मीडिया Now - गुरू और देव की बेमिसाल दोस्ती

गुरू और देव की बेमिसाल दोस्ती

medianow 10-07-2021 10:26:47


वीर विनोद छाबड़ा / अल्पायु में लीजेंड हो गए दिवंगत गुरुदत्त आज ही के दिन यानी 09 जुलाई 1925 जन्मे थे. फिल्मों में प्रवेश से पहले गुरूदत्त कलकत्ता की एक विदेशी कंपनी में टेलीफोन ऑपरेटर थे. 1944 में उन्हें पुणे की प्रभात फिल्म कंपनी में पसंद का काम मिला - नृत्य निर्देशक का. वहीं गुरू की मुलाक़ात रहमान और देवानंद से हुई जो अंत तक चली. उसी दौरान एक दिलचस्प वाक़या हुआ. गुरू के कपडे जिस लॉण्ड्री में धुलते थे वहीं का लाभ देवानंद भी उठाते थे. उन दिनों देवानंद प्रभात की 'हम एक हैं' के हीरो थे और गुरू नृत्य निर्देशक. दोनों हम उम्र और कद काठी भी तकरीबन एक सी.  एक दिन क्या हुआ कि देव लॉण्ड्री पहुंचे. उन्हें अपनी अच्छी वाली शर्ट नहीं मिली बल्कि उसके बदले एक साधारण सी शर्ट दिखी. शूटिंग में देर हो रही थी. देव ने वही शर्ट पहनी और जल्दी से शूटिंग पर पहुंचे. वहां उन्होंने देखा कि एक साहब उनकी जैसी शर्ट पहने मौजूद हैं. करीब गए तो पाया यह उन्हीं की शर्ट है और जिसने पहनी हुई है उसका नाम गुरूदत्त है. दोनों एक दूसरे को तब तक सिर्फ सूरत से पहचानते थे. 

देव ने गुरू से पूछा - यह शर्ट तो मेरी है. गुरू ने बिना झिझक बताया - मेरी शर्ट मिली नहीं. यह अच्छी लगी तो उठा ली. सोचा शाम को वापस कर दूंगा. अब अगर आप चाहें तो अभी ले सकते हैं.  देवानंद गुरू के सादगी और साफ़गोई पर फ़िदा हो गए. गुरू को गले लगाया और बोले - दोस्त जब कभी मैं फ़िल्म कंपनी बनाऊंगा तो पहली फिल्म के डायरेक्टर तुम्हीं होंगे. गुरू ने भी छूटते ही वादा किया - मैं भी जब पहली फिल्म प्रोड्यूस और डायरेक्ट करूंगा तो मेरे हीरो तुम होंगे. बात आयी-गयी हो गई. लेकिन दोनों में दोस्ती की मज़बूत नींव ज़रूर पड़ गयी. कई बरस गुज़र गए. देवानंद की गाड़ी बढ़िया चल रही थी. जबकि गुरू के दिन गर्दिश में थे. वो अमिया चक्रवर्ती और ज्ञान मुखर्जी के सहायक हुआ करते थे. देव नवकेतन की नींव रख चुके थे. उन्हें गुरू से किये वादे की याद आई. तुरंत गुरू को 'बाज़ी' (1951) का डायरेक्शन सौंप दिया.  इसके हीरो खुद देव थे. हिंदी सिनेमा में अर्बन क्राइम थ्रिलर की शुरूआत इसी हुई मानी जाती है. 
'बाज़ी' की कामयाबी के बाद नवकेतन की अगली फिल्म 'जाल' भी गुरू ने ही डायरेक्ट की. उधर कुछ साल बाद गुरू ने अपना प्रोडक्शन हॉउस स्थापित कर लिया. उन दिनों वो 'सीआईडी'(1955) बना रहे थे. उन्हें देव से किया वादा याद आया. गुरू ने डायरेक्शन की कमांड अपने विश्वसनीय सहायक राज खोसला को सौंपी. इस फिल्म की बेमिसाल कामयाबी इतिहास है. देवानंद से उलट गुरू हर समय अवसाद में रहा करते थे. गुरू कहा करते थे - मेरे पास दौलत है. शोहरत कदम चूमती है. कहने को सब कुछ है. मगर फिर भी लगता है मैं खाली हूं. देव अक्सर गुरू से कहा करते - क्यों बनाते हो दुखांत फ़िल्में? 
गुरू ने आत्महत्या का प्रयास किया था. मगर तब ज़िंदगी और मौत के बीच देव आ गए. गुरू की याद में आयोजित एक जलसे में गुरू की मां ने कहा था - मैंने उसे जन्म दिया लेकिन ज़िंदगी देव ने दी. 

आर पार, मिस्टर एंड मिसेस 55, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चांद, साहिब बीवी और गुलाम जैसी यादगार फ़िल्में देने वाले गुरू की 'प्यासा' को टाइम्स मैगज़ीन ने सदी की बेस्ट सौ फिल्मों में गिना है. गुरू घरेलू हालत के कारण स्लीप डिसऑर्डर के शिकार रहे. इसी के चलते उन्होंने एक दिन दवाइयों का ओवरडोज़ ले लिया और 10 अक्टूबर 1964 को 39 साल की कम उम्र में इस फ़ानी दुनिया से विदा ले ली.  
- लेखक एक नामी फिल्म समीक्षक हैं

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