मीडिया Now - रेखा का सर्वश्रेष्ठ देखना बाकी है

रेखा का सर्वश्रेष्ठ देखना बाकी है

medianow 05-04-2021 16:39:56


वीर विनोद छाबड़ा / वो एक करिश्मा है। निर्देशक की नायिका है। उसे मालूम है कि किस गहराई और ऊंचाई के स्तर पर कब और कैसे परफार्म करना है। बात जब स्टाईल, सेक्सी और आकर्षक दिखने और अपनी मौजूदगी की अहसास कराने की होती है तो सिर्फ और सिर्फ उसी का ही नाम याद आता है। शून्य से शिखर तक की यात्रा उसने अकेले और अपने बूते की है। जब कभी वो राह भटकी है तो पुनः खुद को खोजा है। पुरुष बन कर पुरुषों वाले काम पुरुष से भी बेहतर ढंग से किये हैं। उसकी तुलना हालीवुड की लीजेंड ग्रेटा गोर्बा से होती है। अगर संक्षेप में हालीवुड की मर्लिन मुनरो सेक्स है तो बालीवुड की वो चमत्कार है। उसके नाम के बाद महान की सूची बंद हो जाती है। इस तरह की जब कहीं वार्ता हो रही हो तो यकीन जानिए यह सिर्फ और सिर्फ रेखा की बात हो रही होती है, जो अब तक ज़िंदगी के 67 बसंत देख चुकी है। 

ये फिल्मी दुनिया भी विचित्र है। किस्मत मेहरबान हो तो बंदा पल भर में कहां से कहां पहुंच जाए। अपढ़ भी हेडमास्टर बन जाता है। लेकिन रेखा को महज किस्मत ने फर्श से अर्श तक नहीं पहुंचाया। इसमें उनकी अपनी भी मेहनत शामिल है किसी ने कल्पना नहीं की थी कि मोहन सहगल की ‘सावन भादों’(1970) की वो पच्चासी झटके वाली थुलथुली और भोंदू रेखा, जिसको नाक तक पोंछने की तमीज नहीं थी, एक दिन किवदंती बनेगी। इसकी वजह सिर्फ यह है कि रेखा बचपन से अब तक की जिंदगी में बेशुमार पतझड़ों से गुजरी है और कई अग्नि परीक्षाओं की भट्टी में पकी है। न जाने कितनी बार ज़हर पिया है। यह सब उसने आत्मसात करके मंथन किया है। इससे आगे अब शायद कुछ बचा भी नहीं है। 

रेखा दक्षिण भारत के मशहूर अभिनेता जैमिनी गणेशन और अभिनेत्री पुष्पावली की पुत्री है। मां और पिता विधिवत शादीशुदा नहीं थे। जब वो जन्मी तो पिता ने अपना मानने से इंकार कर दिया। कैसे कैसे नर्क से गुज़र कर जब वो लोकप्रियता की ऊंचाईयों पर पहुंची तो पिता ने उसकी ज़िंदगी में ‘वापसी’ की कोशिश की। लेकिन रेखा ने इंकार कर दिया। शायद उसकी ज़िंदगी के इसी हिस्से से प्रभावित होकर ‘जीवनधारा’ (1963) बनी। अपनी ही ज़िंदगी की परदे पर बेहतरीन  परफारमेंस के लिये वो फिल्मफेयर पुरस्कार के लिये नामांकित भी हुईं। 

वो दिन थे संखियों संग खेलने कूदने के, पटोले बनाने के और पढ़ने के, सुनहरे सपने देखने के। लेकिन बचपन देखना उसके नसीब में नहीं था। फिल्मों में काम करना पड़ा। परिवार को आर्थिक संकट के उबारने के लिए। पहली हिंदी फिल्म थी 'अंजाना सफ़र', जो बिस्वजीत के साथ चुंबन दृश्य के कारण विवादों के घेरे में आ गयी। रेखा का कथन था कि चुंबन धोखे से लिया गया। सेंसर के लफ़ड़े के कारण यह फिल्म उस वक़्त रिलीज नहीं हो पायी। बाद में 'दो शिकारी' शीर्षक से रिलीज़ हुई और फ्लॉप हो गई। उसमें उक्त किसिंग सीन भी नहीं था। यह भी एक दिलचस्प बात है कि यह विश्वजीत ही थे जिन्होंने असल ज़िंदगी की भानुरेखा को रेखा नाम दिया। 

बहरहाल, अगली फ़िल्म ‘सावन भादों’ थी। महज़ सोलह साल की थी वो। उसे दक्षिण से आया सेक्स और ग्लैमर का बम करार दिया गया। रामपुर का लक्ष्मण, गोरा और काला, कहानी किस्मत की, धर्म-कर्म, आक्रमण, कीमत आदि अनेक फिल्में उसके साधारण अभिनेत्री होने की गवाह हैं। जब दुलाल गुहा की ‘दो अंजाने’(1976) रिलीज़ हुई, जिसमें उसने अमिताभ बच्चन की लालची पत्नी की जोरदार भूमिका में पहली बार झलक दिखायी तब पता चला कि उसमें एक बेहतरीन अदाकारा के तमाम गुण हैं। 1978 में रिलीज़ ‘मुकद्दर का सिंकंदर’ और ‘घर’ ने इस तथ्य को अग्रतर पुख्ता किया। इसके बाद रेखा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। भूमिका चाहे छोटी रही हो या बड़ी, हर फिल्म में वो अपनी मौजूदगी का अहसास कराने लगी। एक से बढ़ कर एक ईनामी भूमिकाओं में वो दिखने लगीं। ऋषिकेश मुखर्जी की ‘खूबसूरत’ (1980) ने उसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर अवार्ड दिलाया।  अगला अवार्ड राकेश रोशन की ‘खून भरी मांग’ (1988) के लिये मिला। यह उस वक्त मिला जब माना जा रहा था कि रेखा का जादू अब उतार पर है। उसका सर्वश्रेष्ठ गुज़र चुका है। फिल्मफेयर का एक और अवार्ड रेखा को 'खिलाडियों का खिलाड़ी’ (1998) के लिए मिला। लेकिन यह इंटरनेशनल नूराकुश्ती का गैंग चला रही खुंखार लेडी की नकारात्मक भूमिका के लिये था। 

मुज़फ्फर अली जब ‘उमराव जान’ (1981) की तवायफ़ की तलाश कर रहे थे तो उन्हें सुझाव दिया गया कि ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘सुहाग’ की रेखा को देखें। और मुज़फ्फर अली ने ये फ़िल्में देखीं तो उनकी तलाश का सफ़र पूरा हो गया। रेखा उमराव की जान बन गयीं।  इसके लिये सर्वश्रेष्ठ नायिका का राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला। एक इतिहासकार का कथन था कि गो उसने इतिहास में दर्ज उमराव जान को देखा तो नहीं है लेकिन रेखा को देख कर दावे से कह सकता हूं कि उमराव जान ऐसी ही रही होगी। 

परदे की दुनिया से बाहर रेखा लव अफेयर्स के लिये कई बरस तक खासी चर्चा में रही। सबसे पहले वो विनोद मेहरा से जोड़ी गयी। फिर किरन कुमार, जीतेंद्र और आखिर में अमिताभ बच्चन से उसके करीबी रिश्तों को लेकर गासिप की दुनिया चटखारे लेती रही। हालांकि रेखा इन सबसे इंकार करती रही। परदे के पीछे फ़िल्मी दुनिया में बहुत कुछ घटित होता है जिसे हम जान नहीं पाते हैं। बताते हैं कि जया बच्चन से मिली फटकार के बाद रेखा मान गयी कि वो किसी का घर उजाड़ कर और किसी पत्नी का दिल तोड़ कर कदापि अपना घर नहीं बसायेगी। इस किस्से की गिनती फिल्म इंडस्ट्री की टाप दस प्रेम कथाओं में होती है। इस विवादित और चर्चित अफ़साने का दि एंड भी खासा चर्चित और ड्रामाई रहा। यश चोपड़ा ने ‘सिलसिला’ बना कर रेखा-अमिताभ-जया के प्रेम त्रिकोण को एक खूबसूरत मोड़ देकर दफ़न किया। इधर रेखा ने भी 1990 में दिल्ली के व्यवसायी मुकेश अग्रवाल से शादी करके सारी अफवाहों पर पूर्ण विराम लगा दिया। मगर कोई साल भर बाद मुकेश ने व्यापार में घाटे के कारण आत्महत्या कर ली। रेखा फिर तन्हा हो गयी।

रेखा ने अमिताभ बच्चन के साथ कुल नौ फिल्में कीं। उन दोनों की जोड़ी बाक्स आफिस पर तत्काल सफलता की गारंटी माना जाता था। जीतेंद्र के साथ रेखा ने बीस फिल्में कीं। अनेक संस्थाओं ने उसे लाईफटाईम एवार्डों से नवाज़ा।  भारत सरकार ने 2010 में पदमश्री दी। और 2012 में राज्यसभा की सदस्यता दी। इसी सदन में जया बच्चन भी थीं। 'सिलसिला' की यादें ताज़ा हो गयीं। मगर शुक्र है कि ज़मीन में दफ़न किस्से भीतर ही रहे।

रेखा की कुछ अन्य हिट फिल्में हैं- डबल क्रास, धर्मा, नमक हराम, प्राण जाये पर वचन न जाये, जानी दुश्मन, ईमान धरम, गंगा की सौगंध, खून-पसीना, नटवरलाल, कालीघटा (डबल रोल), प्रेम बंधन, कर्तव्य, कलयुग, एक ही भूल, विजेता, अगर तुम न होते, कलजुग, उत्सव, मुझे इंसाफ चाहिए, बाज़ी, फासले, जाल, इजाज़त, बीवी हो तो ऐसी, भ्रष्टाचार, मेरी पति सिर्फ मेरा है, फूल बने अंगारे, आस्था, कामसूत्र, किला, बुलंदी, लज्जा, कोई मिल गया, क्रिश, यात्रा, सदियां, सुपर नानी आदि। 

रेखा ने लगभग डेढ़ सौ फिल्में की हैं। लेकिन ये यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। उम्र बढ़ी है लेकिन उमंगे अभी जवां हैं। वो कतई थकी नहीं दिखती हैं। वो फिटनेस की भी एक जीवित चर्चित मिसाल हैं। आज की पीढ़ी पूछती है वो क्या खाती हैं? कहां है वो चक्की? क्या पीती हैं? कौन सा योगासन करती हैं? किस मोहल्ले में है वो जिम है जिसमें वो जाती हैं? दो राय नहीं है कि रेखा की अब तक की पचास साल की फिल्मी यात्रा किसी महाकथा से कम नहीं रही है। इस पर एक कालजई बायोपिक फ़िल्म भी बन सकती है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि रेखा का सर्वश्रेष्ठ हम देख चुके हैं। ऐसा इसलिये कि ‘मदर इंडिया’ की नरगिस, ‘साहब बीवी और गुलाम’ की मीना कुमारी और 'बंदिनी' की नूतन जैसे कालजई किरदार तो उसमें अभी देखने बाकी हैं।
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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