मीडिया Now - 2024 की पटकथा कौन लिखेगा?

2024 की पटकथा कौन लिखेगा?

medianow 10-06-2021 12:34:50


राकेश कायस्थ / 

अपने यहाँ जनतंत्र एक तमाशा है
 जिसकी जान मदारी की भाषा है 

धूमिल की ये पंक्तियां उनकी लंबी और मशहूर कविता `पटकथा’ का हिस्सा है, जिसे भारतीय राजनीति के शाश्वत सत्य के रूप में अक्सर कोट किया जाता है। बिना पटकथा के कोई हिट फिल्म नहीं बनती हैं। कहानियां बेशुमार होती हैं लेकिन उन्हें एक अच्छी पटकथा यानी स्क्रीन प्ले में ढालना सबके के बूते की बात नहीं होती है।भारतीय राजनीति में बड़ी शक्तियों का विस्थापन तभी हुआ है, जब पटकथा ठीक से लिखी गई और उसके सारे पात्रों ने अपने-अपने किरदार को बखूबी अंजाम दिया। राजीव गाँधी की सरकार आज़ाद भारत की सबसे मजबूत सरकार थी। नौजवान प्रधानमंत्री में तीन दशक से चले आ रहे यथास्थितिवाद को तोड़ने की बेचैनी थी। आईटी क्रांति, पंचायती राज, नवोदय विद्यालय, मताधिकार की उम्र घटाना, सियाचिन की जीत, सामरिक मोर्चे पर चीन के साथ हुई झड़प में कामयाबी, सार्क की स्थापना, असम और पंजाब में स्थायी शांति के लिए उठाये गये निर्णायक कदम। कुल मिलाकर देखें तो देश के इतिहास में संभवत: इतनी प्रो एक्टिव सरकार कोई दूसरी हुई नहीं हुई। गलतियां भी थीं लेकिन ज्यादातर फैसले देश का भविष्य बदलने वाले थे। लेकिन तभी एक  कहानी शुरू हुई जिसका नाम था—बोफोर्स।

ख़बर चली कि स्वीडिश कंपनी के साथ रक्षा सौदे में 64 करोड़ रुपये की दलाली ली गई है। बिखरे विपक्ष ने इस ख़बर को चटपट एक बढ़िया स्क्रीन प्ले में बदल दिया। वी.पी.सिंह के रूप में ईमानदारी के मसीहा टाइप एक नायक का उदय हुआ।  फटाफट राष्ट्रीय मोर्चा बना और देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय मोर्चे के पोस्टर पर वी.पी सिंह के साथ चंद्रशेखर और देवीलाल जैसे नेताओं के अलावा सुदूर दक्षिण के एंटी रामाराव भी नज़र आने लगे। 
विपक्ष ने लड़ाई मिलकर लड़ी।  लेफ्ट और राइट की दो बैसाखियों  के सहारे राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार खड़ी हुई। सरकार ज्यादा नहीं चली। बोफोर्स के आरोपों का क्या हुआ सबको पता है लेकिन ठीक से लिखी एक पटकथा के सहारे कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र से बेदखल कर दिया गया। 

ऐसी ही एक पटकथा अटल बिहारी वाजपेयी के पास थी। वाजपेयी जो आधे नेहरूवादी और आधे हिंदूवादी थे। वाजपेयी जो देश को ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि बीजेपी सिर्फ दंगे करवाने वाली पार्टी नहीं बल्कि उसे सरकार चलाना भी आता है। लोक जीवन में मर्यादा की कहानियां गढ़ी जा रही थी। इन कहानियों को मजबूती देने के लिए पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी जैन हवाला डायरी केस में नाम आने के बाद लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे।

एक बार वाजपेयी को मौका क्यों नहीं? इसी पटकथा पर नब्बे के दशक की पूरी राजनीति चली और आखिरकार वाजपेयी एक गठबंधन के साथ सत्ता तक पहुँचने में कामयाब रहे। सत्ता प्रतिष्ठान के केंद्र में आरएएस के स्थापित होने की बात बहुत से लोगों के लिए अकल्पनीय थी लेकिन उसे ठीक से लिखे स्क्रीन प्ले ने सच कर दिखाया। 2014 की पटकथा सबसे अनोखी थी।  नरेंद्र मोदी को एक ऐसे राजनेता के रूप में पेश किया गया है, जिन्हें अब तक देश ने गलत समझा है। राम मंदिर बीजेपी मेनिफेस्टों के आखिर के पन्नों पर था और मोदी अपने भाषणों में ‘देवालय नहीं शौचालय’ जैसी बातें कर रहे थे। 

नये नवेले सोशल मीडिया पर  मध्यमवर्गीय समर्थकों का एक तबका यह साबित करने में जुटा हुआ था कि मोदी के पास इस देश के हर मर्ज की दवा है। उनके आते ही विदेशी निवेश की झड़ी लग जाएगी, रोजगार के नये अवसर पैदा होंगे और ये देश सिंगापुर बन जाएगा। सोशल मीडिया पर उन दिनों जो कहानियां चल रही थीं, उनमें एक कहानी ये भी थी कि मोदी अपने काम से वक्त निकालकर हर रविवार को आईआईटी के बच्चों को मैथेमैटिक्स पढ़ाते हैं।
दरअसल ये पटकथा 2010 के बाद से लगातार लिखा जा रही थी। अन्ना हज़ारे ने आंदोलन के नाम पर माहौल बनाया और हीरो ने सही मौके पर एंट्री मारी। ठीक से लिखी गई पटकथा का क्या असर हुआ ये बताने की ज़रूरत नहीं है।  2019 में मोदी ने पुलवामा के स्क्रीन प्ले के सहारे मुश्किल नज़र आ रही एक लड़ाई को बेहद आसान बना दिया और दोबारा सत्ता में आ गये। अब सवाल ये है कि क्या विपक्ष 2024 में ऐसी कोई पटकथा लिख पाएगा?

कहानियां बेशुमार हैं लेकिन उन्हें दृश्यों में पिरोकर एक सुपरहिट शो बनाने की क्षमता किसके में है? इस सवाल का अब तक कोई जवाब नहीं मिल पाया है। बीजेपी समर्थकों के एक बड़े वर्ग ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि चुनाव जीतना अलग बात है। देश चलाना मोदी-शाह के बस की बात नहीं है लेकिन उनका सवाल है कि फिर चलाएगा कौन?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब विपक्ष को देना होगा। नॉन परफॉरमेंस को भुनाकर सत्ता में आने के लिए जो न्यूनतम ताकत चाहिए वो अब कांग्रेस के पास नहीं है। उसे एक पटकथा चाहिए। पटकथा जिसमें न्याय योजना जैसी स्कीम से आगे कुछ ऐसा हो जो जनता के मन भाये। मैं दो-तीन काल्पनिक स्थितियां बता रहा हूँ। पहली स्थिति ये है कि प्रियंका गांधी यूपी का चुनाव जी-जान लगाकर लड़ें और कांग्रेस चालीस-पचास सीटें ले आये। उसके बाद प्रियंका कांग्रेस की कमान संभाले और राहुल गांधी अगले दो साल तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक घूम-घूमकर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करें।

दूसरी स्थिति ये है कि लोकतंत्र बचाने की खातिर सोनिया गांधी कांग्रेस  से निकले सभी धड़ों से वापस आने की अपील करें और उनका कांग्रेस में विलय हो, जैसे जनसंघ और समाजवादियों वगैरह ने इमरजेंसी के बाद मिलकर जनता पार्टी का गठन किया था।  गांधी परिवार ये घोषणा करे कि उसका उदेश्य सिर्फ लोकतंत्र बचाना है। क्षत्रपों के हाथ में ताकत दी जाये और पवार और ममता जैसे लोग 2024 की कमान संभालें।

इन दोनों काल्पनिक स्थितियों में सीन वन का होना मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं है। अगर प्रियंका गांधी यूपी में सचमुच कोई कमाल कर जाती हैं तो 2024 की पटकथा तैयार हो सकती है। दूसरी स्थिति का होना संभव नहीं है। यानी पहले ही ज़रूरत से ज्यादा कमज़ोर हो चुकी कांग्रेस क्षत्रपों को आगे करने का जोखिम नहीं लेगी।  ना तो कांग्रेस गांधी परिवार के बिना एक कदम चल सकती है और ना परिवार पार्टी पर अपनी पकड़ ढीली कर सकता है। 

यानी 2024 की मौलिक पटकथा लिखे जाने की कोई बड़ी संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है। हाँ एक तीसरी स्थिति ज़रूर बन सकती है। जिस तरह 2014 की कहानी का केंद्र गुजरात था, उसी तरह 2024 का केंद्र बंगाल बने तो?

ममता बनर्जी ने इस बात की कोशिशें शुरू कर दी हैं। वे राष्ट्रीय मसलों पर खुलकर बोल रही हैं। किसान नेताओं को बुलाकर मीटिंग कर रही हैं और प्रेस काँफ्रेंस करके एलान कर रही हैं कि मोदी को हटाना उनका सबसे बड़ा पॉलिटिकल गोल है। लेकिन क्या ममता बनर्जी जगन मोहन रेड्डी, चंद्रशेखर राव और नवीन पटनायक जैसे लोगों के साथ मिलकर कोई ऐसा करिश्मा कर सकती हैं, जिसके 2024 में सबकुछ बदल जाये।

सीधी टक्कर वाली डेढ़ सौ सीटों पर कांग्रेस अगर बीजेपी के खिलाफ अगर प्रभावी प्रदर्शन नहीं करती है तो केंद्र में बदलाव की संभावना बेमानी है। मतलब पटकथा कांग्रेस को ही लिखनी होगी। बिना बेहतर स्क्रीन प्ले के हिट फिल्म नहीं बन सकती है। स्क्रिप्ट हाथ में नहीं है, कोई बात नहीं है लेकिन क्या कांग्रेस इसकी तलाश में नज़र आ रही है? फिलहाल कम से कम मुझे ऐसा नहीं लगता है।
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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