मीडिया Now - योगी को छेड़ना भारी पड़ेगा मोदी और शाह को

योगी को छेड़ना भारी पड़ेगा मोदी और शाह को

medianow 02-06-2021 23:00:02


डा. अखंड प्रताप सिंह मानव / लखनऊ. यूपी बीजेपी में आजकल जमकर घमासान मचा हुआ है. पिछले 10 दिनों से अंदर खाने हो रही गतिविधियों से चर्चाओं का बाज़ार गर्म है. शुरू में तो मीडिया को काफी हद तक मैनेज करने में बीजेपी कामयाब रही पर असंतोष और गुटबाजी के सतह पर आ जाने और आर एस एस और बीजेपी हाई कमान से कई नेताओं के दौरों और मीटिंगों ने इस कदर माहौल बना दिया कि बीजेपी के अंदर की खबरें खुलकर बाहर आने लगीं. स्थिति ये है कि योगी सरकार और बीजेपी संगठन में बदलाव की संभावनाओं के बीच दोनों स्तरों पर नेतृत्व परिवर्तन तक की चर्चा निरंतर तूल पकड़ती जा रही है.

सारा फसाद दिल्ली में तैनात पीएम मोदी के अत्यंत करीबी पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा के इस्तीफे और आनन फानन में बीजेपी ज्वाइन करने के बाद से शुरू हुआ. अरविंद शर्मा जब लखनऊ पहुंचे तो उनके तेवरों और मीडिया रिपोर्ट्स से ऐसा मेसेज देने की कोशिश की गई कि शर्मा प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी और शाह द्वारा लाए गए हैं.बीजेपी में शामिल होते ही उन्हें बीजेपी ने विधान परिषद के ज़रिए सदन में भी भेज दिया. बताते हैं इस निर्णय में योगी आदित्यनाथ को कॉन्फिडेंस में नहीं लिया गया. ज़ाहिर सी बात है योगी ने भी इस घटनाक्रम को अपने प्रतिष्ठा से जोड़ लिया. अरविंद शर्मा, योगी से लगातार मिलने की कोशिश करते रहे पर योगी ने उनको घास नहीं डाली और शर्मा बिना योगी से मिले वापस दिल्ली चले गए.

उनके वापस जाने के बाद भी राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी रही कि अरविंद शर्मा मुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं. हो सकता है एक दम से ऐसा ना हो और पहले उन्हें डिप्टी सीएम या फिर गृह जैसे महत्वपूर्ण विभागों के साथ कैबिनेट मंत्री बनाया जाए. सूत्रों के अनुसार इस तरह के बदलाव के पीछे सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ के प्रभाव को कम करना और उनकी कथित मनमानीपूर्ण कार्यशैली पर रोक लगाना है. पर योगी अड़े रहे और चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अरविंद शर्मा को डिप्टी सीएम तो दूर मंत्रिपरिषद में भी जगह नहीं दिया.

इस बीच मोदी और शाह की नाराज़गी बढ़ती गई. कुछ होता न देख अरविंद शर्मा अपने गांव चले गए. वहां से उनकी महुआ बिनते हुए एक दिलचस्प तस्वीर भी आई थी. सूत्रों की मानें तो योगी, अरविंद शर्मा को कोई महत्वपूर्ण विभाग तो छोड़िए, कैबिनेट मंत्री भी बनाने के लिए तैयार नहीं हैं.

इस बीच संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले भी यूपी की राजनीतिक नब्ज़ टटोलने के लिए लखनऊ आए. आने के तीन दिन पहले, दिल्ली में यूपी के राजनीतिक माहौल पर चर्चा के लिए पी एम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ दत्तात्रेय होसबाले की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी. इस बैठक में यूपी बीजेपी के संगठन मंत्री सुनील बंसल भी शामिल हुए थे. यूपी की राजनीति पर चर्चा के लिए हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में न तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और न ही प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को बुलाया गया था. यह बात सीएम योगी आदित्यनाथ को बड़ी नागवार लगी थी. होसबाले लखनऊ आये और दो दिन रुके भी पर योगी उनसे नहीं मिले. ये बात भी हाई कमान को हज़म नहीं हुई.

इसी तरह एक दिन यूपी के राज्यपाल को उन्हें अपना तय कार्यक्रम रद्द करके तुरंत लखनऊ पहुंचने के लिए बोला गया. राज्यपाल आनंदी बेन पटेल लखनऊ पहुंची और योगी को राजभवन आने को बोला. मीडिया और बीजेपी पार्टी में मंत्रिपरिषद के विस्तार की चर्चाएं ज़ोर शोर से होने लगीं. योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल से मिलने पहुंचे और मुलाक़ात के बाद बाहर मीडिया से बातचीत में विस्तार की किसी भी संभावना से सीधे इंकार कर दिया.

इस घटनाक्रम का सीधा राजनीतिक अर्थ यही निकाला जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ और मोदी - शाह के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. इस बीच केंद्रीय पर्यवेक्षक बीएल संतोष और राधा मोहन सिंह लखनऊ आकर मंत्रियों से फीडबैक भी लिया. संतोष ने यूपी के दोनों डिप्टी सीएम से अलग अलग बात किया. इसके अलावा उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य से भी काफी देर तक बात किया.

उधर यूपी बीजेपी के विधायक बेचैन है, विधायकों का कहना है उनसे भी मीटिंग की जाए. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने मीटिंग से निकलकर एक बड़ा बयान दिया कि "2022 में हम फिर से चुनाव जीतेंगे, इस बार 300 के पार आकंडा होगा". डिप्टी सीएम के इस बयान देने के बाद से ही बीजेपी में घमासान और बढ़ गया है. इस बैठक में भी प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह उपस्थित नहीं थे. वहीं दूसरे डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा ने कहा कि बैठक में कोरोना से निपटने की तैयारी चल रही थी. डिप्टी सीएम केशव मौर्य और दिनेश शर्मा दोनों के बयानों में जबदस्त विरोधाभास दिख रहा है.

योगी आदित्यनाथ बीजेपी पार्टी में इस समय देश के इकलौते नेता हैं, जिन्होंने मोदी - शाह से खुलकर पंगा लिया है. ये कोई मामूली घटनाक्रम नहीं है. बताते हैं योगी के इस कदम के पीछे आर एस एस का खुला सपोर्ट है. बताते हैं यही व्यवहार मोदी और शाह, संघ प्रमुख के साथ पिछले सात सालों से करते आ रहे हैं. पिछले सात सालों में मोदी की संघ प्रमुख से सिर्फ एक बार की मुलाक़ात है. और तो और इन वर्षों में मोदी एक बार भी संघ के मुख्यालय तक नहीं गए.

संघ, मोदी के बाद भावी प्रधानमंत्री भी तलाशने में लगा है और इसके लिए उसकी पहली पसंद योगी आदित्यनाथ ही हैं. क्योंकि योगी के अंदर ही वो नेतृत्व क्षमता संघ को दिख रही है. बीजेपी के बाकी नेताओं में कोई और दूसरा नजर नहीं आता जो मोदी - शाह के सामने खड़ा हो सके. दूसरा हिंदुत्व का सबसे बड़ा कार्ड भी योगी से बेहतर कोई और नहीं खेल सकता है. ये बात योगी आदित्यनाथ बड़ी अच्छी तरह जानते हैं. पूरे देश में इस समय मोदी और शाह के प्रति जो आक्रोश दिख रहा है उसका भी कोई हल संघ को निकालना है.

हालांकि कोविड प्रबंधन में शुरू में योगी पूरी तरह फेल साबित हुए थे पर योगी ने दिन रात एक करके प्रदेश की स्थिति को काफी हद तक नियंत्रण में कर लिया है. इसके अलावा यूपी के विधान सभा चुनाव भी 2022 में होने हैं और ज़्यादातर विधायक ये जानते हैं कि 2017 की पार्टी की जीत में योगी की क्या भूमिका थी. उन्हें आज भी योगी से बेहतर विकल्प नजर नहीं आता. योगी आदित्यनाथ भी इन सारी स्थितियों को बड़ी अच्छी तरह समझ रहे हैं. ऐसे में मोदी और शाह अगर योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जाकर कोई निर्णय लेते हैं तो ये उनके लिए भारी पड़ेगा.
- लेखक "मीडिया नाऊ" के प्रधान संपादक हैं

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