मीडिया Now - फिर पूर्वांचल राज्य की सुगबुगाहट

फिर पूर्वांचल राज्य की सुगबुगाहट

medianow 22-06-2021 10:43:26


आबादी 8 करोड़, सात मंडलः बस्ती,गोरखपुर,वाराणसी,आजमगढ,अयोध्या,देवीपाटन तथा मीरजापुर

यशोदा श्रीवास्तव / भारी जनसंख्या के भार से दबे यूपी के बंटवारे की मांग नई नहीं है। यूपी से अलग हुए उत्तराखंड के पहले से पूर्वांचल राज्य की मांग चल रही है। दशकों पूर्व देखें तो सिलसिलेवार सत्ता और विपक्ष के तमाम बड़े नेता इस मांग को उठाते रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि प्रदेश का टुकड़ा कर अलग राज्य का गठन दाल भात का कौर नहीं कि इधर मांग हुई,उधर नया राज्य पैदा हो गया।ऐसा होता तो 2011 में यूपी के तत्कालीन सीएम मायावती के यूपी के बंटवारे संबंधी प्रस्ताव पर फैसला हो चुका होता। लेकिन नहीं, क्योंकि इसके लिए राज्य पुनर्गठन आयोग से लेकर तमाम कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना होता है।पिछले दिनों दिल्ली में योगी और मोदी के मिलन को यूपी के बंटवारे की दृष्टि से भी देखा गया।मीडिया में यह भी खबर आई कि यूपी के बंटवारे पर केंद्र गंभीर लेकिन योगी सहमत नहीं। यह सच भी हो सकता है लेकिन यदि पूर्वांचल राज्य गठित होता है तो योगी की असहमति क्यों? यह समझ से परे है।ऐसा हो जाने पर राजनीतिक दृष्टि से योगी का फायदा ही फायदा है। पूर्वांचल के जिन 27 जिलों को अलगकर पूर्वांचल राज्य की परिकल्पना की गई है, वह सबके सब योगी के हिंदू युवा वाहिनी के प्रभाव वाले जिले हैं। अब मौजूदा सरकार यूपी के दो या तीन हिस्सों में बांटकर अलग अलग राज्य बनाने पर क्या सोचती है,यह उसका अपना मामला है लेकिन जरूरत के हिसाब से देखें तो फिलहाल पूर्वांचल राज्य की मांग वक्त की जरूरत है। 23 करोड़ आबादी का भार सह रहे इस प्रदेश का तीसरा बंटवारा जरूरी है।

आजादी के बाद से अबतक की सभी सरकारों में पूर्वांचल का दबदबा रहने के बावजूद इस हिस्से की खूब उपेक्षा हुई है।यहां उद्योग,पर्यटन,कृषि आदि की अनंत संभावनाएं है लेकिन इसका लाभ पूर्वांचल को नहीं मिल पा रहा।बिना अलग राज्य के मिल पाना संभव भी नहीं है। अनायास ही सही, एक बार फिर यूपी के तीन भाग में बंटवारे की सुगबुगाहट से पूर्वांचल राज्य की संभावना को बल मिला है। अभी भी पूर्वांचल की आबादी कई प्रदेशों की आबादी से भी अधिक है लेकिन विकास के मामले में शून्य है। यहां की चीनी मिलें एक एक कर बंद होती गई और गन्ना किसान बदहाल होता गया। पर्यटक की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण स्थल भी राजनीति का शिकार होकर रह गए। भगवान बुद्ध की महाप्रयाण स्थली कुशीनगर, क्रीणा स्थली कपिलवस्तु , देवदह जैसे केवल बुद्ध से जुड़े स्थलों को ही विकसित कर इसे पर्यटकीय स्थल का रूप दिया जाय तो इस रास्ते विदेशी मुद्रा आय का बड़ा जरिया बन सकता है।पूर्वांचल से जुड़े यूपी के पूर्व सीएम स्व. वीरबहादुर सिंह के दिमाग में अलग पूर्वांचल राज्य का सपना था।उन्होंने इसी दृष्टि से गोरखपुर सहित पूर्वांचल के तमाम शहरों के विकास व सौंदर्यीकरण की शरुआत की थी लेकिन बहुत ही कम समय तक मुख्यमंत्री और फिर उनके आक्समिक निधन से उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका।योगी सरकार को चाहिए कि वह पूर्वांचल में बिखरे हुए पर्यटकीय महत्व के तमाम स्थलों को तराश कर यूपी से अलग एक खूबसूरत  पूर्वांचल राज्य का सृजन कर पूर्व सीएम स्व.वीरबहादुर सिंह के सपनों को साकार करे।

 बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने उप्र के विभाजन की बात तब कही थी जब इस प्रदेश की आबादी मात्र 6 करोड ही थी। आज आबदी 23 करोड के पार है तो कम से कम इसका तीन प्रदेशों में विभाजन न केवल वक्त की मांग है,अपरिहार्य भी है।उप्र के बंटवारे की आवाज पूर्व में कई बार उठी है। स्व कल्पनाथ राय ने तो इसे लेकर कई बार बड़ा आंदेालन तक किया था। उन्होंने  पूर्वांचल के कई जिलो में पदयात्राएं की थी। भासपा के ओमप्रकाश राजभर ने इसे आगे बढाते हुए कहा था कि उनके राजनीति का मकशद ही पूर्वांचल राज्य है। निसंदेह इसके लिए वे पूर्वांचल के जिलों में बिगुल बजाते रहे हैं। पूर्वांचल कार्ड को बसपा प्रमुख मायावती ने भी खेला था। 2012 के विधानसभा चुनाव के एन वक्त मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पूर्वांचल राज्य के लिए 11 सिंतबर 2011 को विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित कर दिल्ली तक पहुंचा दिया था। हालांकि इसके पीछे उनकी मंशा इसी बहाने पूर्वांचल के वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करना भर था।
 1975 में सिदधार्थनगर जिले के निवासी तथा भगवान बुद्ध के क्रीणा स्थली कपिलवस्तु की खोज के नायक पं राम शांकर मिश्र ने बुद्ध से जुडे पूर्वांचल के 24 जिलों को मिलाकर शाक्य प्रदेश की मांग बुलंद की थी। उसके बाद ही पूर्वांचल राज्य की मांग अलग अलग संगठनों के माध्यम से उठनी शुरू हुई थी लेकिन इसे वैसी धार नहीं मिली जैसी उत्तराखंड अथवा तेलांगना के लिए मिली। हां यह जरूर कहा जा सकता है कि 1991 में केंद्र सरकार के अलग से पूर्वांचल विकास निधि की शुरूआत करने के पीछे पुर्वांचल राज्य का बढता दबाव ही था।  प्रदेश की आबादी जब 18 करोड थी तब लंबे संर्घष के बाद सन 2000 में उत्तराखंड के रूप में 27वें राज्य का गठन हुआ। अब सूबे की आबादी करीब 23 करोड़ के आसपास है। पूर्वांचल राज्य को लेकर उत्सुक कई नामचीन लोगों का मानना है कि सत्ता के गलियारों में पूर्वांचल राज्य के रूप में एक और प्रदेश की मांग की सुगबुगाहट  अनायास नहीं है। इसे लेकर कुछ न कुछ खिचड़ी पक जरूर रही है।

विकास की दृष्टि से देखे तो देश को नौ प्रधानमंत्री देने वाले इस राज्य का विकास राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है। यह हाल आजादी के इतने वर्षों बाद तक है। आजादी के समय राष्ट्रीय आय में उप्र का योगदान कुल आय का पांचवा भाग था जो घटते घटते उसका आधा हो गया। उप्र के प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय 9639 रू प्रति माह है जो राष्ट्रीय आय से भी ज्यादे है। अनेक आर्थिक मानदंडो पर राष्ट्रीय औसत से यह राज्य बहुत पीेछे है। प्रदेश में 29 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। बुनियादी सुविधाएं भी उतनी नहीं है जितनी अन्य राज्यों में है। केवल बिजली की ही बात करें तो अन्य प्रदेश जहां शत प्रतिशत विद्वुतीकरण की ओर अग्रसर है वहीं इस प्रदेश में अभी भी 20 प्रतिशत गांव बिजली को तरस रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी उप्र राष्ट्रीय औसत से 4.32 प्रतिशत पीछे हैं। अगर पूर्वांचल की आबादी की बात करें तो असम, गुजरात, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक केरल सहित कई प्रदेश ऐसे हैं जिनकी आबादी पूर्वांचल के 27 जिलों की कुल आबादी से कम है। इस अविकसित क्षेत्र की आबादी करीब सवा नौ करोड़ है और यहां प्रति वर्ग किमी 7.55 व्यक्ति का भार है।

औद्योगिकरण के अभाव में इस क्षेत्र का 75 प्रतिशत आबादी खेतिहर मजदूर के रूप में जीवनयापन करने को मजबूर है। सिचाई सुविधा का बुरा हाल होने के नाते लोगों को अपनी खेती के लिए बादलों की ओर निहारने को विवश रहना पड़ता है। यहां की कुल क्षेत्रफल की 55.65 प्रतिशत भूमि ही सिंचित क्षेत्रफल के दायरे में है। पूर्वांचल की भूमि का एक बड़ा भाग ऊसर होने के कारण  भी कृषि उत्पादन पर असर पड़ता है। पूर्वांचल की 41 चीनी मिलों में से करीब करीब सभी बंद हैं या बंदी के कगार पर है इसलिए बेरोजगारी भी बढ़ी है। जाहिर इस सब की वजह इतना भारी जनसंख्या का भार और संसाधनों का प्रयाप्त न होना है। कोरोना काल में जनसंख्या के सापेक्ष संसाधनों की अप्रयाप्तता साफ देखी गई। पूर्वी यूपी के वुद्धिजीवी भी मानने लगे हैं कि इतने बड़े सूबे में बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट,गरीबी,उच्च शिक्षा के अभाव आदि से निपटने के लिए यूपी का बंटवारा ही एक उपाय है। योगी सरकार को स्वयं इसे लेकर गंभीर पहल करनी चाहिए। तेलंगाना हो या उत्तराखंड, उसे लेकर तो भारी मतभेद भी था,विरोध और समर्थन में लंबा संघर्ष भी हुआ जबकि पूर्वांचल राज्य को लेकर ऐसा कुछ होने की तनिक संभावना ही नहीं है।

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