मीडिया Now - एमएसपी का तो पता नहीं, एमआरपी जरूर बढ़ गई

एमएसपी का तो पता नहीं, एमआरपी जरूर बढ़ गई

medianow 10-04-2021 21:34:39


राकेश श्रीवास्तव / आज किसान आंदोलन अपने संघर्ष के 35वे दिन में प्रवेश कर गया है। यह बहुत दुखद स्थिति है कि गतिरोध टूट नहीं रहा है। राजनैतिक नैतिकता और अपने नफा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए भाजपा व सहयोगी दलों के कई नेताओं ने किसान विरोधी कानूनो के खिलाफ चल रहे संघर्ष को समर्थन देते हुए अपना पद छोड़ा है। साथ ही आम जनता से आलोचना के स्वर उठने पर उन्हें देशद्रोही, आतंकवादी, खालिस्तानी, पाकिस्तानी कहना जरूर कम हो गया है। आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि उसकी निरंतरता एवं व्यापक रूप से अहिंसात्मक ही रहना रहा है। 

महात्मा गांधी के ऐतिहासिक नमक आंदोलन को याद करते हुए दांडी से शुरू हुई "मिट्टी सत्याग्रह यात्रा" के माध्यम से दूरदराज के गावों से भी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए संदेश दिया गया। किसानों का यह आंदोलन सहमति या असहमति से कहीं अधिक मानव अधिकारों और किसानों के प्रति सवेंदनशीलता का मुद्दा है। सरकार बार-बार कह रही है कि एमएसपी लागू रहेगा,इसमें किसानों का उत्पीड़न नहीं होगा,अहित नहीं होगा,उनकी आय बढ़ेगी।इस बीच अनेकों आश्वासन के विपरीत बिजली बिल को लागू करने की तैयारी है। एमएसपी के प्रश्न कोई प्रगति नहीं दिखती है।जिस प्रकार पहले बिचौलियों की पौ बारह थी और सरकारी कर्मचारियों एवं नेताओं का राज चलता था वही व्यवस्था चाक-चौबंद दिख रही है।इसी संघर्ष की लड़ाई में जब कोरोना का खौफ फिर मंडरा रहा है अवसर देखते हुए दो फैसले लिए गए हैं जिससे किसानों के हित पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। 

बीटी कॉटन के रेट इस वर्ष प्रति 450 ग्राम के पैकेट पर ₹730 से बढ़ाकर रुपए से बढ़ा कर ₹767 कर दिया है।इस प्रकार प्रति किलो ₹82 की वृद्धि हुई है।सबसे खतरनाक है यूरिया एवं एवं अन्य वर्गों के उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि। अभी तक 50 किलो की डीएपी ₹1200 की थी। अब इसकी कीमत ₹1900हो जायेगी। इसी प्रकार अन्य उर्वरक जो ₹ 925 से रु1185 प्रति बोरी थे उनकी कीमत ₹1350 से 1775 जाएगी।इफको ने स्पष्टीकरण देते हुए अपनी विज्ञप्ति में यह जरूर कहा है कि हमने बोरों पर रेट प्रिंट कर दिए हैं लेकिन पुराने उर्वरक पुराने रेट पर ही बेचे जाएंगे। परंतु कब तक जब यह स्टॉक खत्म हो जाएगा तो किसानों को इन नई कीमतों को ही भुगतना पड़ेगा तथा अपनी खेती के लिए और अधिक धन खेतों में झोंकना होगा।

इफको की ही तर्ज़ पर कृभको, जुआरी एग्रो, एमसीएफएल, पारादीप फास्फेटस, चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड आदि ने भी अपने दाम बढ़ा दिये।इसके अतिरिक्त यह देखने की बात है कि जब किसानों का संघर्ष चल रहा है तब इस तरीके से कीमतों का बढ़ाना एक तरफ से उनके संघर्ष को नकारना तथा उन्हें चुनौती देनाहै। यह एक प्रकार का एलानिया प्रदर्शन करना है कि आपके संघर्ष से हमें कोई फरक नहीं पड़ता क्योंकि हम बहुमत से चुनी हुई सरकार हैं।पर सरकारें यह भूल जाती हैं कि इससे अधिक बहुमत वाली सरकारों को भी जनांदोलनों के सामने जाना पड़ा है। किसानों के लगन और संघर्ष को देखकर लगता है कि किसान कबीर दास के भजन का अनुसरण कर रहे हैं  "धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।" 

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