मीडिया Now - भारत के ज्यादातर हिंदी-अंग्रेजी निजी चैनलों को देखना यातना से कुछ कम नहीं है

भारत के ज्यादातर हिंदी-अंग्रेजी निजी चैनलों को देखना यातना से कुछ कम नहीं है

medianow 05-04-2021 17:39:20


उर्मिलेश / भारत के ज्यादातर हिंदी-अंग्रेजी निजी चैनलों (कृपया इन्हें राष्ट्रीय चैनल कहना छोड़ दें) को देखना यातना से कुछ कम नही है। इनके मुकाबले क्षेत्रीय भाषायी चैनल अब भी देखे जा सकते हैं। हमारा अनुभव है कि सरकारी-खबरों के लिए अगर टीवी देखना है तो दूरदर्शन ज्यादा प्रमाणिक शासकीय-चैनल है! 
निजी न्यूज़ चैनलों को पूरे परिवार के साथ देखने के कई तरह के ख़तरे सामने आ रहे हैं। सीखने-समझने की उम्र वाले बच्चे अगर इन चैनलों के नियमित दर्शक बन गये तो बहुत संभव है वे उद्दंड, असभ्य, अमानवीय और बर्बर हो जायें! प्रौढ़ लोगों के साथ ये खतरे कुछ कम नहीं हैं। 

कई आपराधिक मामलों की पड़ताल से इस बात का पता चल रहा है कि अमुक अपराधी ने अपराध की उक्त शैली की नकल किसी चैनल के प्रोग्राम से की। यह तो ठोस उदाहरण की बात है। सोचिये, ऐसे चैनल भटके, बेरोजगार और उत्पीड़ित युवाओं के एक हिस्से को मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर कितना असर डाल रहे होंगे! चैनलों से भाषा और व्यवहार में अश्लीलता और फूहड़ता के विस्तार की आशंका भी बढ़ रही है! चुनाव प्रचार के दौरान बड़े-बड़े नेताओं की कठोर, धमकी व दबंगई भरी भाषा सुनकर कम पढ़े-लिखे युवाओं में उस तरह की अश्लील और असभ्य भाषा का 'आकर्षण' बढता नजर आ रहा है! इसलिए ऐसे चैनलों से आपको सतर्क रहने की जरुरत है।

आप पूछेगे, विकल्प क्या है? विकल्प हैं- अखबार हैं, अंग्रेजी में कई हैं। अपेक्षाकृत ठीक-ठाक पत्रिकाएं हैं, वेबसाइट और न्यूज़ पोर्टल हैं। कई विदेशी चैनल हैं।देशी चैनलों पर कुछेक अपेक्षाकृत बेहतर प्रोग्राम हैं या फिर कुछ शासकीय संस्थाओं द्वारा नियंत्रित चैनल हैं। ये भले ही पूरी तरह 'सरकारी' हों पर ये खौफनाक तो नही हैं। देखने वाले को मालूम रहता है कि वह सरकार-नियंत्रित चैनल देख रहा है। सूचनाएं भ्रामक या पूरी तरह सही नहीं हो सकती हैं, एकतरफ़ा बातें होंगी। लेकिन उन्हें देखने से आपके बच्चों के अश्लील, असभ्य, आक्रामक और अहमन्य बनने का ख़तरा तो नहीं होगा, जो हिंदी अंग्रेजी के ज्यादातर निजी चैनलों से बरक़रार रहेगा।

- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं 

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