मीडिया Now - सवाल लोगों के दल बदलने पर कांग्रेस नेतृत्व को कोसने का नहीं हैं

सवाल लोगों के दल बदलने पर कांग्रेस नेतृत्व को कोसने का नहीं हैं

medianow 10-06-2021 15:11:03


पंकज चतुर्वेदी / हम स्कूल में पढ़ते थे-- जनता पार्टी का शासन आ गया था -- कांग्रेसियों को जम कर ठीकाने लगाया जा रहा था -- जावरा जैसे छोटे से कसबे में कांग्रेस दो फाड़ हो गयी थी -- रेड्डी कांग्रेस , इंदिरा  कांग्रेस -- गाय बछडा   छोड़ कर  हाथ के पंजे के झंडे दिखने लगे -- मीटिंग हुयी कोर्ट कचहरी  हुयी और कांग्रेस आई ही असली कांग्रेस रह गयी -- उस समय जो अलग हुए थे -- वे अंग्रेजी में स्ताल्वार्ड  कहलाते थे . उससे पहले भी सिंडिकेट वाला विभाजन हुआ ही था . सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के मसले में जो अलग हुए थे -- पवार, संगमा आदि वे भी बड़े छतरप थे --- वीपी  सिंह के साथ तो  राजीव गांधी की सारी बाबा गेंग चली गयी थी - जनमोर्चा बना= फिर जनता दल --- फिर जनता दल यु, एस , समता और न जाने क्या क्या --- फिर दस साल सत्ता में रह कांग्रेस 
इस बीच पार्टी का पैसा अकेले पचा लेने वाले वाय एस आर कांग्रेस बना लिए तो  बंगाल में भा जा पा के पैर जमा कर कांग्रेस को कमजोर करने वाली ममता  भी अलग हुयी -- और भी बहुत कोई --

यह सच है कि नेहरु का जो करिशामायी व्यक्तित्व था -- उसका पीढ़ियों के साथ क्षय होता गया -- यह प्राकृतिक नियम भी है -- ट्रांसमिशन लोस होता ही है -- वैश्वीकरण के बाद राजनीती में निति और मूल्य शून्य होते गये -- अब नेता व्यक्ति पूजक है और कार्यकर्त्ता नेता पूजक -- राजनीति बदल गयिबाई और पुराने अनुभव की पुनरावर्ती मात्र संभव नहीं हैं . लेकिन यह बात तय है कि देश की मूल आत्मा चौराहे पर है -- भा ज पा और कांग्रेस में एक मामूली फर्क है --- वह है साम्प्रदायिकता  को ले कर , आलोचना के प्रति संवेदनशीलता को ले कर और संविधान के मूल स्वरुप को ले कर .

कांग्रेस में सॉफ्ट हिंदूवादी लोग आज़ादी के पहले से रहे -- दुर्भाग्य है कि कांग्रेस में जो कम्युनिस्ट दीमक लगी - उसने धार्मिकता, साम्प्रदायिकता और नास्तिकता में भेद मिटा दिया -- इसके चलते कांग्रेस को नब्बे के दशक के बाद मुस्लिम तुष्टिकरणके आरोप झेलने पड़े और उसी ने मंदिर आन्दोलन के नाम पर सत्ता शिखर पर पहुँचने के सांप्रदायिक मार्ग को और सहज किया . आज भी यूपी जैसे राज्य का मुसलमान वोट देगा हाथी, सायकल, पतंग या दिल्ली में झाड़ू पर लेकिन गाली बकने और उम्मीद रखने या फिर उलाहने देने के लिए कांग्रेस का इस्तेमाल करता है -- हालात बिलकुल आज़ादी पूर्व जैसे -- सं १९३७ के चुनाव में सारे मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में लीग गायब थी -- सभी जगह मुस्लिम कांग्रेस को वोट दे गये लेकिन आठ साल बाद ही वोट का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर हो गया और उसमें सबसे बड़ी भूमिका हिन्दू महा सभा और उसके प्रतिस्पर्दा में लीग की रही . अरब  के पैसे से चमकती मस्जिदों और मदरसों के भीतर देवबंदियों ने भी -- खूब चरस बोया-  ताजिये मत निकालना, दूसरी धर्म की औरत से शादी मत करना-- किसी से प्रशाद मत लेना , रंग लगवाया तो इस्लाम खतरे में आ जायेगा ----- जान लें अरब पर सुल्तान जरुर मुसलमान हैं लेकिन शासन अमेरिका का है -- आज भी भारत पाकिस्तान के बीच अरब में चोरी छुपे गुपचुप चल रही हैं -- पिछले रविवार को दिल्ली में पीडीपी नेता, उपराज्यपाल सहित बड़ा जमावड़ा था और परसों ही वहां 200 कम्पनी केन्द्रीय बल की भेजी गयी --- यह केवल जताने के लिए कि कश्मीर मसले को मुसलमान का मसला बनाने में किस तरह साजिश होती है और वे लोग इसमें शामिल होते हैं जो मस्जोदों को चमकाने के नाम पर धर्मांध मुस्लिम तैयार करते हैं .. प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता को रोका जा ही नहीं  सकता --एक कजरी-मुल्ला फरमा रहे थे कि आरएसएस का डर दिखा कर वोट लेते रहे -- उससे बेहतर बीजेपी को हे वोट दे दो -- मियाँ जी उत्तर पूर्वी दिल्ली के दंगे या यूपी मनाये रोझो rअहि गोउ आतंकी घटना बानगी है कि जब उत्पात होगा ओ कमल वाले मुल्ले सबसे पहले मारे जायेंगे।


बहुत से आंकड़े हैं कि कांग्रेस के शासन में निर्दोष अल्पसंख्यकों को पोटा जैसे कानूनों में जल में डाला गया -- लेकिन उस शासन में प्रतिरोध के स्वर ऐसे नहीं दबाये गये -- लिखने वाले भाषण देने वाले , असहमत लोगों को साजिश रच कर जेल में नहीं डाला गया-- जन आंदोलनों को लाठी से नहीं कुचला गया --- सत्ता का चरित्र समान होता है क्यंकि उसको चलने वाले तन्त्र में वही  अफसरान होते हैं  लेकिन दिल्ली में किसी प्रदर्शन को ऐसे नहीं कुचला गया जैसे शाहीन बाग़ को -- आज सवाल लोगों के दल बदलने पर कांग्रेस नेतृत्व को कोसने का नहीं हैं -- तोड़ा सोचें कि हमने किस समाज को जन्म दिया है जो वैचारिक नपुंसक है -- जो स्वार्थ , लोभ के लिए अपने छः महीने पहले के भाषण के ३६० डिग्री विपरीत हो जाता है ? कांग्रेस को निश्चित ही समाप्त हो जाना चाहिए -- ताकि देश में पूरी तरह निर्न्कुच हिन्दू-पाकिस्तान बन सके --- फिर वे दलित चिंतक जो कांग्रेस के शासन में कांग्रेस को गई दे कर भी राज्य  सभा टीवी से दो लाख का वेतन उठाते रहे  या वे कम्युनिस्ट जो कांग्रसी शासन में एम्बेसडर से नीचे नहीं उतरे -- उनको बताना पड़े -- आपकी असल पोलिटिक्स क्या है जनाब ?
- लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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