मीडिया Now - सोहराब मोदी, सिनेमा के हिस्ट्री मैन

सोहराब मोदी, सिनेमा के हिस्ट्री मैन

medianow 05-07-2021 20:25:53


वीर विनोद छाबड़ा / अगर आपने कभी सोहराब मोदी का नाम सुना हो तो ये डायलॉग भी जरूर सुने होंगे...तुम्हारे लिए ही पैदा हुए दुनिया के नज़ारे, चमके है तुम्हारी रोशनी से चांद ओ सितारे, तुम्हारा ग़म है ग़म, औरों का ग़म ख़्वाब-ओ-कहानी है, तुम्हारा खून है खून, हमारा खून पानी है...अमीरी और ग़रीबी तो जीवन की धूप छांव का नाम है...ना छेड़ अब मुझको रहने दे यहीं तक दास्तां मेरी, कहूंगा सच तो जल जाएगा दिल तेरा, ज़बां मेरी... डूब मरो इस इंसाफ पर आंसू बहाओ इस कानून पर जो कमज़ोरों के लिए तलवार की धार हैं और ज़बरदस्त के लिए बांके बहार है, जो तेरे लिए नग़्मा-ए-साज़ और हमारे लिए मौत की आवाज़ है...बुढ़ापा बर्फ से भी ठंडा है...आग ने पानी का नाम सुनते ही अपने शोले बुझा दिए...हम ऐसी गलतियां एक हज़ार एक बार कर के क़ैद हो जाएंगे और उसके बाद हमें फिर मौका मिले तो हम फिर ऐसी गलती करने से बाज़ नहीं आएंगे...फ़रमाइये आपके साथ कैसा सलूक किया जाए?...जैसा एक बादशाह को दूसरे बादशाह के साथ करना चाहिए...ये डायलॉग आजकल के हालात पर नहीं कहे गए हैं बल्कि चालीस से पचास के सालों की फ़िल्मों से हैं, उस दौर की सामाजिक व्यवस्था से सरोकार था इनका.   

अतिश्योक्ति न होगी अगर कहा जाए कि 4 नवंबर 1897 को पारसी परिवार में जन्मे सोहराब मोदी भारतीय सिनेमा के विशाल वृक्ष थे. उन्हें इतिहास पुरुष भी कहा गया, हिस्ट्री मैन. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर फ़िल्में बनाने का चस्का रहा. पुकार, पृथ्वी बल्लभ, सिकंदर, शीश महल, नरसिंह अवतार, यहूदी, राजहठ, झाँसी की रानी, नौशेरवान-ए-आदिल, मिर्ज़ा ग़ालिब आदि करीब 25 फ़िल्में प्रोड्यूस और डायरेक्ट की. वो हाज़िर जवाब एक्टर रहे. उनका अपना प्रोडक्शन हाउस भी था, मिनर्वा मूवीटोन. आलीशान सेट और राजसी वेशभूषा और फिर बुलंद आवाज़ में लंबे-लंबे डायलॉग्स. पब्लिक झूम उठती थी. चालीस और पचास के सालों में उनका सिनेमा की दुनिया में ख़ासा दबदबा रहा. 

'सिकंदर' (1941) के विशाल और भव्य सेटों की गुणवत्ता की तुलना एक अंग्रेज़ समीक्षक ने हॉलीवुड की मास्टरपीस 'द बर्थ ऑफ़ ए नेशन' से की थी. इस फिल्म में राजा पुरू सोहराब मोदी और विश्व विजेता सिकंदर पृथ्वीराज कपूर के बीच चली लंबी जुमलेबाज़ी और फिर जंग के दृश्यों को देख दर्शक भाव विभोर हो उठे थे. उन दिनों अंग्रेज़ शासकों की गुलामी से मुक्ति की मुहिम ज़ोरों पर थी. 'सिकंदर' ने तो आग ही लगा दी. पुरू की महानता के समक्ष नतमस्तक होकर जैसे सिकंदर महान वापस चला गया, वैसे ही अंग्रेज़ों तुम भी भारत छोड़ो.  जंग के मैदान की ओर कूच करते हुए सैनिक जोशीला गीत गा रहे हैं, ज़िंदगी है प्यार से, प्यार से बिताए जा...पंडित सुदर्शन के लिखे इस गीत की धुन मीर साहेब ने बनाई थी और खान मस्ताना और साथियों ने आवाज़ दी थी. इसका प्रभाव इतना ज़बरदस्त रहा कि आगे चल कर नेता जी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी का थीम सांग भी इसी तर्ज पर आधारित हुआ, कदम कदम बढ़ाये जा ख़ुशी के गीत गाये जा...किसी को शक़ हो यूट्यूब पर चेक कर ले. 

सोहराब मोदी की फ़िल्में बिना सामाजिक सरोकार के नहीं बनती थीं. 'पुकार' (1939) में मुग़ल शहंशाह जहांगीर (चंद्रमोहन) ने एक प्रेमी को इसलिए फांसी का हुक्म सुनाया, क्योंकि उसे हत्या के लिए उकसाया गया था. कानून, कानून होता है, खून के बदले खून. मगर उस समय बड़ी विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गयी, जब एक धोबी ने शहंशाह की पत्नी नूरजहां (नसीम बानो, सायरा बानो की माँ) पर इलज़ाम लगाया कि उनके तीर से उसके पिता की मौत हुई है. हालांकि वो तीर अजनाने में चला था, मगर इंसाफ की निगाह में राजा और प्रजा बराबर है. जहांगीर ने हुक्म दिया कि धोबी भी नूरजहां को तीर मार सकता है. चारों तरफ से रहम-रहम की पुकार होने लगी, महारानी को स्पेशल स्टेटस प्राप्त है, वो सिर्फ बादशाह की जागीर नहीं.  खासी मान-मनौवल के बाद जहांगीर माफ़ करने के लिए तैयार हो जाता है. धोबी आर्थिक मुआवज़े के बदले में मामला वापस लेता है. मगर इंसाफ अभी अधूरा है. नूरजहां को ये इंसाफ तभी मंज़ूर होता है जब मौत की सजा पाए तमाम कैदियों की सजा माफ़ की जाए. जिन्होंने जान-बूझ कर हत्याएं नहीं कीं. इसी के साथ उस प्रेमी की सजा भी माफ़ हो गयी जिसे हत्या के लिए उकसाया गया था. 

1946 आते आते सोहराब मोदी का अपनी खोज नसीम बानो से लम्बे समय से चल रहा प्रेम प्रसंग ख़त्म हो गया. तब उन्होंने अपने से बीस साल छोटी मेहताब से शादी कर ली, जो उनकी फिल्म 'परख' (1944) की नायिका थीं. उन्होंने मोदी से शिकायत की थी, आप अपनी फिल्म में छाए रहते हैं, दूसरों को उभरने का मौका ही नहीं देते.  तब मोदी ने कहा था, मगर इस फिल्म में मैं एक्ट नहीं कर रहा हूं, सिर्फ डायरेक्ट कर रहा हूं. ये वही मेहताब थीं जिनके कुछ समय पहले रिलीज़ केदार शर्मा की 'चित्रलेखा' (1941) में अर्ध-नग्न दृश्य नेशनल सुर्खियां बने थे, ख़ासा हंगामा भी हुआ था. पहले से शादी-शुदा मेहताब अपने पति अशरफ़ से खुश नहीं थी और अलग रह रही थीं. मोदी ने मेहताब के सामने जब शादी का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने एक शर्त रख दी, पहले पति  से पैदा बेटे इस्माईल को अपनाना पड़ेगा.  और मोदी ने इस शर्त को बखूबी निभाया.  बाद में उनके भी एक बेटा हुआ, महिति. मेहताब से शादी का मोदी के पारसी समुदाय में बहुत विरोध भी हुआ. मगर मोदी तो मेहताब पर दिलो-जान से फ़िदा थे. उन्होंने पहले से तय वीना को दरकिनार करते हुए मेहताब को 'झांसी की रानी' (1953) बनाया, भव्य और बड़े कैनवास की रंगीन फिल्म. ढेर पैसा भी लगाया.

 मगर दुर्भाग्य से ये डूब गयी. मोदी बर्बाद हो गए, पैसे और नाम दोनों से. मगर अगले साल 'मिर्ज़ा ग़ालिब' (1954) में उन्होंने अपनी खोयी हुई साख दोबारा हासिल कर ली. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी बहुत तारीफ़ की, ग़ालिब ज़रूर ऐसे ही रहे होंगे.  इसे उस साल के बेस्ट फिल्म का नेशनल अवार्ड भी मिला.  'जेलर' (1958) गज़ब की फिल्म थी, उनकी इसी नाम से बनी 1938 में बनी फिल्म का रीमेक.  इसमें मोदी जेलर हैं मगर उनकी पत्नी कामिनी कौशल उनके झुर्रीदार चेहरे से नफरत करती है. उसके किसी दूसरे मर्द से संबंध भी हैं. लव एंड हेट के इस थ्रिलर में अंततः जेलर की पत्नी आत्महत्या कर लेती है. उनकी बेटी भी मर जाती है. इस शून्य को भरने के लिए वो जिस अंधी लड़की के प्रति आकर्षित होते हैं वो भी किसी और को चाहती है. अंततः वो अपना सब कुछ एक मंदिर को दान कर देते हैं. उनकी कुछ अन्य यादगार फ़िल्में हैं, शीशमहल, दौलत, भरोसा , कुंदन, मीठा ज़हर आदि.  

सोहराब मोदी खुद बहुत अच्छे एक्टर थे, तीर की तरह चुभती, खनखनाती और बुलंद आवाज़ के मालिक.  मीलों दूर खड़ा आदमी भी सुन ले. थिएटर का प्रभाव था ये. अपनी प्रोड्यूस कई फिल्मों में काम किया ही, बाहरी की भी कीं. बिमल रॉय की 'यहूदी' (1958) में वो दिलीप कुमार के समानांतर रोल में थे. उनका ये डायलॉग बहुत मशहूर हुआ था, तुम्हारा खून है खून हमारा खून पानी है...ये ईसा पूर्व रोमन एम्पायर में यहूदियों के उत्पीड़न के कथानक पर आधारित थी जिसके विरुद्ध एज़रा यहूदी बने मोदी आवाज़ उठाते हैं. वो अंतिम बार हल्की-फुल्की 'एक नारी एक ब्रह्मचारी' (1971) में अपने ब्रह्मचारी बेटे (जीतेंद्र) की शादी कराने के लिए बहुत इच्छुक देखे गए. 

सिनेमा के प्रति सोहराब मोदी का जुनून मानो पैदाइशी था. जैसे ही उन्होंने हाई स्कूल पास किया तो अपने प्रिंसिपल से मिले, मुझे आगे क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा, तुम्हारी बुलंद आवाज़ कहती है, तुम एक्टर बनो. उन्हें मनमांगी मुराद मिल गयी, शुक्र है नेता बनने को नहीं कहा. वो ट्रैवेलिंग सिनेमा के एजेंट बन गए. फिर फ़िल्म सेट्स की  साज-सज्जा और डिजाइनिंग का काम किया.  कुछ अपना बनाने की महती इच्छा जाग्रत हुई तो अपनी कंपनी मिनर्वा मूवीटोन (1936) स्थापित की. बाकी तो इतिहास गवाह है. उनका कद कितना बड़ा था, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 1960 के दसवें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में वो ज्यूरी के स्पेशल सदस्य बनाये गए. 1980 में उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के अवार्ड से नवाज़ा गया. 2013 में सिनेमा के सौ बरस पूरे होने के सिलसिले में भारत सरकार ने उनके नाम का एक विशेष डाक टिकट जारी किया.  

दरियादिली के मामले में सोहराब मोदी जवाब नहीं था, जो भी ज़रूरतमंद द्वारे आया, खाली नहीं गया. मेहताब ने एक बार ऐतराज किया तो वो बोले, शहर में हज़ारों अमीरों को छोड़ वो मेरे पास आया है तो इसका मतलब है कि मुझमें कुछ खास बात है, मैं बहुत खुशकिस्मत हूं. अस्सी के सालों में मोदी की तबियत ख़राब थी. पावर ऑफ़ अटॉर्नी उन्होंने एक नज़दीकी रिश्तेदार को दी. मगर उसने इसका बहुत गलत इस्तेमाल किया. उनकी अच्छी खासी जमा-पूँजी और प्रॉपर्टी हड़प ली. जो बाकी बचा, उनके उन दोस्तों ने हड़प लिया जिनके कहने पर बीमार मोदी ने 1982 में 'गुरू दक्षिणा' बनाने का एलान किया, बाजे-गाजे के साथ मुहूर्त भी किया, ढेर पैसा एडवांस में कलाकारों को दिलवाया गया. जब धोखाधड़ी का उन्हें इल्म हुआ तो बहुत गहरा सदमा लगा, जिससे वो उबर नहीं पाए और कुछ ही महीनों बाद 28 जनवरी 1984 को वो परलोक सिधार गए. अफ़सोस की बात तो ये रही कि 2005 में मुंबई के चोर बाज़ार में पुलिस रेड हुई तो उनके घर से चोरी गया बहुत सारा सामान पाया गया, जिसमें दादा साहब फाल्के अवार्ड की शील्ड भी सम्मिलित थी. 
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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