मीडिया Now - मैं तो लोगो के पेट भरता हूँ फिर मेरा गुनाह क्या हैं

मैं तो लोगो के पेट भरता हूँ फिर मेरा गुनाह क्या हैं

medianow 19-06-2021 17:22:47


 में समय हूँ... बक्सवाहा का जंगल हूँ 
मेरा दर्द कि कई आशियाने उजड़ेंगे और कई जीवन का अंत क्योंकि मेरी कोख का दुर्भाग्य हैं हीरा 

धीरज चतुर्वेदी / बक्सवाहा के जंगल की सभ्यता को वह सभ्य लोग उजाड़ना चाहते हैं, जो धरती मेँ हीरे का मोल समझते हैं। यह जंगल भी रो रहा हैं कि आखिर मेरा गुनाह क्या हैं। मेरा कई हजार हेक्टेयर में फैला आशियाना हैं, जहाँ अनेको प्रकार के जीव जंतु का रहवास हैं। मेँ किसी से कुछ लेता नहीं हूँ बल्कि मेरी छाँव से हजारों लोगो का पेट भरता हैं। मेरी कोख से जैव विविधता जन्म लेती है। लाखो की संख्या में फालदार वृक्ष, अमूल्य वनस्पति से जीवन को संवारता हूँ,। मेरी कोख का हीरा ही आज मेरी तबाही की गाथा लिख देगा। काश में इंसान होता तो मृत होने से पहले अपनों के सितम पर एक किताब लिख देता लेकिन वह लोग आज भी जिन्दा हैं जो मेरी जंगल की आत्मा व उसके बसेरे को बचाने के लिये जिन्दा हैं। वह बेहद कमजोर लोग हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिये मुझे बेच दिया। बस एक दिन मुझे अकाल मौत मिलेगी उन जिन्दा इंसानों से जो पहले से संवेदनाओं से मृत पर्याय हैं।

बुंदेलखंड के पन्ना की पहचान पहले हीरे से हुआ करती थी। अब बक्सवाहा में हीरे का बड़ा खजाना मिल गया हैं। कुछ सालो पहले यहाँ ऑस्ट्रेलिया की काली सूची में दर्ज रियो टिंटो कम्पनी ने सर्वे का काम शुरू किया था। कई पेड़ काटे गये और धरती में कई मीटर नीचे तक ड्रिलिंग की गई। इस कम्पनी का प्रोसेस प्लांट विवादों में रहा कि आखिर जिस कम्पनी को सर्वे की अनुमति मिली हों उसने प्रोसेसिंग प्लांट कैसे और किनके इशारे पर स्थापित कर लिया। रियो टिंटो का विरोध करने के लिये क्षेत्र के हजारों लोग सड़को पर उतरे। तब कि सरकार ने भी रियोटिंटो के हीरा खनन को बक्सवाहा के लिये हीरे जैसे सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए थे। हीरा भी निकाला गया लेकिन क्षेत्र की तस्वीर और तकदीर नहीं बदली। पर्यावरण और अन्य आवश्यक अनुमति नहीं मिलने से रियोटिंटो ने अपने हाथ खींच लिये। एक बार फिर बक्सवाहा के हीरे की चमक में सरकार और पूंजीपतियों की आँखे चौंधिआई।

नीलामी में बिड़ला ग्रुप को हीरे खनन का ठेका मिल गया। इसके लिए 382 हेक्टेयर क्षेत्र लीज पर दिया गया है। इसमें 62.64 हेक्टेयर में खनन किया जाना है। सरकार की दलील हैं कि वन क्षेत्र की जितनी भूमि को कम्पनी को दिया जा रहा उतनी राजस्व भूमि को वन क्षेत्र में परिवर्तित किया जायेगा। जिसमे हीरा ठेकेदार कम्पनी लाखो की संख्या में पौधा रोपण करेंगी। सुनने में अच्छा लगता हैं कि बक्सवाहा के जंगलों की कटाई के बदले उससे अधिक घना जंगल भविष्य में तैयार हों जायेगा। यही दलील ही सरकार का सबसे बड़ा झूठ हैं। अगर पौधरोपण से जंगल तैयार होते तो मप्र में जंगल का रकवा बढ़ने के बजाय घट नहीं जाता। भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट ने पौधरोपण की आढ़ में फलते फूलते भ्र्ष्टाचार के पेड़ को उजागर कर दिया हैं। मप्र के वन विभाग ने 2014-15 से लेकर 2019-20  के दौरान छह साल में  1638 करोड़ रूपये खर्च कर 20 करोड़ 92 लाख 99 हजार 843 पौधा रोपण करने का दावा किया हैं। असलियत वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट से होता हैं कि इन छह सालो में 100 वर्ग किमी से अधिक का वन क्षेत्र कम हों गया। सरकार की असलियत खोलने वाले यही आंकड़े बक्सवाहा के जंगलो की कटाई के बाद खौफ पैदा करते हैं। इस नजरिये से तो हीरे की चमक में सरकार ने अंधी पट्टी बांध बक्सवाहा के जंगलो के क़त्ले आम के लिये सुपारी दे दी हैं।

जंगल को आसान हैं, लेकिन जंगल को आबाद करने के लिये सदियों का समय लगता हैं। एक पौध को पेड़ बनने तक सफर आसान नहीं होता। समय के थपेड़ो की मार को पौधा सहता हुआ पेड़ बनता हैं। तब उसकी छाँव में जंगल की संस्कृति जीवंत हों पाती हैं। इंसानी देह, पशु पक्षी, जीव जंतु, अनमोल वनस्पति सहित अनेक जैव विविधताओं के समागम का आश्रयदाता एक जंगल ही होता हैं। तभी इन जंगलो को काटकर हीरे की तलाश का सरकारी जूनून लोगो को रास नहीं आ रहा हैं। बक्सवाहा का जंगल अपने आने वाले अकाल मौत के अंदेशे से व्यथित हैं। वह ख़ुद सोच रहा हैं कि आखिर मेरा गुनाह क्या हैं। जिस तरह कस्तूरी पाने के लिये हिरण को मौत के घाट उतार दिया जाता हैं, ठीक वैसे ही बक्सवाहा के जंगलो की कोख के हीरे के कारण जंगल को काटा नहीं जायेगा बल्कि उसकी इंसानी हाथो से सुनियोजित हत्या कर दी जायेगी। समय को भी काल कहा जाता हैं वहीँ काल का शाब्दिक अर्थ अंत समय, मृत्यु भी होता हैं। बक्सवाहा के जंगलो पर वर्तमान के पूंजीवादी काल के कारण उसे काल के गाल में समा दिया जायेगा। इसी के साथ समाप्त हों जायेगी सदियों में जन्म ली हुई सभ्यता, जिसे सभ्य समाज द्वारा ही वीरान कर दिया जायेगा।

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