मीडिया Now - संजीव नेक्स्ट टू दिलीप

संजीव नेक्स्ट टू दिलीप

medianow 07-06-2021 11:04:39


वीर विनोद छाबड़ा / अली पीटर जॉन अंग्रेज़ी फिल्म पत्रकारिता का बहुत बड़े पत्रकार होते थे. साप्ताहिक स्क्रीन में उनका रेगुलर कॉलम छपता था - अबाउट स्टार्स. कुछ ऐसा ही नाम था. बड़े बड़े स्टार्स की चाहत होती थी कि अली अपने कॉलम में उनका ज़िक्र कर दें तो उनका नाम ऊँचा हो जाएगा. मुझे एक आर्टिकल याद है. जिसमें उन्होंने संजीव कुमार का इंटरव्यू लिया था. उस दौर में कई जानकारों के मानना था कि नेक्स्ट टू दिलीप कोई है तो वो संजीव कुमार ही है. संजीव उस दिन स्टूडियो में शूटिंग कर रहे थे. अली ने शॉट खत्म होने तक इंतज़ार किया. शॉट खत्म हुआ तो संजीव ने अली से पूछा - आप होम वर्क तो करके ही आये होंगे. अली ने कहा - हां... संजीव ने कहा, ठीक है - क्या क्या जानते हैं मेरे बारे में?... उन दिनों अली के बारे में संजीव ज़्यादा नहीं जानते थे. अली अंग्रेज़ी में लिखते थे और संजीव का हाथ अंग्रेज़ी में थोड़ा कम था. मगर अली का ज्ञान अपरंपार था, चाहे सामने वाले का फ़िल्मी दुनिया में कद छोटा हो या बड़ा. अली ने जब संजीव को संजीव के बारे में बताना शुरू किया था तो वो दंग रह गए - मुझे खुद के बारे में इतना ज्ञान नहीं है. ठीक है शाम को... होटल में मिलें.

संजीव जब होटल पहुंचे तो अली वहां पहले से मौजूद मिले. बढ़िया स्कॉच के साथ नॉन वेज. इंटरव्यू ख़त्म हुआ. और अगले फ्राइडे को स्क्रीन में छप भी गया. संजीव ने अली को फिर उसी होटल में निमंत्रित किया. संजीव ने अली को गले लगा लिया. अद्भुत अंग्रेज़ी है आपकी. इतना पीने के इतना याद कैसे रहता है? आज से हम दोस्त हुए. मैं हरी भाई और आप अली भाई....तभी वहां एक अन्य पत्रकार भी आ गए. आते ही उन्होंने संजीव की तारीफ़ करनी शुरू की. सुना है 'विधाता' में दिलीप कुमार के सामने बहुत बढ़िया परफॉर्म किया है. और उस सीन में तो आपने दिलीप कुमार की ज़बरदस्त धुलाई की है जिसमें दिलीप कुमार आपको नौकरी से निकालते हैं और आप कहते हैं, तुम मुझे क्या निकलोगे मैं तुम्हें मालिक की नौकरी से अलग करता हूँ. दिलीप को ये अच्छा नहीं लगा है और उन्होंने सुभाष घई से वो सीन हटवाने को कह दिया है. ये सुनते ही संजीव गुस्से से थरथराने लगे. उठ कर खड़े हो गए और उस पत्रकार को ज़बरदस्त तमाचा जड़ दिया, तुम क्या जाना यूसुफ़ भाई को? मेरे जैसे हज़ारों संजीव कुमार पैदा होंगे और आते-जाते रहेंगे मगर यूसुफ़ भाई उसी ऊँचे मुक़ाम पर खड़े मिलेंगे जहाँ आज हैं. 
नोट - मुझे याद है वो सीन फ़िल्म से हटा नहीं, जहाँ का तहां रहा. मैंने पिछले साल इस सीन के बारे में तफ़सील से लिखा था. मौका मिला तो रिपीट करूँगा. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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