पर डॉ राममनोहर लोहिया ने एक  उत्तेजक लेख लिखा कि हम इतने  अकर्यमण क्यों रहे ?

यह जानते हुए  कि सरकारी गोदामों में  अकूत अन्न का भंडार पड़ा है । सेठ साहूकार मनमानी कीमत पर अन्न  दे रहे हैं।  मुट्ठी भर भात के लिए आबरू  तक का सौदा हो रहा था । लोहिया पूछते हैं , क्यों नही लूटी गई गोदामें ? हिंसा होती हो जाने देते। '  यह लेख ' हरिजन ' में छपा । जग जाहिर है '  हरिजन '  के संपादक हैं , महात्मा गांधी और उनके अखबार में एक  भी सतर  बगैर उनके देखे नही छप सकती थी। अगर किसी लेख या पत्र से बापू को ऐतराज  होता , आपत्ति रहती तो बहैसियत संपादक  गांधी जी उस  लेख के साथ अपनी आपत्ति भी दर्ज कर देते । लेकिन यहां डॉ लोहिया के लेख को जस का छापा और एक सतर  की भी आपत्ति नही दर्ज की ।

यह एक उदाहरण है-  बापू की  अहिंसा , कायरता से खुराक नही लेती। लाखों लोंगो का भूख से मर जाना खुद में क्रूरतम हिंसा है। यही गांधी करो या मरो को दृढ़ता के साथ  उठाते हैं। आज वही स्थिति फिर बन रही है और फिर बनाई जा रही है। सियासत  महामारी कोविद 19 को हांक रही है।  करोना की आड़ में नाकारा नियियों ने तबाही का मंजर खड़ा कर दिया है। बेरोजगारी आसमान छू रही है ,  प्रतिव्यक्ति आय रसातल में जा चुकी है। अपराध कुटीर उद्योग बन गया है। नौकरशाही  संगठित  लुटरे  बन गए है । दो जून की रोटी  के लिए लोग तरस रहे हैं  दो जून ।
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :