मीडिया Now - जिसकी सत्ता होती है उसीका होता है जिपं आध्यक्ष

जिसकी सत्ता होती है उसीका होता है जिपं आध्यक्ष

medianow 05-07-2021 20:42:14


यशोदा श्रीवास्तव / यूपी में जिलापंचायतों के अध्यक्ष का चुनाव संपन्न हो गया। 75 में से 68 जिलों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते हैं।यूपी सरकार, उसके विधायक, सांसद और मंत्री इसे योगी और मोदी की नीतियों पर जनता का मरोसा मान रहे हैं।वही जनता जिसने जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में सीएम से लेकर पीएम तक के जिले में बीजेपी को अपने बल पर अध्यक्ष चुनने भर का सदस्य नहीं दिया। कहना न होगा कि जनता के चुनाव में योगी और मोदी की नीतियां फ्लाप रही।

अब जिलापंचायतों के सदस्य के बूते चुने जाने वाले अध्यक्षों की संख्या बटोरकर इसे बीजेपी सरकार की नीतियों की जीत बताना समझ से परे है। बिजेपी यह चुनाव कैसे जीती इसे सारा प्रदेश देखा है। देखा गया कि गोरखपुर में सपा को किस तरह नामांकन नहीं दाखिल करने दिया गया। सिद्धार्थ नगर में भाजपा प्रत्याशी के समर्थक, प्रस्तावक को किस तरह प्रताड़ित किया गया। अध्यक्ष पद की सपा उम्मीदवार को कैसे अपने पक्ष में किया गया। बीजेपी जिन जिलों में निर्विरोध जीत का डंका बजाई है, वहां की जीत कैसे हुई।

लेकिन हम इस पर सवाल नहीं उठा सकते।यूपी 14 वर्षों तक जिलापंचायतें सस्पेंड थी। 1992 में सपा सरकार आने पर मुलायम सिंह ने इसे पुनर्जीवित किया।उन्होंने इसकी शुरूआत अध्यक्ष पद पर अपने लोगों के मनोनयन से की थी। उसके बाद जिलापंचायत सदस्यों के क्षेत्र का परिसीमन हुआ। जिलापंचायतों के सदन का गठन हुआ। सपा हो या बसपा,इनकी सरकारों में इस पद पर काबिज होने के लिए खूब मनमानी हुई। अभी अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली 2012 की सरकार में 38 जिलों में निर्विरोध जिलापंचायत अध्यक्ष हुए थे।तो क्या सदस्यों ने आरती उतारकर सपा को यह पद तस्तरी में रखकर दिया था। कहने का मतलब विभिन्न दलों के जीते सदस्यों को मैनेज कर इस पद पर कब्जा कर लेना किसी भी सरकार की लोकप्रियता का पैमाना नहीं होता।जिसकी सत्ता होती है, येनकेन प्रकारेण अध्यक्ष उसीका होता है। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जिलापंचायतों के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा चुनाव परिणाम नहीं तय करेंगे।

 यूपी में मुख्यमंत्री का जिला गोरखपुर हो या प्रधानमंत्री का जिला बनारस, कहीं भी जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन इतराने जैसा नहीं रहा।बावजूद इसके इन जिलों के जिलापंचायत अध्यक्ष पद पर बीजेपी का कब्जा हो गया है। यही नहीं यूपी के तमाम मंत्री विधायक तक जिला पंचायत सदस्य का चुनाव अपने परिवार,समर्थक और शुभचिंतकों को नहीं जितवा सके। भाजपा के कई निर्वतमान जिला पंचायत अध्यक्ष तक सदस्य पद का चुनाव हार गए। पूर्वांचल में एक तेजतर्रार विधायक ब्लाक प्रमुख बनाने के लिए अपने भाई को बीडीसी नहीं जितवा सके। भाजपा के मजे मजाए एक नेता की टिप्प्णी का क्या कहने! इस चुनाव में धन बल की बात चली तो उसने साफ कहा कि भाजपा भले ही किसी जिले में अपने दम पर जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने की स्थित में न रही हो लेकिन जीते तो हम ही। कहा जिाला पंचायत छोडि़ए, हमने उन प्रदेशों में भी सरकार बनाकर दिखा दी है जहां हमारे एक भी एमएलए नहीं थे। और कम बहुमत के बावजूद कितने प्रदेशों में सरकार बनाई, उसे भी आप देख रहे हैं।और अब जिलापंचायतों के अध्यक्ष के चुनाव को आपने देखा ही,टप्प टप्प कैसे हमारे लोग जीते।

 जिलापंचायत अध्याक्ष का पद अब सेवा भाव का नहीं रहा। करोड़ों अरबों के बजट वाले इस पद पर चुनाव लड़ने वाला शख्स यहां भारी भरकम धनराशि का निवेश करता है और पूरे पांच साल उसे मजे से दुहता है।  इन पदों पर सत्ता पक्ष के मंत्री,सांसद,विधायक या दमदार नेता के परिजन ही काबिज होते हैं। 

 जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव गए बीते हाल में दस बीस करोड़ का खेल है। सीधी सी बात है जो शख्स इस पद के लिए इतना भारी निवेश करेगा, उससे विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है। ब्लाक और जिला पंचायतों का यह हाल आज और अभी नहीं, सरकार किसी की भी हो, यहां भ्रष्टाचार जारी था और जारी रहेगा।

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