मीडिया Now - फिर,तेरी कहानी याद आई

फिर,तेरी कहानी याद आई

medianow 27-06-2021 14:08:15


नवीन जैन ,वरिष्ठ पत्रकार / जो लोग मानते हैं , कि पत्रकार गिद्ध होते हैं,  उनमें संवेदनात्मल्क, भावुकता,और आदमियत नाम की चीज़ नहीं होती है। उन्हें तो अपनी फड़फड़ाती खबर  की ही खबर लगती  है ,या वो टीआरपी बटोरने का बेआबरू बिजनेस करते है ,वे लोग ख़ासकर इस लेख से गुजरने का समय निकालें। आज ही के दिन यानी जून 27 ,1997 एक पत्रकार का निधन हुआ था । यह कोई नैसर्गिक देहवासान होता ,तो कोई बड़ी बात नहीं थी । हुआ यह था, आज ही के दिन तभी सेलिब्रिटी बन चुके पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह का आज तक कार्यक्रम के बुलेटिन को कवर करने के बाद नींद में ही ब्रेन हैमरेज हो गया था। नई दिल्ली के एम्स में वे कुछ दिनों के मेहमान रहे ,और जब उनकी साँसों की डोर टूटी ,तब उनके मुरीद करोड़ों लोगों ने आँखें बंद कर लीं या कानों पर पहरे बैठा दिए ।

मैं ,सुरेन्द्र प्रताप सिंह से एकाधिकार बार मिल चुका हूँ । प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में शुद्ध शाकाहारी दावत भी उड़ा चुका हूँ ,मग़र इतना हौसला आज तक नही जुटा पाया ,कि उन्हें सिर्फ़ एस . पी .कहूँ । कहाँ उनका उपलब्धियों भरा आसमान ,कहाँ मोटे ग्लास के चश्मे जैसी प्रयोगशाला से गुजरता मेरे जैसा हरदम कुछ नया सीखने को आतुर पत्रकार ।दरअसल ,कथित बुद्धजीवियों की यह पहचान है ,कि वे अपने पेशे के नामवर लोगों के नामों को  छोटा करके ,खुद को उनके क़द तक ले जाने की कोशिश करते हैं । जैसे ,ज्येष्ठ पत्रकार ,और साहित्यकार स्व . खुशवंत सिंह को ख़ुशी कहकर सम्बोधित कर दिया जाता था । बहरहाल ।
सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसे लोगों के लिए ही यह जुमला चलता आया है ,कि वे जिस भी फील्ड में जाते अपना जलवा दिखाकर ही मानते।सुरेन्द्र प्रताप सिंह की एम . हिंदी ,प्रथम श्रेणी में ,और एल . एल . बी . छात्र  नेतागिरी ,लेक्चररशिप ,धर्मयुग ,नव भारत टाइम्स ,द टेलीग्राफ ,दूरदर्शन ,आज तक  वगैरह की किले लड़ाऊ पत्रकारिता के कई अफसाने सुनाए जाते हैं ,लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा ,कि उन्होंने फिल्मकार मृणाल सेन के लिए  फिल्मों की स्क्रीप्ट भी लिखी ।जब सुरेंद्र प्रताप सिंह ने टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रशिक्षु पत्रकार के लिए अर्जी भेजी , तो पत्रकारिता में खाँ साहब बनने की कोई ख़ामोख्याली नहीं थी ।

अच्छी भली लेक्चरशिप चल रही थी ,पर आवेदन कर ही दिया । टाइम्स में तब लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. धर्मवीर भारती की एक तरफा तानाशाही चलती थी। मैंनेजमेंट उनकी इस रवैये की इसलिए अनदेखी करता था ,कि डॉ . भारती ने धर्मयुग की साप्ताहिक बिक्री तकरीबन साढ़े चार लाख तक ले जाकर अंसभव को संभव कर दिखाया था । डॉ . भारती को इंटरव्यू देना मतलब अपनी खाल उधेड़वाना। उनके अंडर काम करने का अर्थ होता था अपनी जगह से टस से मस न होना ।उक्त तथ्य से सुरेंद्र प्रताप सिंह अनभिज्ञ नहीं थे । डॉ . भारती न चाहते हुए भी उन्हें साथ रखने को इसलिए मजबूर हो गए थे ,समाचार ,और विचार का जो निरपेक्ष भाव सुरेन्द प्रताप सिंह के लेखन में था ,उसमें नई ताज़गी थी ।डॉ. भारती ने उन्हें अच्छे से मांजा ,उनके विचारों से असहमति रही ही होगी ,लेकिन उनकी लेखकीय ईमानदारी पर शंका की कोई गुंजाइश नहीं थी । माना जाता रहा ,कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह विचारों से मार्क्सवादी थे ,मग़र यह कहने वाले शायद ही मिल पाएँगे ,जो कहने का साहस रखते हों ,कि सुरेंद्र प्रताप सिंह मार्क्सवाद के अलावा किसी विचारधारा से  परे जाकर सोचते ही न हों। कहा तो यहाँ तक जाता है ,कि वे जल्दी ही मार्क्सवाद से भी ऊब चुके थे ।जब तक वे धर्मयुग में रहे ,तब तक इस साप्ताहिक को अपना हज़ार फ़ीसद देते रहे ।इसी बीच कोलकाता के आनंद बाज़ार पत्रिका समूह ने एक नई सोच ,और अदांज की हिंदी साप्ताहिक की पहल की । नाम रखा गया रविवार । शुरुआती कीमत एक रूपया । साथ में ही इसी आक्रमक ,सरोकारों ,और भांडा फोड़ू पत्रकारिता की संगिनी बनी एम . जे . अकबर के नेतृत्व में निकली संडे । कुछ समय तक एम . जे . अकबर ही दोनों मैग्जीन्स का काम देखते रहे । इसी बीच ख्यात व्यंग्यकार स्व . शरद  जोशी को रविवार का न्योता मिला । मामला इस कारण नहीं जमा कि शरद जोशी को  कोलकाता से भोपाल ,तथा इन्दौर विदेश जैसा लगता था । सो ,सोचा कौन जाए न किसकी बात । सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी शर्तों पर रविवार की संपादकी मंजूर कर ली ।शायद ,उन्हें ही मालूम नहीं था ,कि एक बेचारी ,थकी ,और हारी हुई हिंदी पत्रकारिता के वे कलश पुरूष बनने वाले हैं , और वो भी प्रिंट के साथ इलेक्ट्रॉनिक में भी ।आने वाली हिंदी पत्रकार ज़मात को मालूम न था समाज ,राजनीति ,और आर्थिकी की कायापलट अंत हीन युग का शंख नाद हो चुका है ।रविवार से जल्दी ही स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर ने उन्हें नवभारत टाइम्स नई दिल्ली में अपना सहयोगी बना लिया। इस जोड़ी ने वो कारनामे कर दिखाए जिनकी कल्पना भी नही की जा सकती। सुरेंद्र प्रताप सिंह के पास आखिर करीब सवा दो सौ कवर कथाएं करवाने का ताजा इतिहास था ।

रविवार के तहत हुई थी। ये कथाएं रविवार के कार्यकाल में हुई थी।नवभारत टाइम्स में रहकर ही उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अनिवार्यता की आहट को भी सुन लिया । वहाँ से दूरदर्शन में हाथ आजमाए । इंडिया टुडे के अरुण पुरी ने आज तक की आधारशिला उन्हीं से रखवाई। इस बीच दुनिया भर ने गणेश जी को दूध पिलाया ,लेकिन सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने इस भावुकता की वैज्ञानिक निरर्थकता  सिद्ध कर दी ।जिस ब्रेन हैमरेज की घटना से सुरेन्द्र प्रताप सिंह के पचास साल से भी कम उम्र में निधन हो गया ,वह नई दिल्ली के सिनेमाघर उपहार में लगी आग से सम्बंधित है । सभी नियमित बुलेटिन्स रोककर सुरेन्द्र प्रतापसिंह उक्त घटना को अपने रिपोर्टर से कवर करवा रहे थे । न जाने वहीं स्वाहा हो गए । कई अस्पतालों में ज़िंदगी की भीख माँग रहे थे । घर आकर सामान्य नींद की बजाय ब्रेन हेमरेज ने उन्हें फिर कभी न खुलने वाली नींद में सुला दिया । नमन ,नमन ,नमन !

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :