मीडिया Now - इज़राइल चुनाव परिणाम और ओवैसी की AIMIM का महत्व

इज़राइल चुनाव परिणाम और ओवैसी की AIMIM का महत्व

medianow 27-03-2021 12:15:57


श्याम मीरा सिंह / इज़राइल अपने चुनावी इतिहास के सबसे दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. दक्षिणपंथ की राजनीति के पोस्टर बॉय नेतन्याहू का भविष्य किसी और के नहीं बल्कि ‘कट्टर इस्लामी पार्टी’ के हाथ आ गया है. नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे कि नहीं ये इज़राइल के सबसे कट्टर मुस्लिमों की पार्टी तय करेगी। पार्टी का नाम है “यूनाइटेड अरब लिस्ट” जिसे इस चुनाव में महज़ 5 सीटें मिल रही हैं। इज़राइल की संसद को नेसेट कहते हैं। इसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए चाहिए- 61 सीटें। नेतन्याहू की पार्टी और उसके गठबंधन को 59 सीटें मिलीं हैं।

यानी नेतन्याहू एकबार फिर प्रधानमंत्री बनने से 2 सीट दूर हैं। दूसरी तरफ़ विपक्षी गठबंधन को भी नेतन्याहू के लगभग बराबर यानी 56 सीटें मिल रही हैं। इन दोनों पक्ष-विपक्ष के बीच में खड़ी है “यूनाइटेड अरब लिस्ट” पार्टी। जिसके पास पाँच सीटें आईं हैं। जो दोनों में से किसी एक पार्टी को अगले चार साल के सत्ता सौंप सकती है। इज़राइल के चुनाव को यहूदियों का चुनाव कहें तो कोई ग़लत स्टेटमेंट नहीं है, खुद नेतन्याहू की पूरी राजनीति “एंटी मुस्लिम” एजेंडा पर ही ज़िंदा रही है। लेकिन इत्तेफ़ाक से चुनावी समीकरण ऐसा बैठा है कि जिनके ख़िलाफ़ वो अब तक अपनी राजनीति करते आए हैं, आज उन्हीं के भरोसे उनका प्रधानमंत्री पद दाव पर लगा हुआ है। जो चाहे तो राजा बना दे, जो चाहे तो सालों साल से राज कर रहे नेतन्याहू को ज़मीन पर ला दे। 

हालाँकि यूनाइटेड अरब लिस्ट ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन ये लगभग तय हो लिया है यूनाइटेड अरब लिस्ट के चलते नेतन्याहू की विदाई लगभग तय है। मैं ये नहीं कह रहा कि नेतन्याहू के मुक़ाबले कट्टर इस्लामी पार्टी यानी यूनाइटेड अरब लिस्ट बहुत अच्छी होगी। लेकिन जिस देश में कोई वर्ग पीड़ित हो, भले ही वो वर्ग धार्मिक रूप से कट्टर हो, धर्मभीरु हो लेकिन उसे राजनीति में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। आज पाँच सीटों के बल पर ही इज़राइल के मुसलमानों की इज़राइल की सत्ता में किंग मेकर की भूमिका होने जा रही है, अपनी संख्या के हिसाब से इन पाँच सीटों के बल पर ही इज़राइली मुसलमान आज बारगेनिंग करने की स्थिति में हैं, अब जो भी अगली सरकार बनेगी वह वहाँ के मुसलमानों को इग्नोर नहीं कर सकेगी। इसके पीछे उनकी ये पाँच सीटें भर ही हैं। 
यही बात ओवैसी के पक्ष में मैंने लिखी थी, सवाल ये नहीं है कि ओवैसी की पार्टी किस विचार का समर्थन करती है या ओवैसी किस विचार के ध्वजवाहक हैं, लेकिन हर धर्म, हर जाति को अपने देश की राजनीति में अपनी संख्या के बराबर हिस्सेदारी मिलनी ही चाहिए। जिन लोगों ने कहा था कि बिहार में महागठबंधन की हार का कारण ओवैसी फ़ैक्टर बना था, तब मेरा यही सवाल था कि दलित, ओबीसी और बहुजनों की राजनीति करने वाली हिंदू पार्टियों को मुसलमानों को अपने अधीनस्थ मानना बंद कर देना चाहिए। मुसलमान इस देश की राजनीति में बराबर के हिस्सेदार हैं।

ओबीसी पार्टियों ने उनकी वोट तो लीं, लेकिन उनके नेता सदन में नहीं भेजे और न ही उनके मुद्दे उस मुखरता के साथ उठाए जिस मुखरता से वे अपनी जातियों से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। अगर वे मुसलमानों का वोट चाहते हैं तो मुसलमानों को अपने गठबंधन में बराबरी की जगह भी दें। अगर महागठबंधन को ओवैसी फ़ैक्टर से इतना भय रहता है, और अगर ओवैसी को उनके वर्ग में इतनी वोट मिल जा रही हैं तो महागठबंधन को ओवैसी की पार्टी को बराबर प्रतिनिधित्व भी देना चाहिए. लेकिन ग़ैर भाजपाई सेक्युलर गठबंधन मुसलमानों को बराबर हिस्सेदारी देने के बजाय ओवैसी को भाजपा की “बी” टीम घोषित करने में अपनी ऊर्जा खर्च करता है। 

आज देश में अच्छी ख़ासी जनसंख्या होने के बावजूद मुसलमानों के जनप्रतिनिधि न विधानसभाओं में हैं, न संसद में हैं। अगर सदन में उनके नेता ही नहीं होंगे तो उनके सवाल कौन उठाएगा? कब तक हिंदू पार्टियों के ही बड़े अंब्रेला के अंदर मुसलमान अपना प्रतिनिधित्व ढूँढता रहेगा? क्या “वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा” वाला ऐतिहासिक नारा मुसलमानों के लिए लागू नहीं होता?

मुसलमानों ही नहीं हर जाति और हर धर्म के लोगों को राजनीति में उनकी संख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। ताकि हर शोषित जाति और अल्पसंख्यक वर्ग बारगेनिंग करने की स्थिति में हों, हिंदू जातियों की छोटी छोटी पार्टियाँ भी दो-दो सीटें लेकर सत्ता में भागीदार बनी हुई हैं। जिससे कम ही सही लेकिन इनके समाज को कुछ न कुछ सहूलियत मिलती ही है। लेकिन 16% मुसलमानों की एक सिंगल पार्टी नहीं है। और एक है भी तो उसे भाजपा की बी टीम कहकर किनारे किया जाता है। अगर मुसलमानों की संख्या 16% है तो उनके विधायक और सांसद भी सौलह प्रतिशत होने चाहिए। लेकिन वे बमुश्किल 4 प्रतिशत होंगे। ऐसे में मुसलमानों का शोषण होना ही है। 

केरल में भाजपा ईसाइयों से समर्थन माँग रही है। जबकि पूरे देश में ईसाइयों के प्रति उनका विचार किसी से छुपा हुआ नहीं है। लेकिन केरल में वे ईसाइयों के नज़दीक होना चाहते हैं, क्यों? क्योंकि केरल में ईसाइयों की संख्या बहुत ज़्यादा है और बिना ईसाइयों के चुनावी गणित बनना मुश्किल है। जिन ईसाइयों से भाजपा समर्थन माँग रही है क्या कल को उनका कुछ प्रत्यक्ष अहित कर सकेगी? नहीं करेगी। कट्टर हिंदुत्व के झंडे के तले पूरी ज़िंदगी राजनीति करने वाली शिवसेना आज सेक्युलर बनी हुई है, कारण यही है कि मुसलमानों की वोट से जीतने वाली पार्टियों के बल पर उसे सत्ता मिली हुई है, अगर शिवसेना अपने चिर परिचित चरित्र के आधार पर एंटी मुस्लिम डिसीजन लेने लगे तो मुसलमान नाराज़ होंगे, मुसलमान नाराज़ होंगे तो कोंग्रेस और एनसीपी को शिवसेना से अपना समर्थन वापस लेना पड़ेगा, इसलिए शिवसेना आज चाहकर भी एंटी मुस्लिम नहीं हो सकती। इसे कहते हैं Political Bargaining.

इसलिए ज़रूरी है कि बाक़ी जातियों और धर्मों की तरह मुसलमानों के विधायक और सांसद भी सदन में जीतकर पहुँचे। सरकार बनाने में भूमिका निभाएँ। आज इज़राइल में मुसलमान महज़ 5 सीटें जीतकर किंगमेकर बनने की स्थिति में हैं। भारत में 16 प्रतिशत तक जनसंख्या है। यहाँ भी बहुत कुछ संभावनाएँ हैं...सबको बराबर प्रतिनिधित्व मिलना संवैधानिक अधिकार है, मुसलमानों को भी पूरा हक़ है। बात ओवैसी के समर्थन या विरोध की नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व की है। 
लेखक आजतक के पत्रकार हैं

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