मीडिया Now - राहुल को सत्ता के साथ साथ अपनों से भी लड़ना है

राहुल को सत्ता के साथ साथ अपनों से भी लड़ना है

medianow 19-06-2021 17:27:24


वीर विनोद छाबड़ा / आज राहुल गांधी का जन्मदिन है. जन्मदिन तो पिछले साल भी था. और उसके पिछले साल भी. लेकिन तब और आज में बड़ा फर्क आ गया है. पार्टी का नेतृत्व उनके पास नहीं है. उनके नेतृत्व में पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी की ज़बरदस्त दुर्गति हुई थी. वो अपनी अमेठी सीट भी गवां बैठे. पार्टी में उनके विरोधी बहुत खुश हुए. सारा ठींकरा राहुल के मत्थे मढ़ दिया गया बल्कि उन्होंने स्वयं ही ओढ़ लिया. बीजेपी और उनके समर्थक राहुल का मज़ाक उड़ाते हैं. करोड़ों रुपया बहा दिया गया 'ऑपरेशन पप्पू में. उन्हें पप्पू-पप्पू कह कर चिढ़ाया जाता है. प्रचार किया गया कि स्कूल में नाम बदलने को लोग पहुंच गए - सुरेश, परेश, संबित, नरेंद्र लिख लो, राहुल काट दो. लेकिन वास्तव में ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं. ऐसे में माहौल में राहुल का जन्मदिन याद रखना और फिर बधाई देना बड़ा जोखिम का काम है. लेकिन हम यह जोखिम उठा रहे हैं. ऐसा इसलिए नहीं कि हम उनके बहुत बड़े भक्त हैं. मित्रों, हम नजूमी तो नहीं लेकिन इतना जानते हैं कि अंततः विपक्ष को उन्हीं के इर्द-गिर्द जमा होना होगा. सरकार की ग़लत नीतियों का विरोध सबसे ज़्यादा राहुल ही करते हैं. हालांकि पिछले महीने बंगाल की शेरनी ममता ने राहुल पर बढ़त बना ली है. लेकिन ये टेम्पोरेरी है. जब तक वो राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का नेतृत्व नहीं संभालती वो रीजनल पार्टी की ही मुखिया रहेंगी. पिछले महीने विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति हुई है. लेकिन इसके बावजूद देश के सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के वो मात्र सदस्य हैं और पार्टी प्रेसीडेंट से ज्यादा एक्टिव हैं. सत्ता के निशाने पर भी हैं. और शायद बाकी पार्टियों से भी ज़्यादा. उन्हें ही सुना जाता है, भले निगेटिव भाव से. रूलिंग पार्टी को ज़बरदस्त मिर्ची लगती है, पूरी ताकत झोंक देती है जवाब देने में, भले अंट-संट ही सही. राहुल इस समय दो मोर्चों पर लड़ रहे हैं. बीजेपी से तो लड़ ही रहे थे. अब अपनों से भी लड़ रहे हैं. राहुल को समझना होगा कि उन्हें अपनों से लड़ा कौन रहा है.   

हम राजनीति की बहुत अच्छी समझ और उसमें दख़ल रखने वालों में नहीं हैं, लेकिन रखने वाले जानते हैं कि राजनीति में हर दिन एक जैसा नहीं रहता. राजनीति बड़ी बेमुरव्वत है. आज फर्श से अर्श पर और अगले ही दिन अर्श से फर्श पर. और बीजेपी को यही डर लगता है कि सत्ता की कमान कहीं राहुल लेड कांग्रेस के हाथ में न आ जाए. खुद कतिपय कोंग्रेसजन भी इसी से भयभीत हैं. इनके पीछे कोई और है और वो कोई और कौन है ये सभी अच्छी तरह जानते हैं.  
हमारा तो दावा है कि राहुल गांधी को जैसा प्रचारित किया जाता है वो वैसे नहीं हैं. राजनीति की ठोकरें इंसान को गर्त में भी ले जाती हैं और सयाना भी बनाती हैं. इंसान खुद भी सीखता है. राहुल को ठोकर ने सिखाया है तो खुद भी सीखा है. दूसरों से भी सीखता है. कोई बता सकता है राजनीति में राहुल ने कितनी गलतियां की हैं? ज़्यादातर सही मौके पर सही बोला है. उन्हें दबाने का सबसे बड़ा रोल मीडिया का है. इस मीडिया के किसी धुरंधर को राहुल के सामने बैठा दें. जवाब नहीं दे पायेगा मीडिया. मीडिया ही क्यों, सत्ता पार्टी का भी कोई धुरंधर राहुल के सामने टिक नहीं सका है. राहुल तो कई बार चैलेंज भी कर चुके हैं.  

फीनिक्स राख़ के ढेर से ही पैदा होता है. इस सत्य को दबी ज़ुबान में मीडिया भी स्वीकार करता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राहुल सर्वमान्य हैं. अभी भी उन्हें पार्टी में अपनी मान्यता स्वीकार करानी है. वो बहुत अच्छी अंग्रेजी जानते हैं. बोलते भी अच्छा हैं. लगता है कि कोई मंजा हुआ नेता बोल रहा है. लेकिन हिंदी में गड़बड़ा जाते हैं. आम जन से संवाद स्थापित करने के लिए अच्छी और आक्रामक हिंदी जाननी ज़रूरी है. इसके लिए उन्हें एक अच्छा ट्यूटर पकड़ना होगा.  पार्टी में मीडिया को ब्रीफ करने को तेज तर्रार प्रवक्ता नहीं हैं. टीवी चैनलों पर लुंज-पुंज से चेहरे देख कर कोफ़्त होती है. एक बात और. रूलिंग पार्टी को मालूम है कि कांग्रेस की ताक़त नेहरू-गांधी परिवार है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यही किया था, अटैक राहुल.  इसका उन्हें अच्छा सिला भी मिला.  निश्चित रूप से आगे भी ऐसा ही होगा.  राहुल पर अटैक होंगे, बहुत ज्यादा होंगे, विशेषकर तब जब वो पुनः पार्टी अध्यक्ष बनेंगे.  अभी मंज़िल दूर है, बहुत दूर. रास्ते में कांटें बहुत हैं. मुश्किल है डगर पनघट की. खाई में गिरने का पूरा खतरा है. लेकिन संभल कर चलने वाले खाई से निकलने का आर्ट भी जानते हैं. परिपक्व पॉलिटिशियन वही होता है तो जो हार कर भी न हारे. ओ राही ओ राही, रुक जाना नहीं तू दिल हार के. बिजली का बल्ब इज़ाद करने वाले थॉमस एडीसन की याद आती है. अनेक प्रयोग फेल हो गए. लेकिन हार नहीं मानी - शुक्र है यह तो पता चला कि इन विधियों से बल्ब नहीं बन सकता. यह बहुत बड़ी उपलब्धि है.  
बहरहाल, राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनायें. 
- लेखक एक नामी स्तंभकार हैं

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