मीडिया Now - वर्ल्ड फादर्स डे आज जून 20, पापा से कहें, मैं हूँ न......

वर्ल्ड फादर्स डे आज जून 20, पापा से कहें, मैं हूँ न......

medianow 20-06-2021 10:09:27


नवीन जैन ,वरिष्ठ पत्रकार / रामचरित मानस में आए एक प्रसंग के अनुसार  विश्व में पिता बेटे ,पत्नी ,भाई ,और अन्य सभी रिश्तेदारों से अपेक्षा रखता आया है ,मग़र बेटी के प्रति उसका आचरण ऐसा नहीं होता । वह बेटी को अंतिम समय तक कुछ न कुछ देते रहने की ही  कामना करता है । इसका मतलब यह नहीं है कि,बेटे को लेकर पिता कोई भेद भाव  पालता हो ।बस ,बात इतनी सी है , कि बेटी के प्रति पिता के ह्रदय में हरदम  अधिक कोमल भावनाओं का वास हुआ करता है ।इसीलिए , इसे इपीडीएक्स  कॉम्प्लेक्स  कहा गया है  यानी बेटा माँ ,और बेटी पिता को ज़्यादा चाहती है ।पापा  नामक शख्स कहीं से भी ,कभी भी  थककर या परेशान होकर लौटे , पत्नी से  पहला सवाल यही होता है ,बच्चे कहाँ हैं ,खाकर सो  गए न ,होम वर्क कर लिया  था। पापा पापा के स्वभाव में फ़र्क होता है। कोई पापा जहाँ तक हो सके बच्चों के साथ बैठकर डिनर करते हैं ,गप्पे चलते हैं ,पढ़ाई ,होम वर्क ,दोस्तों के बारें में चर्चा होती होती ,है डिनर करने के एटिकेट्स सुधारते हैं ,बच्चों के सम सामयिक मुद्दों पर विचार भी जानते हैं । उस बाप को बाप नहीं माना जाता ,जो  यह नहीं सोचता हो कि एक दिन उसका राज दुलारा या दुलारी ज़िंदगी में उससे आगे बढ़कर दिखाएंगे। एक बार प्रथम प्रधानमंत्री  स्व . जवाहरलाल नेहरू के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,और दिग्गज वकील पिता स्व . मोतीलाल नेहरू के साथ भारत रत्न पंडित मदनमोहन मालवीय  प्रयागराज की सड़कों पर इवनिंग वॉक पर निकले थे । पीछे से फर्राटे से एक कार में पण्डित जवाहरलाल नेहरू उनके आगे निकल गए।

मालवीयजी  ने मोतीलालजी की चुटकी ली । बोले , वो देखो ,तुम्हारी औलाद तुमसे आगे निकल गई । मोतीलालजी  पलटे ,और बोले ,वह बाप ही क्या बाप ,जिसकी औलाद उससे आगे निकल कर न दिखाए ।मेरी इस हार में ही ,तो मेरी जीत है ।हम सब ने कभी न कभी महसूस किया ही होगा ,कि रात में पापा लेट हो जाएं ,तो हमारे बेड रूप में चुपचाप आकर हमें ब्लेंकेट ओढ़ाते हैं , हाथ में से टेडी बीयर खिलौना अलग करते हैं ,और लाइट जली रह गई ,तो बुझा भी देते हैं। सुबह में बच्चे जल्दी उठकर स्कूल कॉलेज के लिए निकलने वाले होते हैं ,तब भी अक्सर पापा ड्रॉप करने जाते हैं । यह पूछना नहीं भूलते ,कि नींद  अच्छी हुई न तुम्हारी  । माम ने लंच बॉक्स में क्या रखा है ।यूनिफॉर्म या ड्रेस अप व्यवस्थित न हो ,तो तत्काल ठीक करने को कहते हैं।बुरे दिन आने पर खुद फटे ,कपड़े पहन लेंगे ,मग़र बच्चों को उनके दोस्तों के सामने नीचा नहीं देखने देंगे । ऐसे दौर में डबल ड्यूटी या पार्ट टाइम तक करते हैं ।पिता वह आदमी होता  है ,जो आपको गिरने ,तो देता है ,मग़र ऐसा आपको नया अनुभव दिलाने के लिए  करता है । वही आपके कपड़े साफ़ करके फिर उठ खड़े होने को ठेलता है ।माँ की तरह प्यार  दिखाता नहीं ,लेकिन चुप रहकर जताने की अद्भुत कला जानता है । बच्चों के  कल के भविष्य की  रोशन हवेली के तले बाप के वर्तमान आज की नींव रखी होती है । अक्सर नींव का पत्थर भुला दिया जाता  रहा है ,मग़र मौका आने पर इस भूल का अहसास हो ही जाता है । इसका ताज़ा प्रमाण है ,कोविड काल । कहाँ, तो अतिमहत्वाकांक्षी युवा न जाने किन किन देशों में बसे हुए थे , या सेटल होने को तैयार बैठे थे ,और कहाँ उन्हें याद आ गया ,कि फिर अपना घर ,तो अपना घर होता है ।बाप यदि बीमार है ,तो बेटा डॉक्टर भी है ,तीमारदार भी है, और गप्पे बाज़ दोस्त भी है। कोरोना का इसे तोहफा ही माना जाएगा , कि  इसके कारण बच्चों को अखंड तक कही जा सकने वाली सीख मिली है ,कि वे चाहे जितने पढ़ लिख जाएँ ,लेकिन अनुभवों और भावनाओं का ,जो अकूत खजाना पिता के पास  है ,वही सबसे ज़्यादा ज़रूरी है ।वैसे आज जून 20 फादर्स डे को पिता को तोहफा या गिफ़्ट देने की परम्परा जून 20 ,1910 से चली आ रही है ।बदलते दौर में  बच्चे चाहें , तो  इस प्यार भरे नज़राने को बदल कर अपनी महत्वाकांक्षाओं को कम करके पिता के साथ माँ को भी विश्ववाश दिला सकते हैं , कि वे उनके साथ हैं न ।

फादर्स डे सामान्य दिवस नहीं, बल्कि विश्व के अतिमहत्वपूर्ण दिवसों में से एक माना जाता है । इसका प्रारंभ कब हुआ इस सम्बंध ,तो खैर  अलग अलग तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं ,लेकिन इस तथ्य पर  कभी की आम सहमति बन चुकी है , कि इसे प्रत्येक वर्ष के जून महीने के तीसरे रविवार को ही आयोजित किया जायगा  । इस वर्ष के जून महीने का तीसरा रविवार 20 तारीख़ को ही आ रहा है ।इसके पहले अमेरिका में चूँकि मदर्स डे की शुरुआत हो चुकी थी ,इसलिए तय पाया गया ,  कि  क्यों न फादर्स डे भी मनाया जाए । कारण था अमेरिका के पश्चिम वर्जीनिया में एकएक दुर्घटना में 210 पिताओं की मृत्यु हो जाना । इस दुर्घटना ने अमेरिकी समाज को हिलाकर रख दिया था । माना गया , कि जब माँ के त्याग ,एवं समर्पण के लिए मदर्स डे मनाया जाने लगा है ,तब पिता के श्रम ,दायित्व ,और बलिदान को कम करके क्यों आकां जाए ?बस ,इसी सोच न फादर्स  डे मनाने की नींव रख दी ।

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :