मीडिया Now - स्मरण, जार्ज फर्नांडिस नए प्रतिमान स्थापित करते

स्मरण, जार्ज फर्नांडिस नए प्रतिमान स्थापित करते

medianow 03-06-2021 19:25:14


राकेश श्रीवास्तव / जार्ज फर्नांडिस के जन्मदिवस पर उनको नमन।जॉर्ज फर्नांडिस वो विद्रोही थे जो बाद मे लगता है कि शायद खुद से ही विद्रोह कर बैठे।उनके जीवन का अंतिम कालखंड उनके नैसर्गिक स्वभाव के विपरीत था।संघर्ष उन्की प्राणवायु थी।यों तो उन्होंने अनेक संघर्षों में भाग लिया परंतु रेल हड़ताल, आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष एवं कोकोकोला को भारत से बाहर भगाने में उनकी अहम भूमिका रही।यही तीन कार्य ही इतिहास में उनकी भूमिका दर्ज कराने के लिए काफी है। जार्ज अपने संघर्ष के दिनों में जिस बम्बई में चौपाटी में बेंच पर सोते थे उसी बम्बई दक्षिण की सीट से संयुक्‍त सोसलिस्ट पार्टी के टिकट पर 48.5 प्रतिशत वोट पाकर एसके पाटिल को धूल चटाकर "जॉइंट किलर" बने । 

जॉर्ज बिलकुल साधारण आदमी की तरह रहते थे।बम्बई के मजदूरों,होटल,रेस्तरां कर्मचारियों एवं निचले स्‍तर के फैक्टरी कर्मचारियों लिए काम करते हुए वो श्रमिकों मे बहुत लोकप्रिय होकर उनकी आवाज बन गए।बहैसियत अध्यक्ष,ऑल इंडिया रेलवे फेडरेशन 8 मई 1974 को  रेलवे की सबसे बड़ी देशव्यापी हड़ताल,जिसमें लगभग सत्रह लाख कर्मचारियों ने भाग लिया,को फ्रंट से लीड किया था।यह ट्रेड यूनियन की सबसे बड़ी  हड़ताल थी।जार्ज पीछे रहने वालों में नहीं थे।वो खुद रेलवे ट्रैक पर लेट गए थे।जार्ज उन नेताओं को आइना दिखाते हैं जो कहते हैं कि कर्मचारी साथ नही देते हैं।पर आज नेता खुद सुविधाभोगी और सिद्धांतविहीन होकर अपना नैतिक बल खो चुके हैं।आज अधिकतर ट्रेड यूनियन नेता पांच सितारा संस्कृति के हिस्सा बन चुके हैं।जॉर्ज इस आंदोलन से तप कर और निखर कर निकले।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन मे महात्मा गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जो भूमिका डा लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व मे समाजवादियों ने निभाई थी,वह आपातकाल के विरुद्ध युद्ध में जार्ज फर्नांडिस समाजवादी खेमे के लोगों को साथ लेकर निभा रहे थे।     तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनसे बहुत नाराज रहती थीं ।आपातकाल लगने की खबर होने पर मछुआरे का भेष धारण करके वे भूमिगत हो गए़।बड़ोदा डायनामाइट मे उनको जेल मे डाल दिया गया।1977 मे जार्ज जेल से ही चुनाव लडे।जंजीरों में जकडे जार्ज की तस्वीर ने ही लगभग चार लाख के अन्तर से मुजफ्फरपुर लोक सभा सीट जिताई।ऐसी थी जार्ज की लोकप्रियता। 

जार्ज फर्नांडिस ने अपनी ईमानदारी और नैतिक आचरण से दिखा दिया कि संविधान ने केन्द्रीय मंत्री को कितनी ताकत और दायित्व दिये हैं।दो प्रसंगों के उल्लेख से यह स्पष्ट हो जायगा। जनता पार्टी की सरकार मे उन्होने देश के लिए नई औद्योगिक नीति बनाई।वे पूंजी के देश से बाहर जाने के बारे मे बहुत स्पष्ट थे।आईबीएम और कोका कोला को देश हित की शर्तों के साथ काम करने के लिए न मानने पर कोका कोला देश से बाहर निकाल दिया गया।प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बहुत नाराज हुए कि यह विषय कैबिनेट से पास नही हुआ है।जॉर्ज ने कहा अब कैबिनेट में ले आइए,देश को भी पता लगना चाहिए कौन इस फैसले के खिलाफ है।मोरारजी भाई सन्न रह गये।

दूसरा वाक्या अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री काल का है।जार्ज फर्नांडीस रक्षामंत्री थे।उनकी निर्भीकता और साफगोई का कोई जवाब नहीं था।1998 मे भारत ने गौरवपूर्ण तरीके से पोखरण-2 विस्‍फोट किया था।अमरीका ने नाराज हो भारत को काली सूची में डाला दिया था।चीन की विस्तारवादी नीति को ध्यान मे रखते हुए जार्ज ने कहा था कि चीन भारत का दुश्मन नंबर एक है।वाजपेयी जी भी हैरान थे। जार्ज की हिम्मत की तुलना आज के समय से कीजिए।चीन से ताजा संघर्ष के एक वर्ष से भी अधिक हो रहे हैं।वह अभी भी अग्रिम मोर्चे पर है और हमारे नेता लोग चीन का नाम भी नहीं ले पा रहे हैं।चीन की झालरों का बहिष्कार करने वाली जनता तो शायद इसे भूल भी चुकी है।जॉर्ज साहब ने करीब 22 साल पहले ही चीन को हमारा दुश्मन नंबर एक कहा था।रक्षामंत्री के पद पर रहते हुए उनकी यह दूरदर्शिता और साफगोई भारत समेत पूरे विश्व को चौंकाने वाली थी।उनको डोकलाम की आशंका थी।उन्होंने कहा कि चीन भूटान व सिक्किम पर कब्जा करना चाहता है।डा राम मनोहर लोहिया की तरह वह भी चीन के तिब्बत पर कब्जे के विरुद्ध थे और चाहते थे कि भारत इसका मुखर विरोध करें। 

जार्ज फर्नांडिस कांग्रेस के धुर विरोधी थे। यहां तक कि जनता पार्टी की टूट मे अहम भूमिका निभाने वाले जॉर्ज साहब बाद मे एन. डी. ए के कनवेनर बन गए।यह भारतीय वोट बैंक राजनीति का एक अहम मोड़ था।राजनैतिक विश्लेषकों का अनुमान था कि शायद जया जेटली ने अडवाणी जी के माध्यम से इसमे एक अहम भूमिका निभाई।आश्चर्यजनक रूप से जॉर्ज साहब का लोगों के,देश के मुद्दों पर कोई आंदोलन से सरोकार हटता जा रहा था।जॉर्ज फर्नांडिस ने अपने अंतिम दौर मे सत्ता की राजनीति के लिए अपने लोगों को निराश किया।बाद में उनके ऊपर बराक मिसाइल घोटाला,कफिन घोटाला जैसे आरोप भी लगे पर ये सब से उबर कर निकल आए। यह शोध का विषय हो सकता है कि यदि डा लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नाम पर राजनीति करने वाले समाजवादी वास्तव मे उन्ही लोगों के मार्ग पर चलते तो भी क्या जार्ज इतने अकेले पड़ जाते कि उनको एनडीए मे जाना पड़ता। ऐसे निर्भीक राजनेता,जार्ज फर्नांडिस के जन्मदिन पर उनकी स्मृतियों को नमन।

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