मीडिया Now - जब के.आसिफ ने कहा मेरी फ़िल्म का नाम 'मुगल-ए-आज़म' है, 'सलीम-ए-आज़म' नहीं

जब के.आसिफ ने कहा मेरी फ़िल्म का नाम 'मुगल-ए-आज़म' है, 'सलीम-ए-आज़म' नहीं

medianow 15-06-2021 20:33:19


वीर विनोद छाबड़ा / हर फ़िल्म में हीरो सुप्रीम होता है, ऐसा हर हीरो मानता है. आम धारणा भी यही है. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अच्छे डायलॉग भी हीरो के हिस्से में जाते हैं, कैमरे के सामने ज़्यादातर उसी का चेहरा रहता है. हीरोइन के मुक़ाबले क्लोज़-अप भी उसी के ज़्यादा होते हैं. लेकिन 'मुगल-ए-आज़म' में ऐसा नहीं होने पाया.  जैसा कि सभी जानते हैं बादशाह अकबर बने थे पृथ्वीराज कपूर और शहज़ादे सलीम का किरदार दिलीप कुमार के हिस्से में था. लेकिन फिल्म निर्माण के दौरान लम्बे वक़्त तक दिलीप कुमार ख़ुद को ही हीरो समझते रहे. हमने सुना है, उन्हें बहुत तक़लीफ़ होती थी, जब डायलॉग की अच्छी लाईनें पृथ्वीराज कपूर के हिस्से चली जाती थीं, कैमरा भी उन पर ज़्यादा वक़्त तक फ़ोकस रहता था. मधुबाला ने भी क़हर ढाह रखा था. बेहतरीन गाने उन्हीं के हिस्से में आये. दिलीप के हिस्से में एक भी नहीं. पैसा भले शापूरजी लगा रहे थे, मगर असल कर्ता-धर्ता डायरेक्टर के.आसिफ़ थे और वो दिलीप कुमार के बहुत अच्छे दोस्त भी थे. एक दिन दिलीप कुमार ने आसिफ़ से शिकायत की, मुझे अच्छे डायलॉग से महरूम रखा जा रहा है. गाने भी नहीं दिए. आख़िर क्यों? आसिफ़ ने दिलीप को घूर कर देखा, जानते हो मेरी फ़िल्म का नाम मुगल-ए-आज़म है, 'सलीम-ए-आज़म नहीं'.  

दिलीप कुमार ख़ामोश हो गए. वाकई फिल्म का सेंट्रल किरदार अकबर था, सलीम नहीं. दिलीप कुमार ने दोबारा कभी शिक़ायत नहीं की, डायलॉग की बजाए एक्सप्रेशन से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहे. वैसे जब मौका मिला तो उन्होंने कोई कसर न रख छोड़ी. जैसे - सलीम का दिल हिदुस्तान का तख़्त नहीं...कुछ ऐसा ही कह कर उन्होंने वाह वाह बटोरी. फिल्म की नामावली में भी पृथ्वीराज कपूर नाम पहले था और दिलीप कुमार का बाद में. यों पृथ्वीराज सीनियर भी थे, और दिलीप कुमार के ख़ानदान के बुज़ुर्गों से उनका पेशावर के ज़माने से नाता था.  

डायलॉग के नाम पर याद आया. फिल्म में दिलीप कुमार-मधुबाला का एक लम्बा लव सीन था. लम्बे-चौड़े संवाद लिखे गए. दिलीप कुमार का दिल खुश हो गया, अब आएगा मज़ा. मगर के.आसिफ़ ने कहा, नो डायलॉग.  यहां बैकग्राउंड में तानसेन का गाना चलेगा, जिससे मोहब्बत का इज़हार होगा - प्रेम जोगन के बन सुंदरी पिया ओर चली...इस गाने को आवाज़ दी थी, बड़े गुलाम अली खां ने और नौशाद साहब ने इसे राग सोहनी में कम्पोज़ किया था. इस बिना डायलॉग के लव सीन में दिलीप कुमार के हाथ में एक मोर-पंखी पकड़ा दी गयी. मधुबाला को इससे सहलाना है. इसे फ़िल्मी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लव सीन में शुमार किया जाता है. बताया जाता है कि रीयल लाईफ़ में एक-दूसरे को बेपनाह मोहब्बत करने वाले दिलीप-मधुबाला में उन दिनों मनमुटाव इतना ज़्यादा था कि बात-चीत भी बंद थी. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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