मीडिया Now - Behave like a War, not just like an election if you have BJP as your opponent

Behave like a War, not just like an election if you have BJP as your opponent

medianow 06-06-2021 20:49:32


श्याम मीरा सिंह / कभी सोचा कि भारतीय राजा, आक्रमणकारी राजाओं से मुकाबले में हार क्यों जाते थे? कहानी लंबी है पर मैं छोटे से हिस्से को बताता हूँ. बाहरी आक्रमणकारियों के बारे में कहा जाता है कि वे जब लूटने के लिए कहीं निकलते थे तो अपने सबसे अच्छे सेनापति, सबसे अच्छे सैनिक, सबसे अच्छे घोड़े, सबसे अच्छे हथियारों के साथ निकलते थे, अगर सैनिक बूढ़ा है तो उसका कोई काम नहीं, सैनिक कमजोर है तो घर बैठे, युद्ध में उसकी कोई जगह नहीं. अगर 50 घुड़सवार भी आक्रमण के लिए जाते थे, तो वे सर्वोच्च 50 घोड़े, सर्वोच्च 50 सैनिक होते थे, उनके ऊपर जो सेनापति होता था वो उस कबीले का सबसे बहादुर, जांबाज लड़ाका हुआ करता था, जो तलवार के दम पर कबीले का सेनापति बना था. लेकिन दूसरी तरफ भारतीय राजाओं के साथ कई समस्याएँ थीं, यहां एक दो कास्ट के अलावा कोई दूसरा सैनिक नहीं हो सकता था, एक बहुत बड़े हिस्से को सैन्य सेवाओं से वंचित रखा गया. जिन अलग-अलग जातियों से शानदार लड़ाके आ सकते थे वे जाति की वजह से सेना में दाखिल नहीं किए गए, जो भी अच्छे-बुरे सैनिक ढूंढने थे, वे एक दो जाति से ही ढूंढने थे, परिणामतः सैनिक छांटने के लिए विकल्प कम ही बचे, बल्कि दस प्रतिशत ही बचे. जिसका पिता सैनिक था, जिसका बाबा सैनिक था, वो ही अगले राजा के नीचे सैनिक बनता, उसकी योग्यता, उसके घोड़े, उसकी पारंगतता मायने नहीं रखती, उससे ज्यादा मायने रखती उसकी जाति, चूँकि पिता भी सैनिक रहा था, इसलिए उसका बच्चा भी सैनिक बनेगा. 

एक तरफ प्रतियोगिता के माध्यम से छांटे गए लड़ाके, दूसरी तरफ जाति की वजह से जबरन युद्ध में लाया गया सैनिक. जीत किसकी होनी थी, किसकी हुई, सब जानते हैं. पूरे सल्तनत का इतिहास देखें तो हर बार वही राजा बना जिसकी तलवार में दम था, वहां पिता के बूढ़े होने का इंतजार नहीं किया, अगर वृद्ध पिता शासन संभालने में कमजोर है तो गद्दी से उतार दिए गए. गद्दी पर हर बार वही बैठा जिसकी भुजाओं में दम था, जिसकी तलवार नहीं कांपती थी, जिसमें भय नहीं था, अगर इल्तुतमिश शासक बना है, अगर बलवन शासक बना है, अगर अलाहुद्दीन शासक बना तो इसलिए नहीं कि वे किसी खास जाति से आते थे, या उनके पिता किसी खास ओहदे पर थे, या इसलिए कि किसी ने चम्मच लाकर मूंह में थमा दी और राजा बन गए. वे दिल्ली सल्तनत के राजा इसलिए बने क्योंकि वे अपने वक्त के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे, सर्वश्रेष्ठ लड़ाका थे. इसलिए उन्होंने रूल किया, इसलिए उनके समाज ने भी रूल किया. सल्तनत पर कभी ममलूकों ने शासन किया तो कभी खिलजी वंश ने, कभी तुगलक ने तो कभी सैयद और लोधी वंश ने. इन्होने इसलिए शासन किया क्योंकि इनका नेतृत्व करने वाले लोग सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे. बाद में बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहाँ, औरंगजेब ने एक-एक राज्य को अपनी तलवार से रौंद डाला. कारण ये था कि उनमें सर्वश्रेष्ठ नेता चुने जाने की गुंजाइश थी, मगर भारतीय राजाओं में ये व्यवस्था नहीं था, वहां पिता के आदेश पर राजा बदल जाते थे, भाइयों में शासन का बंटवारा हो जाता, सैनिक वही पुराने, अपनी ही कास्ट के, अपने ही गोत्र के. शासन ऐसे बंटता था जैसे केक बंट रहा हो. परिणाम ये हुआ कि वे कभी मुगल साम्राज्य के आगे टिक नहीं सके. मुगलों को आकर किसने हराया? उनसे भी सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं ने, तकनीकी के मामले में उनसे भी अधिक श्रेष्ठ सेनापतियों ने. अबकी बार युद्ध में एक कंपनी थी, राजाओं का हारना तय था, यही सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट का नियम है, यही डार्विन कहते हैं, जो बेस्ट होगा वही टिकेगा, जिसके यहाँ बदलने की शक्ति होगी वही युद्ध का झंडा उखाड़कर ले जाएगा. 

लेकिन क्या भाजपा का मुकाबला करने वाली पार्टियों में ये गुंजाइश है कि उनकी पार्टी के बेस्ट कार्यकर्ता उस पार्टी के अध्यक्ष बन सकें? क्या किसी भी विपक्षी पार्टी में इतना स्पेस है कि एक सामान्य कार्यकर्ता अपना जीवन तपाकर वहां सबसे बड़े पद पर बैठ सके. भाजपा के खिलाफ लड़ने वाली पार्टियों में क्या इतनी गुंजाइश है कि वो अपने सेनापति बदलें? आप एकबार हर पार्टी की तरफ नजर घुमाकर देख लीजिए, वही पुराने लचर सेनापति हैं, बिल्कुल मान सकता हूँ वे अपने समय के श्रेष्ठ लड़ाके रहे होंगे, मगर क्या उनमें उन समाजों, जातियों, पार्टियों में और लड़ाके नहीं बचे जो आगे नहीं आ पाते? देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के सेनापतियों को देखिए... दशकों से दो ही नाम हैं, उनके अलावा नाम सुझा ही नहीं सकते. देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अपना अध्यक्ष नहीं चुन पाती, बाकी पार्टियों की हालत सेम है, एक इंच कम खराब नहीं है, बदतर ही मिलेगी. सपा, बसपा, रालोद, लोकदल, कहीं ऐसी गुंजाइश नहीं है कि शीर्ष पदों पर कोई और सेनापति आ सके. आज विपक्षी पार्टियों की हालत भारतीय राजाओं जैसी है, जो अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं, मगर अपना सेनापति नहीं बदल सकतीं, सेनापति चुनने के लिए उनके पास अपने परिवार के अलावा कोई विकल्प नही होता. 

दूसरी तरफ भाजपा है, जो मंगोलों की तरह अपने सर्वश्रेष्ठ लड़ाकों के साथ युद्ध में उतरी हुई है. उसकी टोकरी में किसी भी एक खराब सेब को रखने की जगह नहीं. जिस आडवाणी के आगे मोदी की स्थिति एक सारथी की थी, उसी सारथी ने आडवाणी को गाड़ी से उतार दिया, जिस राजनाथ सिंह ने मोदी के लिए PM पद का रास्ता दिया, जो इतने बड़े कद का नेता थे, जो पार्टी के अध्यक्ष थे, वे आज नेपत्थ्य में हैं, पहले गृहमंत्री बने आज रक्षा मंत्री पद से संतोष करना पड़ रहा है, ये गुंजाइश उस पार्टी में है, ये स्पेस उस पार्टी में है, जिसने गाड़ी में बिठाया हो, उसे ही गाड़ी से उतारे जाने की जगह उस पार्टी में है, वहां वही गाड़ी चलाएगा जिसे सबसे अच्छे से गाड़ी चलाना आता होगा. क्योंकि उद्देश्य गाड़ी को आगे चलाने का है. गाड़ी में गति रखने का है, किसी ड्राइवर से मोहब्बत का नहीं है. अन्यथा उस पार्टी में आज भी आडवाणी चुनाव लड़ रहे होते, और आज भी भाजपा दो सौ के अंदर सिमट कर रह जाती, फिर आडवाणी के बेटे-बेटी या दामाद में से कोई सेनापति बनता, फिर उनका कोई बेटा-बेटी बनता, अगर विपक्षी पार्टियों जैसी स्थिति भाजपा में होती तो कभी भी मोदी, योगी, अमित शाह ऊपर नहीं आ पाते. मोदी, शाह, योगी आखिरी नहीं हैं, इनके जो भी वैरीयंट आगे आएँगे, वो इनसे भी खतरनाक और ताकतवर आएँगे. और इसके लिए ये पार्टी लगातार मंथन करती है, बैठकें करती है, बर्तनों की तरह बजाकर देखती है, सेब की टोकरी की तरह चेक करके भी देखती है कि कोई सड़ा हुआ सेब तो नहीं आ गया.

पाँच राज्यों में चुनाव हुए, किस स्तर पर मोदी और शाह ने रैलियाँ कीं इसे दोहराने की ज़रूरत नहीं है, जिस तरह की परिस्थितियाँ आईं उसी तरह इस पार्टी ने खुद को ढाला, कोरोना की शुरुआत में ही बिहार के दूरस्थ इलाकों में LED लगा दीं, मौक़ा मिला तो लाखों लोगों की रैलियाँ भी कीं, सेकंड वेव को लेकर दबाव बनने लगा तो 500 लोगों की भी रैलियाँ कीं. मगर रैलियाँ नहीं छोड़ीं, प्रचार नहीं छोड़ा. पांच राज्यों के चुनाव खत्म हुए तो पूरी पार्टी के लीडरों की बैठक बुला ली. 23 मई को नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा ने आगे के चुनावों के लिए बैठक की, दूसरी तरफ आरएसएस के नेता भी मौजूद रहे, संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले भी भाजपा से थाह लेते रहे. आगामी चुनावों में यूपी महत्वपूर्ण है. तो भाजपा-संघ ने अभी से थाह लेना शुरू कर दिया. अगर कुछ भी ऊंच नीच होता है तो योगी को हटाने में वक्त नहीं लगेगा, और अगर योगी की जरूरत है पार्टी को, और वे बेस्ट हैं तो उन्हें मोदी भी नहीं हटा सकते. मोदी ने तो कोशिश भी की थी कि योगी CM न बने, लेकिन बने. बीते दिनों लखनऊ में बीजेपी के महासचिव बीएल संतोष भेजे गए, ये देखने के लिए कि जमीन पर क्या है...बीएल संतोष ने पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के साथ बारी-बारी से मुलाकात की. संगठन और सरकार दोनों के बारे में नेताओं से फीडबैक लिया. इससे पहले आरएसएस के कई केंद्रीय नेता यूपी आ चुके हैं, अब भी जब बाकी पार्टियाँ उबाई मार रही होंगी, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) के 10 शीर्ष नेताओं की तीन दिन की बैठक चली है. 3 जून से 5 जून तक दिल्ली में आरएसएस ने मंथन किया है. संघसरचालक मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबोले, सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल, अरुण कुमार, रामदत्त, डॉ. मनमोहन वैद्य, मुकुंद सीआर और रामदत्त चक्रधर समेत भैयाजी जोशी, सुरेश सोनी, एस वैग़या आदि ने भाजपा-आरएसएस और आगामी चुनावों पर मंथन किया है कि क्या बेस्ट हो सकता है. कल से जेपी नड्डा के यहाँ राष्ट्रीय महासचिवों, और भाजपा के प्रदेश प्रभारियों के साथ बड़ी बैठक चल रही है. जिसमें कहा तो जा रहा है कि कोरोना पर भी बात होगी, मगर पूरा फोकस आगामी चुनाव हैं, उसमें भी यूपी का चुनाव, देखा और तोला ये जा रहा है कि बेस्ट क्या हो सकता है..... किसी नेता के लिए नहीं बल्कि पार्टी के लिए जो बेस्ट हो सकता है. 

आज शक्ति के चरम पर होकर भी मोदी-शाह योगी को लेकर शंकित हैं उन्हें डर है कि योगी उनका विकल्प न हो जाएँ, और लोकप्रियता के चरम पर होकर भी योगी की हलक का पानी सूखा हुआ है कि कब गाज गिर जाए, ये जो डर है, यही प्रतिस्पर्धा है, यही कंपटीशन है, यही श्रेष्ठता है, यही बेस्ट घोड़े चुनने की प्रक्रिया है. योगी-शाह-मोदी या आगे और भी कौन सा नेता इस पार्टी को आगे पहुंचा सकता है गाड़ी की चाबी उसे ही दी जाएगी, बस ये चाभी देने का काम करने वाला अदृश्य है, ये पीछे है, ये एक आदमी नहीं है, एक पूरा संगठन है, जो सबसे बेस्ट घोड़े को मैदान में भेजता है, जो अपने सर्वोच्च सेनापति को तलवार सौंपता है, जो अपने सर्वाधिक खतरनाक लड़ाके पर हाथ रखता है... 

क्या भारतीय विपक्षी पार्टियों में ये गुंजाइश है कि विपदा के इस समय में वे अपने सबसे बेहतरीन लड़ाके युद्ध में भेज सकें? अगर आप चाहते हैं कि आपकी जातियों, विचारधाराओं की पार्टियाँ भाजपा से जीतें, तो तब तक आलोचना करनी होगी, तब तक चिल्लाना होगा, जब तक कि वे संघ और भाजपा की तरह प्रतिस्पर्धी न हों जाएं, जब तक कि वे अपने पुराने सेनापतियों को उतारकर अपने सबसे जांबाज लड़ाके युद्ध में न भेजने लग जाएँ.
- लेखक आजतक के पत्रकार हैं

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