मीडिया Now - एक रूपये का सिक्का

एक रूपये का सिक्का

medianow 22-06-2021 21:01:51


वीर विनोद छाबड़ा / बात उन दिनों की है जब फिल्म इंडस्ट्री में मोहम्मद रफ़ी एक स्ट्रगलर थे और नौशाद अली आला दर्जे के संगीतकार. रफ़ी के दिन मुफ़लिसी में कट रहे थे. रोज़ कुआं खोदो और पानी पीयो. दिहाड़ी लो और रोटी खाओ. वो अक्सर नौशाद साहब के इर्द-गिर्द मंडराया करते थे, शायद कुछ काम मिल जाए. बताया जाता है कि एक दिन उन्हें बताया गया कि कल आना. एक कोरस में खड़े होना है. अगले दिन रफ़ी की जेब में सिर्फ़ एक रुपया था. रिकॉडिंग स्टूडियो दूर था और रफ़ी को यह मौका छोड़ना नहीं था. स्ट्रगल के दिनों में मौका चूकने का मतलब होता था दो कदम पीछे और रात को भूखा सोना. बहरहाल, रफ़ी रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे. चूंकि नौशाद बड़े संगीतकार थे, अतः उम्मीद भी थी कि रिकॉर्डिंग से इतना मेहनताना मिल ही जाएगा जिससे दो दिन की रोटी का जुगाड़ हो जाए. रफ़ी का एक रुपया स्टूडियो तक पहुँचने के किराये में ही खर्च हो गया. मगर किस्मत की मार देखिये. कतिपय कारणों से रिकॉर्डिंग कैंसिल हो गयी. सब घरों को लौट गए. मगर रफ़ी बैठे रहे. नौशाद साहब घर के लिए निकले कि देखा एक बंदा स्टूडियो के बाहर सीढ़ियों पर उदास बैठा है. उसके चेहरे पर निराशा की गहरी लकीरें खिंची हैं. नौशाद ने वज़ह पूछी. रफ़ी ने थोड़ा झिझकते हुए बताया - जनाब, मेरे पास सिर्फ एक रुपया था जो यहां आने में खर्च हो गया. सोचा था रिकॉर्डिंग के बाद पैसा मिल जाएगा. मगर रिकॉर्डिंग ही कैंसिल हो गयी. अब यही फ़िक्र है कि घर वापस कैसे जाऊं? सोच रहा हूं कि कल फिर आना ही है तो यहीं कहीं सो कर रात बिता लूं. कल तो पैसे मिल ही जाएंगे. नौशाद साहब भावुक हो गए. उन्होंने जेब में हाथ डाला और एक रूपये का सिक्का निकाल कर रफ़ी की हथेली पर रख दिया. अभी घर जाओ. 

इस घटना को कई साल गुज़र गए. रफ़ी अब रफ़ी साहब हो चुके थे. बड़ा नाम था उनका. उन्हें बात करने तक की फुर्सत नहीं थी. एक दिन सुबह सुबह का वक़्त. नौशाद साहब ने देखा कि रफ़ी चले आ रहे हैं. उनके हाथ में एक बड़ा पैकेट था, बढ़िया रंगीन कागज़ में लिपटा हुआ. नौशाद साहब ने आने का सबब पूछा और पैकेट की और इशारा किया - और ये क्या है बरख़ुरदार? रफ़ी साहब ने उनसे कहा कि आप खुद खोल कर देखें.  तनिक झिझक के साथ नौशाद साहब ने पैकेट पर से कागज़ हटाया. देखा वो एक फोटोफ्रेम है और उस फ्रेम में एक रूपये का सिक्का जड़ा हुआ था. रफ़ी साहब ने नौशाद साहब को वो फ्रेम भेंट किया - ये आपके लिए है.  नौशाद साहब हैरान हुए - बरखुरदार इसमें क्या खास बात है? और यह मुझे क्यों दे रहे हो? रफ़ी साहब ने उन्हें बरसों पहले की वो रिकॉर्डिंग कैंसिल होने की बात दिलाते हुए बताया - उस दिन मेरे पास घर लौटने तक के लिए पैसे नहीं थे. आपने मुझे एक रूपये का सिक्का दिया था. मुझे आपकी वो इंसानियत और इनायत बहुत अपील कर गयी. वो रुपया मैंने खर्च नहीं किया था. किसी तरह पैदल ही घर चला आया था. इस फ्रेम में वही रुपया है. आज आपको लौटने आया हूं. नौशाद साहब निशब्द रह गए. आंखों से अविरल अश्रु धारा बह निकली. और उन्होंने रफ़ी को सीने से लगा लिया. इस किस्से में कितनी हक़ीक़त है मालूम नहीं. लेकिन रफ़ी साहब का जब ज़िक्र होता है इसे सुनाया जाता है. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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